समय का संताप
हालात की लातपरिस्थिति की मार
बेरोज़गारी की चोट
पीड़ा का प्रहार
शिक्षकों की ईर्ष्या
सहपाठियों का व्यंग्य
समय का संताप सह कर बड़ा हुआ है
मेरा कवि
इतना बड़ा हुआ है
कि अब संत कवियों को छोड़कर
अपने से किसी को बड़ा कवि मानता ही नहीं है
न वाल्मीकि को, न वेदव्यास को
न गुरु को, न गार्जियन को
न आचार्य को, न अभिभावक को
न मित्र को, न मार्गदर्शक को
न प्रेमिका को, न पथप्रदर्शिका को
किसी को भी नहीं!
मेरे कवि का दुःख ही उसका दीपक है
मेरा कवि मेरा प्रतिरूप है
उसी की कविता से
इस कोहरे में मेरे पास धूप है!
(®गोलेन्द्र पटेल / 21-03-2025)
संपर्क: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/जनपक्षधर्मी कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
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