Friday, 23 January 2026

दो कविताएँ: बौद्ध भिक्षुणी सुरसती, सरस्वती और सावित्रीबाई फुले

 युवा कवि गोलेन्द्र पटेल की दो कविताएँ :-


1).
सुर से सर तक

इतिहास
जब देवताओं की भाषा बोलने लगता है
तो सबसे पहले
स्त्रियों की पहचान बदलता है

किसी ने गाया था
स्वर में नहीं
स्वतंत्रता में
किसी ने वीणा नहीं
अनुशासन साधा था
किसी के कंठ में
थेरीगाथा की धूप थी
और मौन में
बुद्ध का धैर्य।

फिर समय आया
जहाँ सुर को पूजा चाहिए थी
पर स्रोत नहीं
तो एक भिक्षुणी
देवी में ढाली गई
और ज्ञान
चित्र में बंद कर दिया गया

काग़ज़ ने कहा,
“यही है विद्या।”
पत्थर चुप रहा,
“मैं प्रमाण हूँ।”

सिर पर विराजमान बुद्ध
प्रभामंडल नहीं
एक प्रश्न थे
कि यदि यह स्वर की साधिका थी
तो इसे
मिथक क्यों बना दिया गया?

सभ्यता के नाम पर
नदियों के नाम बदले गए
और समयरेखाओं को
आरती में घुमा दिया गया
जो बाद में आया
उसे पहले बताया गया
क्योंकि
स्मृति से बड़ा
कभी-कभी वर्चस्व होता है।

मंदिरों के गर्भगृह में
अंधेरा इसलिए नहीं
कि दीपक कम हैं
इसलिए कि
सच देख न लिया जाए

यदि यह विद्या की देवी है
तो पुस्तक कहाँ है?
यदि यह कल्पना है
तो मूर्ति क्यों डराती है?

मैं आरोप नहीं लगाता
मैं सिर्फ़ पूछता हूँ
इतिहास पहले था
या आस्था?
पत्थर पहले था
या चित्र?

मेरी उलझन अपराध नहीं
क्योंकि
जहाँ प्रश्न मर जाते हैं
वहीं सभ्यता
पोस्टर बन जाती है।
★★★
2).
सरस्वती नहीं, सावित्री

किसने लिखी थी विद्या की
सीमा माथे की लकीर?
किसके आँगन दीप जले
किसके हिस्से आई भीर?

वीणा बोली, श्वेत वसन
मंत्रों की मधु मुस्कान
पर क्यों चुप थी यह वाणी
जब जलते थे स्त्री-शूद्र प्राण?

यदि ज्ञान कृपा से मिलता है
तो कृपा का था यह हाल
हज़ार बरस तक बंद रहे
बहुजनों के पाठशाल?

किस ग्रंथ ने यह हुक्म दिया
“स्त्री-शूद्र न पढ़ पाएँ!”
किस देवी ने आँखें मूँदीं
जब अक्षर भी दंड बन जाएँ?

जीभ सवर्णों की पावन थी
बाक़ी सब अपवित्र?
क्या वाणी भी जाति चुनती है
क्या ज्ञान रहा है चित्र?

फिर आई एक साधारण स्त्री
केसरिया नहीं—संघर्ष लिए
हाथों में अक्षर, आँखों में आग
पाँवों में पत्थर-कीचड़ लिए।

न कोई वीणा, न सिंहासन
न श्वेत कमल का तामझाम
बस एक स्कूल, एक संकल्प
और बराबरी का पैग़ाम।

सावित्री बोली—“ज्ञान किसी का
बपौती अधिकार नहीं,
जो पढ़े नहीं, जो बोले नहीं
वह मनुष्य बेकार नहीं।”

जो द्वार हज़ारों बरस बंद रहे
उस पर पहला दस्तक कौन?
जिसे देवी नज़र न आईं
उसने इंसान पहचाना कौन?

सरस्वती पूजी पंचमी को
मंत्र बजे, फूल बरसें
पर सावित्री हर उस दिन जिए
जब बेटियाँ अक्षर तरसें।

देवी अगर करुणा होती है
तो करुणा ने क्या किया?
एक स्त्री ने इतिहास बदला
बिना वरदान—बिना माया।

इसलिए आज यह प्रश्न नहीं
यह निर्णय है, उद्घोष है
ज्ञान का स्रोत वही कहलाए
जो सबके लिए अवरोध तोड़े।

मूर्ति नहीं—विचार चाहिए
पूजा नहीं—पाठशाला
सरस्वती से मुक्ति का अर्थ
सावित्री को अपनाना।

सरस्वती नहीं, सावित्री
ज्ञान की असली जोत।
जिसने सबके द्वार खोले,
वही हमारी सोच।
★★★

रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (क्रांतिकारी  बहुजन कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

संपर्क सूत्र :-
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
मोबाइल नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com

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