Saturday, 24 January 2026

महावारी : लज्जा नहीं, जीवन-शक्ति — गोलेन्द्र पटेल

"महावारी : लज्जा नहीं, जीवन-शक्ति" रचना महावारी को लज्जा या अशुद्धि नहीं, बल्कि स्त्री की जीवनदायी शक्ति के रूप में स्थापित करती है। यह रचना वैज्ञानिक तथ्य, सामाजिक अनुभव और नारीवादी दृष्टि को जोड़ते हुए महावारी से जुड़े मिथकों, पाखंड और वर्गीय असमानताओं को उजागर करती है। विशेष रूप से ग्रामीण स्त्रियों की अमानवीय परिस्थितियाँ—राख, रेत, उपले के प्रयोग—और शहरी सुविधाओं के बीच की खाई को सामने लाया गया है। रचना पुरुष-सत्ता, धार्मिक व सामाजिक निषेधों पर तीखा प्रश्न उठाती है और कहती है कि स्त्री की देह, पीड़ा और श्रम का सम्मान किए बिना कोई समाज सभ्य नहीं हो सकता।
महावारी : लज्जा नहीं, जीवन-शक्ति

—गोलेन्द्र पटेल 


1.
माहवारी अपमान नहीं, जीवन का अनुबंध,
जिस रक्त से धरती जने, वही क्यों हो निषिद्ध?

2.
जिसे कहो तुम ‘पीरियड’, ‘महीना’ या ‘रजोधार’,
वही स्त्री की देह रचे, सृष्टि का आधार।

3.
गर्भाशय की साधना, हर मास रचती नीति,
त्याग करे वह परत को, तब चलती यह रीति।

4.
जो रक्त बहा उपहास में, वह गंदा कैसे हो?
जिससे जन्मे मानव-जात, वह अशुद्ध कैसे हो?

5.
मंदिर बंद, रसोई बंद, बंद किए हर द्वार,
पर उसी देह से जन्म लो, फिर भी इतना तिरस्कार!

6.
शहरों में कप, पैड हजार, खुशबूदार अभिमान,
गाँव-गली में राख बंधी, उपले का समाधान।

7.
महीने भर जो खेत झुके, पीठ झुकाए काम,
माहवारी आई तो फिर, ‘अछूत’ उसका नाम!

8.
रेत-राख की पोटली, भीतर रखे अंगार,
फिर भी स्त्री मुस्कान सहे, पीड़ा का व्यापार।

9.
जिस देह को ‘ऑब्जेक्ट’ कहो, उसी से जन्मे तुम,
यह विडंबना नहीं अगर, तो क्या है फिर भ्रम?

10.
महावारी कोई विकल्प, कोई शौक न चाह,
यह कुदरत का नियम है, नारी की परवाह।

11.
कमर टूटे, देह जमे, भीतर उठे बवंडर,
ऊपर से चुप्पी का बोझ—युद्ध यही हर अंदर।

12.
वीर्य चले सत्तर बरस, गर्भ मांगे सेहत,
फिर भी दोषी वही स्त्री, कैसी यह व्यवस्था-रीत!

13.
प्रसव पीड़ा, ऑपरेशन, दूध न उतरे साथ,
फिर भी स्त्री को सिखलाओ, ‘त्याग ही है सौगात’!

14.
जो देह रचती भविष्य, वही देह उपेक्षित,
पूजनीय कहकर भी स्त्री, हर क्षण ही नियंत्रित।

15.
फेमिनिज़्म कप सुखाना नहीं, धूप की बात,
जब देह छुपानी पड़े, तब कैसे हो संवाद?

16.
जो माहवारी पर हँसते, पहले इतना कर लें,
पाँच दिवस उपला बाँध, दिनभर बोझा भर लें।

17.
फिर पूछें वे पीड़ा क्या, फिर बोलें अधिकार,
अनुभव बिना ज्ञान भी, होता केवल अहंकार।

18.
स्त्री न केवल देह है, न केवल बलिदान,
वह समाज की शिल्पकार, भविष्य का विधान।

19.
जिस समाज में स्त्री न हो, वह श्वेत स्याही-सा,
दिखता सब है दूर से, पढ़ना पर असंभव-सा।

20.
आसान नहीं स्त्री होना, जानो यह संसार,
हर मास जने जीवन को, सहकर सारा भार।

21.
माहवारी अपमान नहीं, जीवन की है रीत,
जिस रक्त से संसार जने, वह कैसे हो नीच?

22.
मासिक, रजोधर्म कहो, पीरियड या महीना,
नाम बदलने से क्या बदले, स्त्री का सच पुराना?

23.
गर्भाशय की साधना, हर मास रचती त्याग,
परत टूटे, रक्त बहे—तभी बचे अनुराग।

24.
जो रक्त कहो तुम गंदा है, सोचो एक बार,
उसी धारा से जन्म ले, हर मानव परिवार।

25.
मंदिर-द्वार बंद किए, रसोई भी निषिद्ध,
पर उसी देह से जन्म लो, फिर क्यों इतना क्रुद्ध?

26.
धर्म नहीं यह रीत है, सत्ता का विस्तार,
देह नियंत्रित करने का, पुराना हथियार।

27.
शहरों में पैडों का शोर, कप का फैशन राज,
गाँव-गली में राख बंधी, उपलों का समाज।

28.
रेत, धूल की पोटलियाँ, भीतर रखी पीड़ा,
फिर भी खेतों में झुकी, स्त्री की हर एक रीढ़ा।

29.
जब पुरुष रजाई तले, हुक्का गुड़गुड़ाए,
तब स्त्री सरसों के खेत, पत्ते तोड़ लाए।

30.
महीना अधिक बहा तो, कपड़ा क्या निभाए?
रेत बदलती हर घड़ी, दर्द किसे बताए?

31.
ना अंडरवियर, ना दवा, ना पानी का मान,
फिर भी काम करे स्त्री, लेकर सारा जहान।

32.
उपले बाँध नाजुक अंग, दिनभर ढोती भार,
फिर भी कहलाती वही, ‘कमज़ोर’ हर बार।

33.
कॉलेज, शहर, दफ्तरों में, लेख लिखे विचार,
गाँव की स्त्री का दर्द क्या, जाने कौन अख़बार?

34.
तीन दिन की पीरियड लीव, लेखों का विस्तार,
पर उपले वाली स्त्री को, ना छुट्टी ना उपचार।

35.
वास्तविक पीड़ा यह नहीं, जो शब्दों में आए,
पीड़ा वह जो जीते-जी, भीतर ही सड़ जाए।

36.
छिली जाँघ, फटा बदन, मीलों पानी ढोना,
फिर भी घर के कोने में, ‘अछूत’ ही होना।

37.
संक्रमण, सूजन, गाँठें, श्वेत प्रवाह का रोग,
पर डॉक्टर तक पहुँचने में, मर्यादा का शोक।

38.
जब हालत हो अति गंभीर, तब अस्पताल जाए,
बच्चेदानी काट निकालें—‘निजात’ कहाए।

39.
सोचो यह मुक्ति कैसी, किस कीमत पर आई?
देह का एक अंग कटा, चुप्पी बनी दवाई।

40.
फेमिनिज़्म धूप नहीं, कप सुखाने का नाम,
जब देह छुपानी पड़े, तब कैसा अभियान?

41.
जो माहवारी पर हँसते, पहले इतना कर लें,
पाँच दिवस उपला बाँध, दिनभर बोझा भर लें।

42.
फिर पूछें वे पीड़ा क्या, फिर समझें अधिकार,
अनुभव बिना ज्ञान भी, होता केवल अहंकार।

43.
वीर्य चले सत्तर बरस, उम्र न पूछे कोय,
गर्भ माँगे स्वस्थ देह, दोषी फिर भी वोय।

44.
महावारी स्त्री की चाह नहीं, न कोई शौक,
यह कुदरत का विधान है, झेलती हर लोक।

45.
कमर जमे, देह अकड़े, भीतर उठे तूफान,
ऊपर से समाज कहे—‘छुपाओ यह निशान’।

46.
प्रसव पीड़ा सहने को, टूटें बीस हड्डियाँ,
फिर भी कहो सहज उसे—वाह रे मर्दानगियाँ!

47.
गर्भ धरे नौ मास तक, उलटी, दर्द, अवसाद,
फिर भी सारे काम करे, यही उसका प्रसाद।

48.
इंजेक्शन, चीरा, टांके, निशान जीवन भर,
फिर भी देह पर अधिकार, किसी और का डर।

49.
नींद त्याग, देह लुटा, तीन बरस केवल बाल,
फिर भी पूछो स्त्री से—‘क्या करती हो कमाल?’

50.
पूजनीय कहकर भी स्त्री, उपभोग में बंधी,
उसकी इच्छा, निर्णय पर, हर पहरे की संधि।

51.
जो इज़्ज़त करना न जाने, वह मर्द नहीं कहलाए,
सत्ता की इस मर्दानगी, एक दिन टूट जाए।

52.
पीरियड, रजस्वला कहो, क्यों लगे यह बला?
जिससे बना तुम्हारा वजूद, वही क्यों छलना?

53.
चाँद छुए, विज्ञान बढ़े, पर सोच वही पुरान,
काले पैकेट में आज भी, लिपटी स्त्री पहचान।

54.
दर्द छुपाओ, चुप रहो—यह शिक्षा दी जाए,
मुस्कान ओढ़ पिता देख, रोना भीतर जाए।

55.
पुरुष कहे—हम क्या करें? दोष हमारा क्या?
बस ‘मैं हूँ’ कह देना ही, पहला धर्म सिखा।

56.
गरम पानी, चाय का कप, पैड समय पर लाना,
तीन दिन इतना कर लो, क्या इतना है भारी जाना?

57.
स्त्री पर सबसे अधिक लिखे, वही करे उपेक्ष,
अपवादों से मत ढको, पूरी सामाजिक द्रेष।

58.
केवल पुरुष या स्त्री का, समाज नहीं बन पाए,
श्वेत काग़ज़ पर श्वेत स्याही, पढ़ी न जाए।

59.
रसोई, सीमा, संसद तक, स्त्री का श्रम अपार,
फिर भी ‘आसान’ कह दिया, उसका हर अवतार।

60.
आसान नहीं स्त्री होना, समझो यह संसार,
नारी समाजस्य वास्तुकारा—यही सत्य विचार।

61.
पाठशाला की घंटी बजी, भीतर उठा तूफान,
बैग में दर्द दबा लिए, बैठी बिटिया मौन।

62.
कॉपी पर अक्षर कांपते, देह जमे पत्थर-सी,
मासिक की चुप्पी ओढ़े, पढ़ती वह अक्षर-सी।

63.
कक्षा में उठना कठिन, पेट पकड़कर रोए,
पर शिक्षक से क्या कहे, ‘महीना’ कौन बोले?

64.
यूनिवर्सिटी की भीड़ में, पैड की चिंता साथ,
बाथरूम में पानी नहीं, शर्म बनी हथियार।

65.
पुस्तक भारी, देह भी भारी, सीढ़ी चढ़ना भार,
फिर भी नंबर काट लिए—‘डिसिप्लिन’ का वार।

66.
ग्रामीण बिटिया भोर उठे, पानी लकड़ी ढोए,
माहवारी आई तो भी, काम कहाँ से छोड़े?

67.
स्कूल गई तो डर लगे, दाग न दिख जाए,
पीछे हँसी, आगे प्रश्न—देह कहाँ छुपाए?

68.
माँ कहे—चुप रह बेटी, यह तो नारी धर्म,
दर्द सहना सीख ले, यही जीवन कर्म।

69.
पैड महंगे, कप फटे, राख मिले घर द्वार,
शहर की बेटी कप चुने, गाँव की बेटी भार।

70.
रेत बंधी कपड़ों तले, भीतर जलता घाव,
पर खेत, स्कूल, रसोई—सबका एक स्वभाव।

71.
छात्रावास के कमरे में, खिड़की बंद अँधेर,
कप सुखाए चोरी से, धूप भी लगे गैर।

72.
फीमेल वार्डन डाँट दे, ‘गंदगी मत फैलाओ’,
पर दर्द की इस राजनीति को, कौन समझाओ?

73.
ग्रामीण कॉलेज की बिटिया, रोज़ पैदल जाए,
मासिक के दिन भी मीलों, चुपचाप चल पाए।

74.
न मेडिकल, न सलाह, न समझने वाला कोई,
बस सहना ही पाठ बना, हर उम्र की होई।

75.
खून बहा तो डर लगे, बदन हुआ शर्मसार,
किसी ने पूछा नहीं—दर्द कैसा अपार?

76.
पीरियड लीव सपना है, हकीकत में डर,
छुट्टी माँगो तो लेबल—‘बहाना’, ‘कमज़ोर’ ठहर।

77.
ग्रामीण स्त्री सिखलाए, बेटी को यह ज्ञान,
“देह तुम्हारी पवित्र है, मत मानो अपमान।”

78.
पर वही माँ जब झेले, उपले-राख की मार,
बेटी देखे चुपचाप, पीढ़ीगत संस्कार।

79.
यूनिवर्सिटी की बहसों में, जेंडर पढ़ाया जाए,
पर बाथरूम में पैड कहाँ—यह कोई न बताए।

80.
सिलेबस में न महावारी, न देह का सच,
डिग्री मिले तो क्या बदले, पीड़ा वही बच?

81.
ग्रामीण आंगन, शहरी कैम्पस—दोनों का एक हाल,
देह वही, नियम वही, बदली बस भाषा-चाल।

82.
जो छात्रा प्रश्न उठाए, उसे ‘विद्रोही’ कहें,
जो चुप रहे पीड़ा में, वही ‘अच्छी’ गिनें।

83.
शिक्षा यदि मुक्ति होती, तो डर क्यों होता साथ?
देह की बात करें तो, कांप उठे हर हाथ।

84.
सेनेटरी नहीं, संवेदना चाहिए पहले,
देह को समझे समाज, फिर आए पैड के झेले।

85.
ग्रामीण स्त्री, छात्रा दोनों, एक ही संघर्ष-धार,
एक खेत में खपती है, एक किताबों के भार।

86.
किसने कहा पढ़ी स्त्री को, दर्द नहीं सताए?
ज्ञान बढ़े पर देह वही, हर मास टूट जाए।

87.
डॉक्टर दूर, बस किराया, डर बड़ा जहान,
इसलिए रोग पले भीतर, मौन बना पहचान।

88.
पढ़ाई छोड़ी, काम बढ़ा, माहवारी बनी शत्रु,
समाज ने काटे पंख, फिर पूछे—‘क्यों न उड़ू?’

89.
अगर स्कूल में सिखलाया जाए, देह का सम्मान,
तो गाँव और शहर दोनों, बदलें अपना मान।

90.
अगर पैड से पहले मिले, समझ और अधिकार,
तो हर बिटिया कह पाए—‘मैं भी हूँ संसार।’

91.
ग्रामीण स्त्री के श्रम में, शिक्षा का बीज छुपा,
उसे सम्मान मिले जब, भविष्य खुद लिखा।

92.
छात्रा की चुप्पी तोड़ो, सवालों को दो स्वर,
यही नारीवाद असल, बाकी सब है डर।

93.
महावारी पाठ बने, विज्ञान की भाषा में,
तभी मिटेगी शर्म की, जड़ें हर दिशा में।

94.
जो देह सिखाए सहना, वही सिखाए बोल,
नारी को अब चाहिए, अधिकारों का खोल।

95.
ग्रामीण माँ और बेटी की, एक ही पुकार,
“देह हमारी, नियम हमारे—बस इतना स्वीकार।”

96.
कॉलेज, स्कूल, आंगन तक, यह संवाद चले,
मासिक को छुपाने की, हर दीवार गिरे।

97.
नारी को शिक्षा दो, पर देह से मत काटो,
अधूरा ज्ञान वही है, जो पीड़ा से न नाटो।

98.
जब बिटिया हँसकर कह दे—‘आज पीरियड है’,
तब समझो समाज ने, पहला पाठ पढ़ा है।

99.
ग्रामीण रास्ते, शहरी गलियाँ—एक संग गूँजें तान,
महावारी कोई कलंक नहीं, यह जीवन-गान।

100.
आसान नहीं स्त्री होना, पर अब यह ऐलान,
ग्रामीण हो या छात्रा—नारी स्वयं संविधान।

★★★

रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (क्रांतिकारी जनकवि-लेखक, साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं स्त्रीवादी चिंतक)


संपर्क सूत्र :-
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
मोबाइल नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com

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महावारी : लज्जा नहीं, जीवन-शक्ति — गोलेन्द्र पटेल

"महावारी : लज्जा नहीं, जीवन-शक्ति" रचना महावारी को लज्जा या अशुद्धि नहीं, बल्कि स्त्री की जीवनदायी शक्ति के रूप में स्थापित करती ह...