नमो बुद्धाय। जय भीम। जय मंडल। जय जवान। जय किसान। जय विज्ञान। जय संविधान। जय मानवतावाद।
उच्च शिक्षा, सामाजिक न्याय और बहुजन दृष्टि : UGC विमर्श का व्यापक परिप्रेक्ष्य
भारतीय लोकतंत्र का मूलाधार संविधान है, जिसने समानता, गरिमा और अवसर की समान उपलब्धता को राष्ट्र-निर्माण का केंद्रीय सिद्धांत माना। फिर भी, सामाजिक संरचना में निहित जातिगत असमानताएँ उच्च शिक्षा संस्थानों तक गहराई से व्याप्त रही हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा संसदीय समिति और सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत आँकड़ों के अनुसार, देश के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में जाति-आधारित भेदभाव से जुड़ी शिकायतों में पिछले पाँच वर्षों में लगभग 118 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। जहाँ 2019–20 में ऐसी शिकायतों की संख्या 173 थी, वहीं 2023–24 में यह बढ़कर 378 तक पहुँच गई। यह केवल सांख्यिकीय परिवर्तन नहीं, बल्कि उच्च शिक्षा में व्याप्त सामाजिक विषमता का संकेत है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि : मंडल से समता-विनियम तक
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15(4), 16(4) और 340 सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधानों का आधार प्रदान करते हैं। 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों के लागू होने के समय जो तीव्र सामाजिक-राजनीतिक प्रतिक्रिया सामने आई थी, वह इस तथ्य को उजागर करती है कि प्रतिनिधित्व और संसाधनों में भागीदारी का प्रश्न सत्ता-संतुलन से जुड़ा हुआ है।
आज जब UGC द्वारा भेदभाव-रोधी और समता-संवर्धन संबंधी प्रावधानों पर चर्चा हो रही है, तो बहस का स्वर एक बार फिर उसी ऐतिहासिक प्रतिरोध की याद दिलाता है। प्रश्न यह नहीं कि सुधार की आवश्यकता है या नहीं—प्रश्न यह है कि क्या भारतीय समाज वास्तव में समानता को व्यवहार में स्वीकार करने के लिए तैयार है।
भेदभाव के प्रकरण और संस्थागत प्रश्न
उच्च शिक्षा में जातिगत भेदभाव की घटनाएँ समय-समय पर राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनी हैं। 2016 में हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के शोधार्थी रोहित वेमुला की आत्महत्या और 2019 में मेडिकल छात्रा पायल तडवी की मृत्यु ने संस्थागत वातावरण पर गंभीर प्रश्न उठाए। इन घटनाओं ने यह स्पष्ट किया कि केवल आरक्षण पर्याप्त नहीं; गरिमापूर्ण और सुरक्षित शैक्षिक वातावरण भी उतना ही आवश्यक है।
इसी संदर्भ में यदि UGC समान अवसर, त्वरित शिकायत-निवारण और पारदर्शी तंत्र की बात करता है, तो उसे सामाजिक न्याय की संवैधानिक प्रतिबद्धता के विस्तार के रूप में देखा जाना चाहिए।
दुरुपयोग की आशंका बनाम न्याय का प्रश्न
किसी भी कानून के संदर्भ में दुरुपयोग की आशंका स्वाभाविक है। किंतु दुरुपयोग की संभावना सुधार के प्रयास को ही निरस्त करने का आधार नहीं बन सकती। भारतीय न्याय-व्यवस्था में अपील, समीक्षा और लोकपाल जैसे प्रावधान उपलब्ध हैं। अतः समाधान कानून को रोकना नहीं, बल्कि उसे अधिक जवाबदेह और प्रतिनिधिक बनाना है।
बहुजन दृष्टि यह आग्रह करती है कि शिकायत-निवारण समितियों में भुक्तभोगी समुदायों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व हो, चयन प्रक्रिया पारदर्शी हो और निगरानी स्वतंत्र हो। तभी विश्वास और न्याय का संतुलन बन सकेगा।
सामाजिक-राजनीतिक विमर्श और प्रतिनिधित्व
शिक्षा और आरक्षण के प्रश्न पर भारतीय राजनीति का इतिहास जटिल रहा है। मंडल बनाम कमंडल की बहस ने यह स्पष्ट किया कि सामाजिक न्याय के मुद्दे अक्सर सांस्कृतिक या धार्मिक विमर्श से ढँक दिए जाते हैं। आज भी जब उच्च शिक्षा में समानता की बात उठती है, तो उसे कभी “योग्यता” के संकट के रूप में, कभी “सामाजिक विभाजन” के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
यहाँ यह स्मरणीय है कि 103वाँ संविधान संशोधन (EWS आरक्षण) भी संसाधनों के पुनर्वितरण का एक उदाहरण है। यदि आर्थिक आधार पर आरक्षण को स्वीकार किया जा सकता है, तो सामाजिक आधार पर भेदभाव-रोधी प्रावधानों का विरोध क्यों? यह प्रश्न केवल राजनीतिक नहीं, नैतिक भी है।
नेतृत्व और लोकतांत्रिक असहमति
हाल के घटनाक्रमों में कुछ जनप्रतिनिधियों ने उच्च शिक्षा में समानता के समर्थन में खुलकर आवाज उठाई है। 10 फरवरी 2026 को लखनऊ में UGC से संबंधित मुद्दों पर प्रदर्शन के दौरान विधायक डॉ. पल्लवी पटेल की हिरासत और दिल्ली के जंतर-मंतर पर सांसद चंद्रशेखर के नेतृत्व में हुए धरने ने इस बहस को राष्ट्रीय स्तर पर सामने ला दिया। लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध संवैधानिक अधिकार है; असहमति को अपराध की तरह देखना लोकतांत्रिक संस्कृति के अनुकूल नहीं।
यह घटनाएँ यह भी दर्शाती हैं कि सामाजिक प्रतिनिधित्व केवल चुनावी सफलता तक सीमित नहीं, बल्कि नीतिगत मुद्दों पर सक्रिय भागीदारी से परिभाषित होता है।
बहुजन चेतना और भविष्य की दिशा
इतिहास साक्षी है कि जब-जब वंचित समुदायों ने संगठित होकर अपने अधिकारों की माँग की है, तब-तब नीतियों में परिवर्तन संभव हुआ है। मंडल आंदोलन इसका प्रमाण है। आज उच्च शिक्षा में समता के प्रश्न पर भी व्यापक सामाजिक संवाद की आवश्यकता है।
बहुजन दृष्टि का मूल आग्रह यह है कि—
समानता केवल संवैधानिक प्रावधान न रहे, बल्कि संस्थागत व्यवहार में उतरे।
शिक्षा-संस्थानों में गरिमा और सुरक्षा सुनिश्चित हो।
प्रतिनिधित्व और जवाबदेही साथ-साथ चलें।
निष्कर्षतः UGC से जुड़ा वर्तमान विमर्श केवल एक प्रशासनिक सुधार का प्रश्न नहीं है; यह भारतीय लोकतंत्र की आत्मा—समानता, न्याय और बंधुत्व—की परीक्षा है। यदि उच्च शिक्षा सचमुच राष्ट्र के भविष्य का निर्माण करती है, तो उसे सामाजिक न्याय के मूल्यों से पृथक नहीं किया जा सकता। बहुजन चेतना का संदेश स्पष्ट है: शिक्षा सबकी है, सम्मान सबका है, और संविधान के दायरे में समानता की लड़ाई निरंतर चलती रहेगी।
विश्वविद्यालयों में बढ़ती जाति-आधारित शिकायतें यह बताती हैं कि समानता अभी भी अधूरी है। पिछले पाँच वर्षों में भेदभाव के मामलों में 118% से अधिक वृद्धि चिंताजनक है। ऐसे समय में UGC के समता-संवर्धन नियम शिक्षा संस्थानों को जवाबदेह और पारदर्शी बनाने की दिशा में अहम कदम हैं।
मंडल आयोग की तरह आज भी बदलाव से कुछ लोगों को असहजता है, क्योंकि बराबरी विशेषाधिकार को चुनौती देती है। लेकिन शिक्षा का उद्देश्य अवसरों का लोकतंत्रीकरण है, न कि भेदभाव का संरक्षण।
हम संविधान की भावना—न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व—के साथ खड़े हैं। हर छात्र को गरिमा, सुरक्षा और निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार है। UGC के प्रावधान इसी दिशा में प्रयास हैं।
आइए, नफरत नहीं, न्याय का साथ दें।
समानता सिर्फ नारा नहीं—व्यवहार बने।
हम UGC के समर्थन में हैं।
★★★

रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/बहुजन कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
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