Saturday, 14 November 2020

"आत्मान्वेषी विलक्षण मार्क्सवादी आलोचक' : गजानन माधव मुक्तिबोध" - आलोचक अमर नाथ {©Amar Nath} ~ गोलेन्द्र पटेल


 "आत्मान्वेषी विलक्षण मार्क्सवादी आलोचक' : गजानन माधव मुक्तिबोध" - आलोचक अमर नाथ 

प्रोफेसर अमर नाथ :-


मध्य प्रदेश के श्योपुर, जिला मुरैना में जन्मे और राजनांदगांव के कॉलेज में अध्पापक रहे मूलत: मराठी भाषी गजानन माधव मुक्तिबोध (13.11.1917-11.9.1964) जितने बड़े कवि हैं उतने ही बड़े आलोचक भी. यद्यपि उन्होंने अपने समय की आलोचना- प्रवृति से असंतुष्ट होकर आलोचनाएं लिखी हैं. मात्र 46 वर्ष की उम्र में मुक्तिबोध ने जो साहित्य हमें दिया वह उन्हें एक असाधारण प्रातिभ साहित्यकार प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है.  उनकी समीक्षा के प्रति लोगों का ध्यान उनकी मृत्यु के बाद आकृष्ट हुआ. उनकी गद्य कृतियों का प्रकाशन भी काफी देर से हुआ. शमशेर बहादुर सिंह ने उनके ऊपर घटित इस यथार्थ पर टिप्पणी करते हुए लिखा है, “एकाएक क्यों 64 के मध्य में गजानन माधव मुक्तिबोध विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो उठे ? क्यों ‘धर्मयुग’, ‘ज्ञानोदय’, ‘लहर’, ‘नवभारत टाइम्स’- प्राय: सभी साप्ताहिक, मासिक और दैनिक उनका परिचय पाठकों को देने लगे और दिल्ली की साहित्यिक, हिन्दी दुनिया में एक नयी हलचल-सी आ गई ?

इसलिए कि गजानन माधव मुक्तिबोध एकाएक हिन्दी संसार की एक घटना बन गये. कुछ ऐसी घटना जिसकी ओर से आंख मूंद लेना असंभव था. उनकी एकनिष्ठ तपस्या और संघर्ष, उनकी अटूट सच्चाई, उनका पूरा जीवन, सभी एक साथ हमारी भावना के केन्द्रीय मंच पर सामने आ गए. और हमने अब उनके कवि और विचारक को एक नयी आश्चर्य-दृष्टि से देखा.” ( ‘चांद का मुंह टेढ़ा है’ की ‘एक विलक्षण प्रतिभा’ शीर्षक भूमिका से, पृष्ठ-9)

 ‘एक साहित्यिक की डायरी’, ‘कामायनी एक पुनर्विचार’, ‘नयी कविता का आत्मसंघर्ष’, ‘नए साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र’ तथा ‘भारत इतिहास और संस्कृति’ मुक्तिबोध की महत्वपूर्ण आलोचनात्मक कृतियाँ हैं. ‘चांद का मुंह टेढ़ा है’ तथा ‘भूरी भूरी खाक धूल’ उनके काव्य संग्रह हैं, ‘काठ का सपना’ तथा ‘सतह से उठता आदमी’ उनके कहानी संग्रह हैं और ‘विपात्र’ उपन्यास है.

उन्होंने सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनो प्रकार की समीक्षाएं लिखी हैं. ‘नयी कविता का आत्मसंघर्ष तथा अन्य निबंध’ के अधिकाँश निबंध सैद्धांतिक विषयों पर हैं, जैसे ‘काव्य की रचना प्रक्रिया’, ‘सौन्दर्य प्रतीति और सामाजिक दृष्टि’, ‘नवीन समीक्षा का आधार’, ‘समीक्षा की समस्याएं’, ‘साहित्य और जिज्ञासा’ आदि. व्यावहारिक समीक्षा की दृष्टि से ‘शमशेर मेरी दृष्टि में’, ‘सुमित्रानंदन पंत : एक विश्लेषण’ आदि महत्वपूर्ण हैं. किन्तु उनकी व्यावहारिक समीक्षा की सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक ‘कामायनी : एक पुनर्विचार’ है. नेमिचंद्र जैन के संपादन में उनकी ग्रंथावली ‘मुक्तिबोध रचनावली’ के नाम से छह खंडों में प्रकाशित हो चुकी है. 

मुक्तिबोध की आलोचना, लेखक और रचना के प्रति गहरी हार्दिकता के कारण विश्वसनीय आलोचना है. यह कृति और कृतिकार के माध्यम से अपनी सभ्यता की व्यापक समीक्षा में प्रवृत्त आलोचना है. मुक्तिबोध ने छायावादी कविता के प्रति सकारात्मक रुख अपनाया और उसकी प्रगतिशील भूमिका का समर्थन किया. मार्क्सवादी नजरिए से उनके द्वारा की गई कामायनी की समीक्षा बहुत महत्वपूर्ण है. कामायनी की समीक्षा करते हुए उन्होंने प्रतिपादित किया है कि जीवन यथार्थ से उत्पन्न समस्याओं का जो समाधान प्रसाद ने प्रस्तुत किया है वह वायवीय और अव्यावहारिक है. ‘कामायनी एक पुनर्विचार’ के आरंभ में ही उन्होंने अपना दृष्टिकोण व्यक्त करते हुए लिखा हैं, “आलोचक का यह धर्म है कि वह कामायनी में उपस्थित जीवन -समस्या की, उस आवयविक रूप से संलग्न परिवेश- परिस्थिति की तथा इन दोनो के संबंध में कवि-दृष्टि की तथा उस जीवन-समस्या के कवि-कृत निदान की, समीक्षा करे.” ( कामायनी : एक पुनर्विचार, मुक्तिबोध रचनावली-4, पृष्ठ-195 ) वे अपनी मार्क्सवादी आलोचना दृष्टि का परिचय देते हुए प्रसाद में वैज्ञानिक इतिहास-दृष्टि की अपेक्षा करते हैं. वे लिखते हैं, ”प्रसाद के पास ऐतिहासिक बुद्धि थी पर कोई वैज्ञानिक इतिहास-दृष्टि न थी. वैदिक कथानक उनके लिए एक विशाल फैन्टेसी का काम करता है.” ( उपर्युक्त, पृष्ठ-203)  वे लिखते हैं, “ अधिक से अधिक प्रसाद जी के संबंध में यह कहा जा सकता है कि उनका दर्शन एक उदार पूंजीवादी व्यक्तिवादी दर्शन है, जो यदि एक मुंह से वर्ग-विषमता की निन्दा करते हैं तो दूसरे मुंह से वर्गातीत, समाजातीत, व्यक्तिमूलक चेतना के आधार पर समाज के वास्तविक द्वंन्द्वों का वायवीय तथा काल्पनिक प्रत्याहार करते हुए अभेदानुभूति के आनंद का ही संदेश देते है. निश्चय ही समाजातीत, वर्गातीत, व्यक्तिमूलक, आनंदवादी अद्वैतवाद अपने अन्तिम निष्कर्षों में उसी विषमतापूर्ण समाज की स्थिति में कुछ सतही ऊपरी परिवर्तन करके संतुष्ट है.” ( कामायनी : एक पुनर्विचार, मुक्तिबोध रचनावली -4, पृष्ठ- 236)

मुक्तिबोध की आलोचना दृष्टि के संघर्ष का बड़ा हिस्सा नयी कविता के व्यक्तिवादी –कलावादी अंतर्मुखी साहित्य-सिद्धांतों से मुठभेड़ को लेकर है. वे जड़ीभूत सौन्दर्याभिरुचि के सिद्धांतों पर प्रहार करते हैं. ‘काव्य : एक सांस्कृतिक प्रक्रिया’ नामक निबंध में मुक्तिबोध स्थापित करते हैं कि काव्य में सांस्कृतिक परंपरा का समाहार होता है और उसके मूल्य वैयक्तिक न होकर सामाजिक होते हैं. वे इसी अर्थ में प्रयोगवाद तथा नयी कविता को भी सांस्कृतिक परंपरा का अंग मानते हैं. मुक्तिबोध के अनुसार मन के भीतर अंतर्तत्व को कला वस्तु बनने के लिए मन की आँखों के सामने क्रमश: तरंगायित, उद्घाटित, आलोकित और अभिव्यक्ति के लिए आतुर होना आवश्यक है. इसी क्रम में मुक्तिबोध कला के तीन क्षणों की व्याख्या प्रस्तुत करके कला की रचना –प्रक्रिया को स्पष्ट करते हैं. वे कहते हैं, “ तरंगायित होने का संबंध आवेग से है. उद्घाटित होने की अवस्था का संबंध बोध- पक्ष से है. –ऐसे बोध- पक्ष से जो ज्ञानात्मक आधार पर स्थित होकर व्यक्ति-बद्धता की स्थिति से अनुभवकर्ता को ऊंचा कर देता है. वस्तुत: यहीं से रूप -पक्ष भी आरंभ हो जाता है.  मनस्तत्व यहाँ रूप लेकर प्रस्तुत होता है. “ ( मुक्तिबोध रचनावली -5, पृष्ठ- 101). 

कला का द्वितीय क्षण तबसे आरंभ होता है जब वह मनस्तत्व अन्य अनुभवों से जुड़कर अधिक संश्लेषित और कल्पनालोकित हो जाता है. इस स्थिति में उसमें व्यापक अर्थ आ जाता है,  वह अधिक सामान्य हो जाता है. व्यक्ति-बद्धता की स्थिति समाप्त हो जाती है और अनुभव कर्ता इस सामान्यीकृत मनस्तत्व को शब्द-स्वर- रंग में अभिव्यक्त करने के लिए आतुर हो जाता है. यहां से कला का तीसरा क्षण आरंभ होता है. इस तीसरे क्षण में जब मनस्तत्व बाह्योन्मुख होकर अपने अनुकूल रूप लेकर मूर्त होता है तब प्रथम और द्वितीय क्षणों से प्राप्त रूप पक्ष बहुत कुछ बदल जाते हैं.  परिणामत: पूर्ण की हुई कविता, पूर्ण की हुई कलाकृति, अपनी पूर्वगत तत्वानुभूति की वास्तविकता से बहुत कुछ भिन्न हो जाती है. “(उपर्युक्त, पृष्ठ 102) 

अपनी इस पूरी स्थापना को निष्कर्ष के रूप में प्रस्तुत करते हुए मुक्तिबोध कहतें हैं, “ जिस प्रकार हम जीवन में बाह्य- जीवन- जगत को अपने आभ्यंतर में संशोधित संपादित कर आत्मसात करते जाते हैं, उसी तरह हम शब्दों द्वारा आत्मसातकृत को बाह्यगत करते जाते हैं, चाहे ये शब्द साधारण बात- चीत में प्रकट हों, भाषणों में, लेखों मे प्रकट हों अथवा छंद- लय में उद्घाटित हों.” ( उपर्युक्त, पृष्ठ 102) मुक्तिबोध मानते हैं कि छायावादियों और प्रगतिवादियों की तरह नयी कविता के पास कोई दार्शनिक विचारधारा नहीं है. नयी कविता को बौद्धिकता की कविता कहते हुए वे उसकी सीमा तय कर देते हैं.

रचना के प्रति अपनी समाजशास्त्रीय दृष्टि का परिचय देते हुए वे लिखते हैं, “हम जिस समाज, संस्कृति, परंपरा, युग और ऐतिहासिक आवर्त में रहते हैं उन सबका प्रभाव हमारे हृदय का संस्कार करता है. हमारी आत्मा में जो कुछ है वह समाज प्रदत्त है- चाहे वह निष्कलुष अनिंद्य सौन्दर्य का आदर्श ही क्यों न हो. हमारा सामाजिक व्यक्तित्व हमारी आत्मा है. आत्मा का सारा सार तत्व प्राकृत रूप से सामाजिक है. व्यक्ति और समाज का विरोध बौद्धिक विक्षेप है, इस विरोध का कोई अस्तित्व नहीं.” ( नयी कविता का आत्मसंघर्ष, मुक्तिबोध रचनावली-5, पृष्ठ -188)

मुक्तिबोध वर्ग-संघर्ष, जन -क्रान्ति, सामाजिक –सांस्कृतिक पुनर्निर्माण तथा मानव की वृहत्तर संभावनाओं में निष्ठा रखने वाले समीक्षक हैं. साहित्य में वे व्यक्तिवादी मूल्यों के खण्डन के साथ ही सामाजिक तथा लोकमंगलवादी मूल्यों की प्रतिष्ठा के प्रति निरंतर सचेष्ट रहते हैं. कलाकार को सौन्दर्यपरक भावों की अभिव्यक्ति तक सीमित करने का प्रयास संसार भर के कलावादी आरंभ से ही करते आए हैं. यह सिद्धांत मुक्तिबोध की दृष्टि में मानव विरोधी तथा जन विरोधी है, इसलिए मुक्तिबोध जीवनानुभूति तथा सौन्दर्यानुभूति में पार्थक्य स्थापित करने वाले इस सिद्धांत को एक खतरनाक सिद्धांत और पूंजीवादी साजिश मानते हैं. 

‘ज्ञानात्मक संवेदना’ मुक्तिबोध द्वारा प्रयुक्त एक चर्चित पारिभाषिक शब्द है जिसका प्रयोग उन्होंने रचना प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए नई कविता के संदर्भ में किया है. मुक्तिबोध ज्ञान का संबंध वाह्य जगत से मानते हैं जबकि संवेदना का संबंध व्यक्ति के अंतर्जगत से है. इस प्रकार ‘ज्ञानात्मक संवेदना’ का तात्पर्य हुआ, वह संवेदना जो ज्ञान से परिपूर्ण हो. ज्ञानात्मक संवेदना की स्थिति में रचनाकार स्व से ऊपर उठ जाता है. मुक्तिबोध के ही शब्दों में, “अपने से परे जाने, अपने से ऊपर उठने, दूसरों से अपने को मिलाने, विशिष्ट से सामान्य पर पहुंचने की यह जो ज्ञानात्मक संवेदना की दशा है, ज्ञानात्मक अनुभवों की दशा है, वह सबमें होती है.“(  उपर्युक्त, पृष्ठ 189)

इस तरह ‘ज्ञानात्मक संवेदना’ और ‘संवेदनात्मक ज्ञान’ को एकमेक करके ही लेखक जीवन विवेक विकसित करता है. मुक्तिबोध के अनुसार लेखक अपनी मूल्य भावना के अनुसार आभ्यंतर भावों को प्रस्तुत करता है और उसके अंत:करण में एक मूल्य भावना होती है जो उसे किन्हीं विशेष भावों को प्रकट करने के लिए तैयार करती रहती है. दूसरे शब्दों में लेखक अपना एक एस्थेटिक्स तैयार कर लेता है.  इस तरह मुक्तिबोध ने मार्क्सवादी सौन्दर्यशास्त्र को हिन्दी में नए ढंग से प्रस्तुत किया है.

मुक्तिबोध ने भक्ति आन्दोलन का भी नई दृष्टि से मूल्यांकन किया और स्थापित किया कि यह मूलत: निचली जातियों का सवर्ण जातियों के खिलाफ विद्रोह था. बाद में सवर्ण जातियों ने इस महान आन्दोलन पर नियंत्रण कर लिया.

अपने समीक्षा सिद्दांतों में मुक्तिबोध ने कलाकार की व्यक्तिगत ईमानदारी को बहुत महत्व दिया है. उनका विश्वास है कि यदि लेखक ईमानदार है, तो उसे अपने प्रति और अपने युग के प्रति अधिक उत्तरदायी होना होगा. अधिक साहस और ज्यादा हिम्मत से काम लेना होगा. अपनी सौन्दर्याभिरुचि के सेन्सर्स के वशीभूत होना ठीक नहीं है. अनुभव वृद्धि के साथ- साथ सौन्दर्याभिरुचि का विस्तार और पुन: संस्कार होना आवश्यक है. मुक्तिबोध इसीलिए ‘आनेस्टी’ तथा ‘सिंसियरिटी’ दोनो को कलाकार की ईमानदारी में आवश्यक मानते हैं. उन्होंने रचना प्रक्रिया का विवेचन भाववादी चिन्तन- पद्धति से मुक्त होकर किया है. इसलिए वे रचना प्रक्रिया के मानसिक व्यापार तक ही सीमित न होकर उसके वस्तुपरक आकलन तक आते हैं और रचना को क्षण- विशेष की उपज न मानकर सुदीर्घ मन: प्रक्रिया का परिणाम मानते है. इस तरह मुक्तिबोध की आलोचना में रचनाकार की ईमानदारी को जितना महत्व दिया गया है उतना ही आलोचक के चरित्र को भी. 

फिलहाल, मार्क्सवादी समीक्षकों में मुक्तिबोध की पहचान किंचित विवादास्पद रही है. रामविलास शर्मा ने उनपर अस्तित्ववाद का प्रभाव भी अनुभव किया है और उनके महत्व के आकलन में कोताही बरती है. कुछ लोगों का मानना है कि भाववादी चिन्तन के संस्कार उनमें अन्त तक बने रहे. दरअसल मुक्तिबोध आत्मालोचन करते हैं, अपने से लड़ते हैं, आत्मसंघर्ष करते हैं. इसे ही कुछ लोगों ने उनके भीतर के अंतर्विरोध के रूप में रेखांकित किया है. वस्तुत: इसे एक सच्चे लेखक के आत्मसंघर्ष के रूप में रेखांकित किया जाना चाहिए. इस संबंध में एक तथ्य यह भी है कि उन्होंने प्रगतिवादी समीक्षा की कमजोरियों को भी बड़ी बेबाकी से ‘समीक्षा की समस्याएं’ शीर्षक अपने निबंध में रेखांकित किया है. आम मार्क्सवादी समीक्षकों को इसे सहज स्वीकार कर पाना आसान नहीं है. 

 मुक्तिबोध को सभ्यता समीक्षक के रूप में रेखांकित करते हुए मैनेजर पाण्डेय ने लिखा है, “मुक्तबोध सभ्यता समीक्षा के लिए सत्-चित्-आनंद के बदले सत्-चित्-वेदना का बोध जरूरी समझते हैं, जिससे पैदा होती है सत्ताओं द्वारा सताए हुए लोगों के प्रति गहरी संवेदनशीलता, जो मुक्तिधर्मी आलोचना की शक्ति का स्रोत है और उसकी सामाजिकता की एक जरूरी शर्त भी.  सभ्यता समीक्षा रचना और आलोचना के बीच समानधर्मिता स्वीकार करती है. वह आलोचना से रचना के साथ चलने की मांग करती है, उसके पीछे- पीछे नहीं.  इसलिए वह आलोचना को रचना की सीमाओं से सावधान और मुक्त करने की स्वतंत्रता भी देती है.” ( उद्धृत, दस्तावेज, -152 / जुलाई-सितंबर 2016, पृष्ठ- 8) 

वर्ष 2017 मुक्तिबोध का जन्म -शताब्दी वर्ष था. इस वर्ष मुक्तिबोध पर भरपूर विवेचन -विश्लेषण हुआ. उनपर हिन्दी की अधिकाँश महत्वपूर्ण पत्रिकाओं ने विशेषांक प्रकाशित किए. देश के विभिन्न हिस्सों मे उनपर गोष्ठियाँ हुईं. इन सबसे मुक्तिबोध के महत्व की व्यापक स्वीकृति का पता चलता है.

हम जन्मदिन के अवसर पर मुक्तिबोध के असाधारण साहित्यिक अवदान का स्मरण करते हैं और उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं.

©प्रो. अमरनाथ


  डॉ. अमरनाथ : संक्षिप्त जीवन वृत्त

सुधी आलोचक और प्रतिष्ठित भाषाविद् के रूप में ख्यात डॉ. अमरनाथ का जन्म गोरखपुर जनपद ( संप्रति महाराजगंज ) के रामपुर बुजुर्ग नामक गाँव में सन् 1954 में हुआ। उनकी आरंभिक शिक्षा गांव के आस पास के विद्यालयों में और उच्च शिक्षा गोरखपुर विश्वविद्यालय में हुई जहाँ से उन्होंने एम.ए. और पी-एच.डी की उपाधियाँ प्राप्त कीं। कविता से अपनी रचना - यात्रा शुरू करने वाले डॉ. अमरनाथ सामाजिक - आर्थिक विषमता से जुड़े सवालों से लगातार जूझते रहे हैं। उनका विश्वास है कि लेखन में शक्ति सामाजिक संघर्षों से आती है। इसी विश्वास ने उन्हें नारी का मुक्ति संघर्ष जैसे साहित्येतर विषय पर पुस्तक लिखने को बाध्य किया।हिन्दी जाति, आचार्य रामचंद्र शुक्ल और परवर्ती आलोचनाआचार्य रामचंद्र शुक्ल का काव्य चिंतनसमकालीन शोध के आयाम (सं.),हिन्दी का भूमंडलीकरण (सं.), हिन्दी भाषा का समाजशास्त्र (सं.), सदी के अन्त में हिन्दी (सं.), बाँसगाँव की विभूतियाँ (सं.) आदि उनकी अन्य प्रकाशित पुस्तकें हैं।

 हिन्दी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली जैसा वृहद् ग्रंथ उनके अध्यवसाय और शोध दृष्टि का उत्कृष्ट उदाहरण है।

           हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के बीच सेतु निर्मित करने एवं भारतीय भाषाओं की प्रतिष्ठा के उद्देश्य से अपनी भाषा नामक संस्था के गठन और संचालन में केन्द्रीय भूमिका निभाने वाले डॉ. अमरनाथ, संस्था की पत्रिका भाषा विमर्श का सन् 2000 से संपादन कर रहे हैं। हिन्दी परिवार को टूटने से बचाने और उसकी बोलियों को हिन्दी के साथ संगठित रखने के उद्देश्य से गठित संगठन हिन्दी बचाओ मंच के संयोजक के रूप में डॉ. अमरनाथ निरंतर संघर्षरत हैं। वे सीएसएफडी चैरिटेबुल ट्रस्ट के मुख्य ट्रस्टी तथा उसकी पत्रिका गाँव के भी संपादक हैं.

 कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर तथा अध्यक्ष पद से अवकाश ग्रहण करने के बाद वे स्वतंत्र लेखन तथा सामाजिक कार्यों में संलग्न हैं। आजकल वे हिन्दी के आलोचकहिन्दी के योद्धा तथा आजाद भारत के असली सितारे शीर्षकों से नियमित स्तंभ लिख रहे हैं।

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               {मुक्तिबोध अपने पत्नी के साथ}

मुक्तिबोध की कलम से 
(13 नवम्बर 1917 - 11 सितम्बर 1964)

१.
अंधेरे में कविता का  ये अंश आप भी पढ़िए

अकस्मात् 
चार का ग़जर कहीं खड़का 
मेरा दिल धड़का, 
उदास मटमैला मनरूपी वल्मीक 
चल-विचल हुआ सहसा। 
अनगिनत काली-काली हायफ़न-डैशों की लीकें 
बाहर निकल पड़ीं, अन्दर घुस पड़ीं भयभीत, 
सब ओर बिखराव। 
मैं अपने कमरे में यहाँ लेटा हुआ हूँ। 
काले-काले शहतीर छत के 
हृदय दबोचते। 
यद्यपि आँगन में नल जो मारता, 
जल खखारता। 
किन्तु न शरीर में बल है 
अँधेरे में गल रहा दिल यह। 

एकाएक मुझे भान होता है जग का, 
अख़बारी दुनिया का फैलाव, 
फँसाव, घिराव, तनाव है सब ओर, 
पत्ते न खड़के, 
सेना ने घेर ली हैं सड़कें। 
बुद्धि की मेरी रग 
गिनती है समय की धक्-धक्। 
यह सब क्या है 
किसी जन-क्रान्ति के दमन-निमित्त यह 
मॉर्शल-लॉ है! 
दम छोड़ रहे हैं भाग गलियों में मरे पैर, 
साँस लगी हुई है, 
ज़माने की जीभ निकल पड़ी है, 
कोई मेरा पीछा कर रहा है लगातार 
भागता मैं दम छोड़, 
घूम गया कई मोड़, 
चौराहा दूर से ही दीखता, 
वहाँ शायद कोई सैनिक पहरेदार 
नहीं होगा फ़िलहाल 
दिखता है सामने ही अन्धकार-स्तूप-सा 
भयंकर बरगद-- 
सभी उपेक्षितों, समस्त वंचितों, 
ग़रीबों का वही घर,वही छत, 
उसके ही तल-खोह-अँधेरे में सो रहे 
गृह-हीन कई प्राण। 
अँधेरे में डूब गये 
डालों में लटके जो मटमैले चिथड़े 
किसी एक अति दीन 
पागल के धन वे। 
हाँ, वहाँ रहता है, सिर-फिरा एक जन। 

किन्तु आज इस रात बात अजीब है। 
वही जो सिर फिरा पागल क़तई था 
आज एकाएक वह 
जागृत बुद्धि है, प्रज्वलत् धी है। 
छोड़ सिरफिरापन, 
बहुत ऊँचे गले से, 
गा रहा कोई पद, कोई गान 
आत्मोद्बोधमय!! 
खूब भई,खूब भई, 
जानता क्या वह भी कि 
सैनिक प्रशासन है नगर में वाक़ई! 
क्या उसकी बुद्धि भी जग गयी! 

(करुण रसाल वे हृदय के स्वर हैं 
गद्यानुवाद यहाँ उनका दिया जा रहा है) 

"ओ मेरे आदर्शवादी मन, 
ओ मेरे सिद्धान्तवादी मन, 
अब तक क्या किया? 
जीवन क्या जिया!! 

उदरम्भरि बन अनात्म बन गये, 
भूतों की शादी में क़नात-से तन गये, 
किसी व्यभिचारी के बन गये बिस्तर, 

दुःखों के दाग़ों को तमग़ों-सा पहना, 
अपने ही ख़यालों में दिन-रात रहना, 
असंग बुद्धि व अकेले में सहना, 
ज़िन्दगी निष्क्रिय बन गयी तलघर, 
अब तक क्या किया, 
जीवन क्या जिया!! 
बताओ तो किस-किसके लिए तुम दौड़ गये, 
करुणा के दृश्यों से हाय! मुँह मोड़ गये, 
बन गये पत्थर, 
बहुत-बहुत ज़्यादा लिया, 
दिया बहुत-बहुत कम, 
मर गया देश, अरे जीवित रह गये तुम!! 
लो-हित-पिता को घर से निकाल दिया, 
जन-मन-करुणा-सी माँ को हंकाल दिया, 
स्वार्थों के टेरियार कुत्तों को पाल लिया, 
भावना के कर्तव्य--त्याग दिये, 
हृदय के मन्तव्य--मार डाले! 
बुद्धि का भाल ही फोड़ दिया, 
तर्कों के हाथ उखाड़ दिये, 
जम गये, जाम हुए, फँस गये, 
अपने ही कीचड़ में धँस गये!! 
विवेक बघार डाला स्वार्थों के तेल में 
आदर्श खा गये! 

अब तक क्या किया, 
जीवन क्या जिया, 
ज़्यादा लिया और दिया बहुत-बहुत कम 
मर गया देश, अरे जीवित रह गये तुम..." 

मेरा सिर गरम है, 
इसीलिए गरम है। 
सपनों में चलता है आलोचन, 
विचारों के चित्रों की अवलि में चिन्तन। 
निजत्व-माफ़ है बेचैन, 
क्या करूँ, किससे कहूँ, 
कहाँ जाऊँ, दिल्ली या उज्जैन? 
वैदिक ऋषि शुनःशेप के 
शापभ्रष्ट पिता अजीर्गत समान ही 
व्यक्तित्व अपना ही, अपने से खोया हुआ 
वही उसे अकस्मात् मिलता था रात में, 
पागल था दिन में 
सिर-फिरा विक्षिप्त मस्तिष्क। 

हाय, हाय! 
उसने भी यह क्या गा दिया, 
यह उसने क्या नया ला दिया, 
प्रत्यक्ष, 
मैं खड़ा हो गया 
किसी छाया मूर्ति-सा समक्ष स्वयं के 
होने लगी बहस और 
लगने लगे परस्पर तमाचे। 
छिः पागलपन है, 
वृथा आलोचन है। 
गलियों में अन्धकार भयावह-- 
मानो मेरे कारण ही लग गया 
मॉर्शल-लॉ वह, 
मानो मेरी निष्क्रिय संज्ञा ने संकट बुलाया, 
मानो मेरे कारण ही दुर्घट 
हुई यह घटना। 
चक्र से चक्र लगा हुआ है.... 
जितना ही तीव्र है द्वन्द्व क्रियाओं घटनाओं का 
बाहरी दुनिया में, 
उतनी ही तेजी से भीतरी दुनिया में, 
चलता है द्वन्द्व कि 
फ़िक्र से फ़िक्र लगी हुई है। 
आज उस पागल ने मेरी चैन भुला दी, 
मेरी नींद गवाँ दी। 

मैं इस बरगद के पास खड़ा हूँ। 
मेरा यह चेहरा 
घुलता है जाने किस अथाह गम्भीर, साँवले जल से, 
झुके हुए गुमसुम टूटे हुए घरों के 
तिमिर अतल से 
घुलता है मन यह। 
रात्रि के श्यामल ओस से क्षालित 
कोई गुरू-गम्भीर महान् अस्तित्व 
महकता है लगातार 
मानो खँडहर-प्रसारों में उद्यान 
गुलाब-चमेली के, रात्रि-तिमिर में, 
महकते हों, महकते ही रहते हों हर पल। 
किन्तु वे उद्यान कहाँ हैं, 
अँधेरे में पता नहीं चलता। 
मात्र सुगन्ध है सब ओर, 
पर, उस महक--लहर में 
कोई छिपी वेदना, कोई गुप्त चिन्ता 
छटपटा रही है।

२.
भूल-ग़लती
गजानन माधव मुक्तिबोध

आज बैठी है ज़िरहबख्तर पहनकर
तख्त पर दिल के,
चमकते हैं खड़े हथियार उसके दूर तक,
आँखें चिलकती हैं नुकीले तेज पत्थर सी,
खड़ी हैं सिर झुकाए
सब कतारें
बेजुबाँ बेबस सलाम में,
अनगिनत खम्भों व मेहराबों-थमे
दरबारे आम में।

सामने
बेचैन घावों की अज़ब तिरछी लकीरों से कटा
चेहरा
कि जिस पर काँप
दिल की भाप उठती है...
पहने हथकड़ी वह एक ऊँचा कद
समूचे जिस्म पर लत्तर
झलकते लाल लम्बे दाग
बहते खून के
वह क़ैद कर लाया गया ईमान...
सुलतानी निगाहों में निगाहें डालता,
बेख़ौफ नीली बिजलियों को फैंकता
खामोश !!
सब खामोश
मनसबदार
शाइर और सूफ़ी,
अल गजाली, इब्ने सिन्ना, अलबरूनी
आलिमो फाजिल सिपहसालार, सब सरदार
हैं खामोश !!

नामंजूर
उसको जिन्दगी की शर्म की सी शर्त
नामंजूर हठ इनकार का सिर तान..खुद-मुख्तार
कोई सोचता उस वक्त-
छाये जा रहे हैं सल्तनत पर घने साये स्याह,
सुलतानी जिरहबख्तर बना है सिर्फ मिट्टी का,
वो-रेत का-सा ढेर-शाहंशाह,
शाही धाक का अब सिर्फ सन्नाटा !!
(लेकिन, ना
जमाना साँप का काटा)
भूल (आलमगीर)
मेरी आपकी कमजोरियों के स्याह
लोहे का जिरहबख्तर पहन, खूँखार
हाँ खूँखार आलीजाह,
वो आँखें सचाई की निकाले डालता,
सब बस्तियाँ दिल की उजाड़े डालता
करता हमे वह घेर
बेबुनियाद, बेसिर-पैर..
हम सब क़ैद हैं उसके चमकते तामझाम में
शाही मुकाम में !!

इतने में हमीं में से
अजीब कराह सा कोई निकल भागा
भरे दरबारे-आम में मैं भी
सँभल जागा
कतारों में खड़े खुदगर्ज-बा-हथियार
बख्तरबंद समझौते
सहमकर, रह गए,
दिल में अलग जबड़ा, अलग दाढ़ी लिए,
दुमुँहेपन के सौ तज़ुर्बों की बुज़ुर्गी से भरे,
दढ़ियल सिपहसालार संजीदा
सहमकर रह गये !!

लेकिन, उधर उस ओर,
कोई, बुर्ज़ के उस तरफ़ जा पहुँचा,
अँधेरी घाटियों के गोल टीलों, घने पेड़ों में
कहीं पर खो गया,
महसूस होता है कि यह बेनाम
बेमालूम दर्रों के इलाक़े में
(सचाई के सुनहले तेज़ अक्सों के धुँधलके में)
मुहैया कर रहा लश्कर;
हमारी हार का बदला चुकाने आयगा
संकल्प-धर्मा चेतना का रक्तप्लावित स्वर,
हमारे ही हृदय का गुप्त स्वर्णाक्षर
प्रकट होकर विकट हो जायगा !!

३.
कहने दो उन्हें जो यह कहते हैं
 गजानन माधव मुक्तिबोध

#कहने दो उन्हें जो यह कहते हैं –
'सफल जीवन बिताने में हुए असमर्थ तुम!
तरक़्क़ी के गोल-गोल
घुमावदार चक्करदार
ऊपर बढ़ते हुए ज़ीने पर चढ़ने की
चढ़ते ही जाने की
उन्नति के बारे में
तुम्हारी ही ज़हरीली
उपेक्षा के कारण, निरर्थक तुम, व्यर्थ तुम!!'

कटी-कमर भीतों के पास खड़े ढेरों और
ढूहों में खड़े हुए खंभों के खँडहर में
बियाबान फैली है पूनों की चाँदनी,
आँगनों के पुराने-धुराने एक पेड़ पर।
अजीब-सी होती है, चारों ओर
वीरान-वीरान महक सुनसानों की
पूनों की चाँदनी की धूलि की धुंध में।
वैसे ही लगता है, महसूस यह होता है
'उन्नति' के क्षेत्रों में, 'प्रतिष्ठा' के क्षेत्रों में
मानव की छाती की, आत्मा की, प्राणी की
सोंधी गंध
कहीं नहीं, कहीं नहीं
पूनों की चांदनी यह सही नहीं, सही नहीं;
केवल मनुष्यहीन वीरान क्षेत्रों में
निर्जन प्रसारों पर
सिर्फ़ एक आँख से
'सफलता' की आँख से
दुनिया को निहारती फैली है
पूनों की चांदनी।
सूखे हुए कुओं पर झुके हुए झाड़ों में
बैठे हुए घुग्घुओं व चमगादड़ों के हित
जंगल के सियारों और
घनी-घनी छायाओं में छिपे हुए
भूतों और प्रेतों तथा
पिचाशों और बेतालों के लिए –
मनुष्य के लिए नहीं – फैली यह
सफलता की, भद्रता की,
कीर्ति यश रेशम की पूनों की चांदनी।

#मुझको डर लगता है,
मैं भी तो सफलता के चंद्र की छाया मे
घुग्घू या सियार या
भूत नहीं कहीं बन जाऊँ।
उनको डर लगता है
आशंका होती है
कि हम भी जब हुए भूत
घुग्घू या सियार बने
तो अभी तक यही व्यक्ति
ज़िंदा क्यों?
उसकी वह विक्षोभी सम्पीड़ित आत्मा फिर
जीवित क्यों रहती है?
मरकर जब भूत बने
उसकी वह आत्मा पिशाच जब बन जाए
तो नाचेंगे साथ-साथ सूखे हुए पथरीले झरनों के तीरों पर
सफलता के चंद्र की छाया में अधीर हो।
इसीलिए,
इसीलिए,
उनका और मेरा यह विरोध
चिरंतन है, नित्य है, सनातन है।
उनकी उस तथाकथित
जीवन-सफलता के
खपरैलों-छेदों से
खिड़की की दरारों से
आती जब किरणें हैं
तो सज्जन वे, वे लोग
अचंभित होकर, उन दरारों को, छेदों को
बंद कर देते हैं;
इसीलिए कि वे किरणें
उनके लेखे ही आज
कम्यूनिज़्म है...गुंडागर्दी है...विरोध है,
जिसमें छिपी है कहीं
मेरी बदमाशी भी।

#मैं पुकारकर कहता हूँ –
'सुनो, सुननेवालों।
पशुओं के राज्य में जो बियाबान जंगल है
उसमें खड़ा है घोर स्वार्थ का प्रभीमकाय
बरगद एक विकराल।
उसके विद्रूप शत
शाखा-व्यूहों निहित
पत्तों के घनीभूत जाले हैं, जाले हैं।
तले में अंधेरा है, अंधेरा है घनघोर...
वृक्ष के तने से चिपट
बैठा है, खड़ा है कोई
पिशाच एक ज़बर्दस्त मरी हुई आत्मा का,
वह तो रखवाला है
घुग्घू के, सियारों के, कुत्तों के स्वार्थों का।
और उस जंगल में, बरगद के महाभीम
भयानक शरीर पर खिली हुई फैली है पूनों की चांदनी
सफलता की, भद्रता की,
श्रेय-प्रेय-सत्यं-शिवं-संस्कृति की
खिलखिलाती चांदनी।
अगर कहीं सचमुच तुम
पहुँच ही वहाँ गए
तो घुग्घू बन जाओगे।
आदमी कभी भी फिर
कहीं भी न मिलेगा तुम्हें।
पशुओं के राज्य में
जो पूनों की चांदनी है
नहीं वह तुम्हारे लिए
नहीं वह हमारे लिए।

तुम्हारे पास, हमारे पास,
सिर्फ़ एक चीज़ है –
ईमान का डंडा है,
बुद्धि का बल्लम है,
अभय की गेती है
हृदय की तगारी है – तसला है
नए-नए बनाने के लिए भवन
आत्मा के,
मनुष्य के,
हृदय की तगारी में ढोते हैं हमीं लोग
जीवन की गीली और
महकती हुई मिट्टी को।
जीवन-मैदानों में
लक्ष्य के शिखरों पर
नए किले बनाने में
व्यस्त हैं हमीं लोग
हमारा समाज यह जुटा ही रहता है।
पहाड़ी चट्टानों को
चढ़ान पर चढ़ाते हुए
हज़ारों भुजाओं से
ढकेलते हुए कि जब
पूरा शारीरिक ज़ोर
फुफ्फुस की पूरी साँस
छाती का पूरा दम
लगाने के लक्षण-रूप
चेहरे हमारे जब
बिगड़ से जाते हैं –
सूरज देख लेता है
दिशाओं के कानों में कहता है –
दुर्गों के शिखर से
हमारे कंधे पर चढ़
खड़े होने वाले ये
दूरबीन लगा कर नहीं देखेंगे –
कि मंगल में क्या-क्या है!!
चंद्रलोक-छाया को मापकर
वहाँ के पहाड़ों की उँचाई नहीं नापेंगे,
वरन् स्वयं ही वे
विचरण करेंगे इन नए-नए लोकों में,
देश-काल-प्रकृति-सृष्टि-जेता ये।
इसलिए अगर ये लोग
सड़क-छाप जीवन की धूल-धूप
मामूली रूप-रंग
लिए हुए होने से
तथाकथित 'सफलता' के
खच्चरों व टट्टुओं के द्वारा यदि
निरर्थक व महत्वहीन
क़रार दिए जाते हों
तो कहने दो उन्हें जो यह कहते हैं।

#सामाजिक महत्व की
गिलौरियाँ खाते हुए,
असत्य की कुर्सी पर
आराम से बैठे हुए,
मनुष्य की त्वचाओं का पहने हुए ओवरकोट,
बंदरों व रीछों के सामने
नई-नई अदाओं से नाच कर
झुठाई की तालियाँ देने से, लेने से,
सफलता के ताले ये खुलते हैं,
बशर्ते कि इच्छा हो
सफलता की,
महत्वाकांक्षा हो
अपने भी बरामदे
में थोड़ा सा फर्नीचर,
विलायती चमकदार
रखने की इच्छा हो
तो थोड़ी सी सचाई में
बहुत-सी झुठाई घोल
सांस्कृतिक अदा से, अंदाज़ से
अगर बात कर सको –

भले ही दिमाग़ में
ख़्यालों के मरे हुए चूहे ही
क्यों न हों प्लेग के,
लेकिन, अगर कर सको
ऐसी जमी हुई ज़बान-दराजी और
सचाई का अंग-भंग
करते हुए झूठ का
बारीक सूत कात सको
तो गतिरोध और कंठरोध
मार्गरोध कभी भी न होगा फिर
कटवा चुके हैं हम पूंछ-सिर
तो तुम ही यों
हमसे दूर बाहर क्यों जाते हो?
जवाब यह मेरा है,
जाकर उन्हें कह दो कि सफलता के जंग-खाए
तालों और कुंजियों
की दुकान है कबाड़ी की।
इतनी कहाँ फुरसत हमें –
वक़्त नहीं मिलता है
कि दुकान पर जा सकें।
अहंकार समझो या सुपीरियारिटी कांपलेक्स
अथवा कुछ ऐसा ही
चाहो तो मान लो,
लेकिन सच है यह
जीवन की तथाकथित
सफलता को पाने की
हमको फुरसत नहीं,
खाली नहीं हैं हम लोग!!
बहुत बिज़ी हैं हम।
जाकर उन्हें कह दे कोई
पहुँचा दे यह जवाब;
और अगर फिर भी वे
करते हों हुज्जत तो कह दो कि हमारी साँस
जिसमें है आजकल
के रब्त-ज़ब्त तौर-तरीकों की तरफ़
ज़हरीली कड़ुवाहट,
ज़रा सी तुम पी लो तो
दवा का एक डोज़ समझ,
तुम्हारे दिमाग़ के
रोगाणु मर जाएंगे
व शरीर में, मस्तिष्क में,
ज़बर्दस्त संवेदन-उत्तेजन
इतना कुछ हो लेगा
कि अकुलाते हुए ही, तुम
अंधेरे के ख़ीमे को त्यागकर
उजाले के सुनहले मैदानों में
भागते आओगे;
जाकर उन्हें कह दे कोई,
पहुँचा दे यह जवाब!!

४.

अगर मेरी कविताएं पसन्‍द नहीं
उन्‍हें जला दो, 
अगर उसका लोहा पसन्‍द नहीं
उसे गला दो, 
अगर उसकी आग बुरी लगती है 
दबा डालो, 
इस तरह बला टालो 
लेकिन याद रखो
यह लोहा खेतों में तीखे तलवारों का जंगल बन सकेगा 
मेरे नाम से नहीं, किसी और के नाम से सही, 
और यह आग बार-बार चूल्‍हे में सपनों-सी जागेगी 
सिगड़ी में ख़यालों सी भड़केगी, दिल में दमकेगी 
मेरे नाम से नहीं किसी और नाम से सही। 
लेकिन मैं वहां रहूँगा, 
तुम्‍हारे सपनों में आऊँगा, 
सताऊँगा
खिलखिलाऊँगा
खड़ा रहूँगा
तुम्‍हारी छाती पर अड़ा रहूँगा

                 प्रस्तुति :  युवा कवि गोलेन्द्र पटेल , बीएचयू


Thursday, 12 November 2020

'उजास' के कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव अर्थात् "लोक में प्रेम के बीज रोपता कवि" : नीरज कुमार मिश्र ~ गोलेन्द्र पटेल


वरिष्ठ कवि जितेंद्र श्रीवास्तव

 युवा आलोचक नीरज कुमार मिश्र

     "लोक में प्रेम के बीज रोपता कवि "

                                                                                                            नीरज कुमार मिश्र
                                                                         
१९९० के आसपास का समय भारतीय राजनीति,सांस्कृतिक और सामाजिक परिवर्तन का दौर था।अपने समय में हो रहे इन बदलाओं की झलक उस समय के साहित्य में देखी जा सकती है।उस समय का साहित्य इन परिवर्तनों के बीच नयी साहित्यिक चेतनाओं और चेष्ठाओं का विकास करता दिखता है।इस साहित्यिक विकास की परख कविता से अच्छा कौन कर सकता है।इसीलिए इन साहित्यिक परिवर्तनों को एक कवि मन बहुत सूक्ष्मता से परखता है।कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव ऐसे ही सजग कवि हैं।
जिन्होंने इन परिवर्तनों को बहुत शिद्दत से महसूस किया है।जिसके बाद उनका संबंध समाज से जुड़ता दिखता है।इस जुड़ाव के बाद कवि की अपनी कोई सत्ता नहीं रह जाती।जिसकी ओर शुक्ल जी ने इशारा किया है," कविता ही हृदय को प्रकृत दशा में लाती है और जगत के बीच उसका आधिकारिक प्रसार करती हुई उसे मनुष्यत्व की उच्च भूमि पर ले जाती है।भावयोग की सबसे उच्च कक्षा पर पहुँचे हुए मनुष्य का जगत के साथ पूर्ण तादात्म्य हो जाता है,उसकी अलग भावसत्ता नहीं रह जाती,उसका हृदय विश्व-हृदय हो जाता है।" कवि  जितेन्द्र श्रीवास्तव का अभी हाल ही में प्रकाशित कविता संग्रह "उजास" इस कवि के  विश्व-हृदय में रूपायित होने की गाथा है।ये संग्रह "उजास" उनके तीन पहले के संग्रहों- 'अनभै कथा'(२००३),'असुंदर सुंदर'(२००८) और 'इन दिनों हालचाल' (2000,2011) का  संकलित रूप है।
              उजास वह शक्ति है जिसके माध्यम से हम समाज की प्रत्येक वस्तु को बहुत सूक्ष्मता से देखते परखते हैं।इस कविता संग्रह का नाम कवि ने उचित ही रखा है।क्योंकि जहाँ खुशी है वहाँ उजास है।'बेटियाँ' कविता में कवि इस बात को पुष्ट करता है-
"जितनी हँसी होती है बेटियों के अधर पर
उतनी उजास होती है पिता के जीवन में "
कवि खुद पिता है।हम जानते हैं कि पिता जिम्मेदारी का दूसरा नाम है।इसी अनुभूति का प्रतिफलन है कविता " पिता "
"पिता होना 
जिम्मेदार आदमी हो जाना है"
         जितेन्द्र श्रीवास्तव ऐसे कवियों में नहीं हैं,जो चली आ रही काव्य परंपरा की लीक पर चलते हों।वे ऐसे कवि हैं,जो समाज में घटित घटनाओं का संज्ञान लेते हुए,बदलते हुए समय के अनुसार अपनी कविताओं की भूमिका तय करते हैं।इस कवि ने समाज में परिघटित होती घटनाओं की सूक्ष्म पड़ताल करके अपनी कविताओं में ढाला है।यही वजह है कि उनकी कविताएं समाज के नए उद्देश्यों से जुड़ी हुई दिखती हैं।अच्छे रचनाकार वही होते हैं,जो देश काल की परिधि का विस्तार करते हैं।इनकी कविताएँ अनुभूति और विचार की उर्वर भूमि से उपजी हैं।ये कविता संग्रह कवि की कविता यात्रा के अनेक सोपानों को एक साथ लाता है।जिसके माध्यम से इस कवि के कविता की विकास यात्रा को ठीक से समझ सकते हैं।इनकी कविताएँ किसी कथावाचक की कथा नहीं हैं,बल्कि इनकी  कविताएँ सामाजिक,सांस्कृतिक, राजनैतिक अनुभव के ताप से पगी हैं।
           अनभै कथा का अर्थ ही है अनुभव की कथा।कवि समाज से मिले अनुभूत सत्य को कविताओं के माध्यम से पाठकों के सामने लाता है।ये कवि कागद की लेखी पर नहीं आँखिन देखी पर ज्यादा विश्वास करता है।इसीलिए ये कबीर के ज्यादा निकट दिखते हैं।इसी वज़ह से जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविताएँ सामाजिक और  सांस्कृतिक ताने बाने से बुनी  हैं।कवि अपने अनुभव को स्मृति के माध्यम से कविताओं में लाकर उसे अनुभूतिगत खरेपन में ढालता है।यही अनुभतिगत सत्य अच्छी कविता की कसौटी होती  है।कोई कविता अच्छी है या बुरी ये इसी कसौटी से परखी जानी चाहिए।जैसा अज्ञेय कहते हैं कि " वह कविता अच्छी है या बुरी,इस से मुझे मतलब नहीं है।मेरे निकट वह सच है,क्योंकि वह अनुभूति प्रसूत है,यही मेरे निकट महत्त्व की बात है।मैं कहूँ कि कृतिकार या कवि जब सत्य से ऐसा भीतरी साक्षात करता है तब मानो वह एक बलि-पुरुष की तरह देवताओं का मनोनीत हो जाता है।और काव्य-कृति ही उस का आत्म-बलिदान है,जिस के द्वारा वह देवताओं से उऋण हो जाता है।यही देवता से उऋण होने की छटपटाहट वह विवशता है जो लिखाती है।" इस विवशता का ही प्रतिफलन है कि इस कवि की कविताएँ स्वाति की बूँद की तरह गहन विश्लेषण के बाद मोती बनकर पाठकों के सामने आती हैं।
              आज जहाँ देखो बाज़ार और पितृसत्ता का गठजोड़ दिखाई देता है।दोनों की जुगलबंदी आज का भयावह सच है।ऐसे समय में स्त्री के मानवीय सौंदर्य की अनदेखी हो रही है।बाज़ार ने स्त्री को सिर्फ़ देह तक ही सीमित कर दिया गया हो-
"प्यार माने स्त्री
स्त्री माने देह
यही है दर्शन
यही है दृष्टि
बाज़ार की।"
उस समय बाज़ार की इस दृष्टि को जितेन्द्र श्रीवास्तव जैसा संवेदनशील कवि न केवल देखता,बल्कि अपनी कविता "स्त्रियाँ कहीं भी बचा लेती हैं पुरुषों को " के माध्यम से स्त्री सत्ता को प्रतिष्ठित भी करता  है-
"इस प्रकार एक अपरिचित शहर में
असमय मृत्यु से बचाती रही
स्मृतियों में बसी एक स्त्री
स्त्रियाँ कहीं भी बचा लेती हैं पुरुषों को "
ये कवि समाज की सभी स्त्रियों को ऐसे गाँव में ले जाना चाहता है।जहाँ स्त्री पूरी तरह से मुक्त हो।जहाँ अब भी बचा  हो उत्सव जीवन का।जहाँ 
" गाती  हैं स्त्रियाँ नाचती हैं स्त्रियाँ
सुख की बनी-बनायी परिभाषाओं को बदलते हुए
जहाँ जीवन को मिलता है नया अर्थ
चलो उस गाँव चलें "
कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविताओं में स्त्री मुक्ति और उसकी स्वतंत्रता की कामना सर्वत्र देखी जा सकती है।यही वजह है कि इनके यहाँ स्त्रियां अपने जीवन के तमाम फ़ैसले स्वयं करना चाहती हैं। हम जिस स्त्री को आँखों में नींद और देह में थकान लिए पूरे घर की जिम्मेदारी का बोझ उठाते देखते हैं।वह सही मायने में तीस की उम्र में सैंतालिस की चिंताओं की घर होती है।समाज में स्त्रियाँ कई रूपों में अपनी जिम्मेदारी को एक साथ निभाती दिखती हैं।दिन-रात काम में खपती ये स्त्रियाँ अपने होने को लेकर कई बार बिलखती हुई विधाता को कोसती हैं-
" वे भाग्य की बात करती हुई
हँसती हैं विधाता पर
कभी कोसती हैं विधाता को
कहती हैं जो विधाता स्त्री होता
तो सोचो सखि, कैसा होता !"
जिस समय समाज में लगातार स्त्रियों पर अत्याचार और शोषण बढ़ रहा हो।पैदा होने से पहले ही बच्चियाँ पेट में मार दी जा रही हों।उस समय ये कवि अपने भीतर एक स्त्री की आत्मा को लाना चाहता है,जिससे उनके सुख को महसूस कर सके-
"कहाँ से लाऊँ
अपने भीतर एक स्त्री की आत्मा!
वह भी एक ऐसे समय में
जब बच्चियाँ मारी जा रही हैं कोख में ही।"
इस कवि की चाह है कि स्त्रियों पर किसी तरह का भी बंधन न हो।वे कहीं भी जा सकती हों,किसी से भी कहीं भी मिल सकती हों,खुलकर खिलखिला सकती हों।मनुष्य के भीतर का जो सच पुतलियों में अटका रहता है,उसे आँख में आँख डालकर देख सकती हों।कवि ये मानता है कि आजकल की स्त्रियाँ खूबसूरत पहाड़ नहीं होती,जिसकी कोई मर्जी ही न हो।समाज में सारे अनुभवों को संजोकर रखने वाली अनेक स्त्रियाँ रमिया जैसी भी हैं।जो पितृसत्तात्मक सत्ता को ही अपने अंदर बैठाये रखना चाहती हैं।वे अपने आत्मबल और अदम्य साहस को पहचान नहीं पातीं।यही वजह भी कि वे उत्तर आधुनिक युग में भी उससे मुक्त नहीं होना चाहतीं-
" रमिया पुरुष को महान मानती है
पुरुष के बिना जीवन बेकार मानती है
मर्द को औरत के मन का लगाम मानती है
अपना सब कुछ उसी का
उधार मानती है रमिया
रमिया और भी बहुत कुछ मानती है
लेकिन
अपने अंदर घुसे पुरुष को नहीं पहचानती।"
प्रचलित लोककथा को आधार बनाकर कवि अपनी कविता 'सोनचिरई' के माध्यम से समाज की उस बुराई पर चोट करता है,जो समाज में व्याप्त अंधविश्वास और अज्ञानता पर टिकी खोखली परंपरा अभी भी समाज में बनी हुई है।समाज की ये अज्ञानता ही है कि स्त्री के माँ न बनने पर पूरा दोष उसी का माना जाता है। इस लोककथा के माध्यम से आधुनिक स्त्री विमर्श के पक्ष में खड़ा कवि स्त्री की महत्ता को प्रतिष्ठापित करता है-
"वह स्त्री थी
और स्त्रियाँ कभी बाँझ नहीं होतीं
वे रचती हैं !
वे रचती हैं तभी हम-आप होते हैं
तभी दुनिया होती है
रचने का साहस पुरुष में नहीं होता
वे होती हैं तभी पुरुष
पुरुष होते हैं।"
इनकी कविताओं ' धारचूला की छात्राएं','सोनमछरी', 'सपने में लड़की','क़स्बे में प्रेमिका,'घास गढ़ती औरतें','तुम कहाँ हो सुलेखा','लड़कियाँ','आभा चतुर्वेदी''सोनचिरई','पुकार','जनवरी की एक सुबह उठी तीन स्त्रियाँ','दुख का पहाड़','जो विधाता स्त्री होता','किरायेदार की तरह','सपने में एक लड़की सोनमछरी',राय प्रवीन',आदि में स्त्री संघर्ष और उसकी मुक्ति के अनेक रूप आपको देखने को मिल जायेंगे।
 कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविताओं  की स्त्री 'जायज बातों में खुश और नाजायज़ बातों पर साड़ी खूंटिया कर लड़ने को तैयार दिखती हैं।इसीलिए ये कवि स्त्री की मुक्ति की लड़ाई  सुलेखा जैसी स्त्रियों के साथ लड़ना चाहता है।सुख के पक्ष और दुःख के ख़िलाफ़ निर्णायक लड़ाई में कवि कविता को हथियार बनाता है।क्योंकि
"कविता बताती है
जब डूबा जाता है पूरा का पूरा
 तब इतिहास बनता है
और इतिहास को कनखियों से नहीं देखा जाता।"
इस संग्रह की स्त्रियाँ अपने अंदर सुलगती हुई राख रखती हैं,जिसकी आग को समय और परिस्थितियों के अनुसार उपयोग कर सकें -
"घास गढ़ती औरतें
सोने से पहले सुबह के लिए
 बोरसी की राख में छिपा कर
रख देती हैं थोड़ी सी आग।"

किसी भी कवि की कविता का मज़बूत धरातल होता है लोक।लोक ऐसा तत्त्व है जिससे कविता कालजयी बनती है।विद्यापति,कबीर,सूर,तुलसी से लेकर त्रिलोचन,नागार्जुन,केदारनाथ अग्रवाल आदि कवियों की कविताएँ शास्त्रों के पांडित्य प्रदर्शन की वजह से नहीं,बल्कि लोक चित्रण की वजह से कालजयी हैं।इसके लिए सबसे जरूरी है लोक को जानना,उसको जीना,उसको महसूस करके उनमें रचना-बसना।    

कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव ने लोक को जिया भी है और उसे भोगा भी है।यही वजह है कि इस कवि ने लोक को अपनी कविता में विस्तार दिया है।इनकी कविताओं में लोक केवल ग्रामीण जनमानस और उसकी संस्कृति तक सीमित नहीं है,बल्कि उसमें शहरी जनमानस भी शामिल है।जिनमें कहीं न कहीं लोक मौजूद है।हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लोक शब्द को विस्तार देते हुए उसे जनमानस से जोड़ा है-"लोक शब्द का अर्थ जनपद या ग्राम्य नहीं है बल्कि नगरों और गाँवों में फैली हुई वह समूची जनता है,जिसके व्यवहारिक ज्ञान का आधार पोथियाँ नहीं है।ये लोग नगर में परिष्कृत जीवन के अभ्यस्त होते हैं और परिष्कृत रुचि वाले लोगों की समूची विलासिता और सुकुमारता की जीवित रखने के लिए जो भी वस्तुएँ आवश्यक होती हैं उन्हें उत्पन्न करते हैं।" जितेन्द्र श्रीवास्तव भी आचार्य द्विवेदी की तरह लोक विस्तार के हिमायती हैं।इसीलिए इस कवि की कविताओं में श्रम की आँच में तपे अनेक चेहरों से बना लोक का चेहरा आप स्पष्ट देख सकते हैं-
" यदि कोई देखना चाहे 
हमारे लोक का चेहरा 
वह देख सकता है
श्रम की आँच में तपे इनके चेहरे
इनके चेहरों पर
हमारी साँवली आभा के साथ
दिपदिपाता है हमारा लोक।"
लोक के ये चेहरे ही हमारी मिट्टी की पहचान हैं।ये ही हमारे विश्वास के सच्चे पहरुवे हैं।इनकी कविताओं में लोक-जीवन के विविध रूप सतरंगी आभा के साथ प्रतिबिंबित होते दिखते हैं।
इसकवि को लोक-जीवन से इतना लगाव है कि उसने धतूरा,भुट्टा,खुरपी,कुदाल,बँसला,बैल,कछार,बधुआ,बेना,नवान्न,लूंगी आदि अनेक लोक-जीवन से जुड़े शब्दों को लेकर कविताएँ रची हैं।
इनकी कविता में आया गवई पीढ़ा महज लकड़ी का टुकड़ा नहीं है बल्कि साम्प्रदायिकता का प्रतीक है।
 वह कवि की माँ की सबसे प्रिय किताब है।जिसमें माँ का जीवन संघर्ष और पिता के सपने जुड़े हैं।इनके यहाँ रामखिलावन और रामबचन भगत जैस सक्रिय देह वाले लोग भी हैं,जिनके लिए नींद उत्सव की तरह होती है। क्योंकि 'नींद बिछौने को नहीं,देह को आती है'।जो जानते हैं कछार को वो ऐसे कितने सक्रिय देह वाले किसानों के जीवन को जानते होंगे,जो बार बार बर्बाद होती फसलों के बाद भी ये मन नहीं हारते।बल्कि-
"तन-मन-धन से
धरती की कोख भरने में जुटे
ये किसान
हर बार बीज के साथ बोते हैं उम्मीद भी।"
सही मायने में कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव लोक-जीवन ,उसकी विडंबनाओं और सक्रिय देह के पक्ष में खड़े रहने वाले कवि हैं।यही वजह है कि ये कवि केदारनाथ सिंह की परंपरा के ज्यादा नज़दीक लगते हैं।केदारनाथ सिंह जी की कविताओं में आये लोक-जीवन से जुड़े अनेक शब्दों जैसे कुदाल,बोरसी आदि को अपने अलग रूप में आप इनकी कविताओं में भी देख सकते हैं।यदि एक तरफ केदार जी के सामने कुदाल के विस्थापन के दर्द से उठे कई सवाल हैं-
"अन्त में कुदाल के सामने रुककर
मैंने कुछ देर सोचा कुदाल के बारे में
सोचते हुए लगा उसे कंधे पर रखकर
किसी अदृश्य अदालत में खड़ा हूं
पृथ्वी पर कुदाल के होने की गवाही में
पर सवाल अब भी वहीं था
वहीं जहां उसे रखकर चला गया था माली
मेरे लिए सदी का सबसे अधिक कठिन सवाल
कि क्या हो-अब क्या हो कुदाल का
क्योंकि अंधेरा बढ़ता जा रहा था
और अंधेरे में धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा था
कुदाल का क़द
और अब उसे दरवाज़े पर छोड़ना
ख़तरनाक़ था
सड़क पर रख देना असंभव
मेरे घर में कुदाल के लिए ज़गह नहीं थी।"
तो दूसरी तरफ कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव की कुदाल सोचती भी है और जरूरी सवाल भी करती है-
"प्रजातंत्र के मतदाता
और किसान की कुदाल में
होना ही चाहिए कोई मूलभूत अंतर
खेत की मेड़ पर खड़ी कुदाल
सोच रही है
और लोग चिंतित हैं
कि कुदाल सोच रही है।" समाज में यदि मजदूर और श्रमिक सोचने लगता है तो लोग चिंतित होने लगते हैं।ये तय है कि जो सोचेगा वही तो सवाल करेगा।सवाल करने वालों से सत्ता भी डरती है।ये कवि गवई खुशबू और उनके स्वाद को अच्छे से जानता-पहचानता है।इसीलिए वह कामना करता है कि फसल कटने से पहले सभी घरों में नवान्न का उत्सव होना चाहिए।इस संग्रह की कविता "भुट्टा "-
"मक्के की देह में
कमर में कटार की तरह
तनी है बाल।" केदारनाथ अग्रवाल की कविता "एक बीते के बराबर ठिगना चना" की याद दिलाती है।विकास की अंधी दौड़ ने शहरीकरण को बहुत बढ़ावा दिया है।ये शहरीकरण मनुष्य के मन के रसायन को कब बदल देता है पता ही नहीं चलता।उस रसायन बदलने से बहुत सारे बदलाव दिखाई पड़ते हैं।जिन लोक के शब्दों की उँगली पकड़कर भाषा को सीखकर दुनियाँ पहचानी।वही शब्द इस रसायन के प्रभाव से या तो गँवारू लगने लगते हैं या वो बिला ही जाते हैं।कवि इसी बात से दुःखी है कि-
"बहुत दिन हुए
किसी के मुँह से
नहीं सुना 'तरकारी'।"

कवि की चिंता वाज़िब है कि इस दौर में बहुत तेज़ी से बदल रहे हैं लोक और कस्बों के हाव-भाव।बाज़ार के तंत्र ने सबको अपनी ओर आकर्षित किया है।जिससे यहाँ की संस्कृति में भी अपरिचय की भावना बढ़ती जा रही है-
"अब कस्बों में बहुत दिनों तक
चल नहीं पाता काम
विश्वास और भरोसे पर
अब वहाँ अपना अर्थ बदल रहे हैं मुहावरे
समा रहे हैं तेज़ी से बाज़ार के पेट में।"
गाँव और कस्बों से शहरों की तरफ आमजन का
पलायन करवाकर अब पूँजी और बाज़ार ने अपनी पैनी नज़र शहरों पर गड़ा रखी हैं।इस नज़र को ये कवि बख़ूबी पहचानता है।उसे डर है कि बाज़ार की चमक में अब शहर भी न बिला जायें-
"मेरे लिए यह विषाद की घड़ी है
इस समय ठकुआ गया हूँ मैं
वैसे कहाँ हैं आप !
जरा पलट कर देखिए
कहीं बिला तो नहीं रहा 
आपका भी शहर !"
आज पूँजी, बाज़ार और राजनैतिक गठजोड़ ने ऐसी व्यवस्था खड़ी कर दी है।इस व्यवस्था की भाषा में कहें कि मामूली से आदमी का समाज के हित में सोचना अपराध माना जाता है।ऐसे मामूली से आदमी को रघुवीर सहाय के रामदास की तरह मार दिया जाता है।कविता " वह जो चाहता था " रामदास की याद दिलाती है-
"कल हत्या हुई जिसकी बीचोबीच शहर में.....
वह चाहता था अपने और अपने जैसे लोगों के लिए
अँजुरी भर उजास
चेहरा भर लालिमा
आँख भर चमक
और होंठ भर मुस्कान।"
आज के समय में प्रेम की बहुत जरूरत है।प्रेम को लेकर इस कवि ने अनेक कविताएं लिखीं हैं।प्रेम के अनेक पहलुओं को इस संग्रह की कविताओं में देख सकते हैं।प्रेम करने वाले केवल प्रेम नहीं करते बल्कि एक-दूसरे को रच रहे होते हैं।क्योंकि जहाँ प्रेम है वहीं सृजन है-
"प्रेम करते हुए हमने जाना
प्रेम करते हुए लोग
रचते हैं कविताएँ एक-दूसरे में
एक-दूसरे का होना
उनकी कविता का पूरा होना है।" 
कवि ये मानता है कि प्रेम पर ही दुनिया टिकी है।दुनिया को बचाने के लिए हथियारों की नहीं प्यार की जरूरत है।क्योंकि विरोध के दिनों में प्यार की इच्छा बलवती हो जाती है।आज कबीर के "प्रेम न खेती ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय।" को बाज़ार और पूँजीवादी गठजोड़ ने झूठा सिद्ध कर बिकाऊ बना दिया है।कवि इसी बात से चिंतित है कि भूमंडलीकरण के इस दौर में लोग धीरे-धीरे भूलने न लगें कि प्रेम जैसी भी कोई बात होती थी।कहीं इस विकट समय में प्रेम गूलर का फूल न हो जाये-
"इक्कीसवीं सदी की दहलीज़ पर चढ़ रहे समाज में
इससे बड़ी त्रासदी न होगी
कि प्रेम एक वर्जित फल बन जाए।"
इनकी कविताओं में आया प्रेम वासनाजन्य प्रेम नहीं है बल्कि ये प्रेम विश्वास,आस्था और समानता के सहचर से उपजा है।यहाँ आपको दाम्पत्य प्रेम के अनेक रूप देखने को मिलेंगे।इनकी कविताओं में आया प्रेम क्षणिकता का बोध नहीं है बल्कि वह जीव की अनवरत यात्रा की तरह है।जो दूर रहकर भी उसके अहसास को हमेशा जगाये रहता है-
"मैं तुम्हें पहचानता हूँ
अपनी हथेली की तरह
तुम्हारे माथे पर
उभर आयी रेखाएँ
मेरे हाथ की लकीरों जैसी दिखती हैं।"
जितेन्द्र श्रीवास्तव जितने अच्छे कवि हैं,उतने ही अच्छे आलोचक हैं।लेकिन न कवि में आलोचक हावी होता और न ही आलोचक में कवि हावी होता दिखता।बल्कि ये दोनों के दूसरे की उंगलियों को पकड़े एक एक दूसरे को संबल देते हुए साहित्यिक यात्रा करते हैं।
ये कवि भाषा के प्रति बहुत सजग है।कविता की पृष्ठभूमि और देशकाल के अनुसार ये अपने शब्दों को चुनते हैं।लोक से जुड़ाव के कारण उनकी कविताओं में लोक के शब्द वहाँ की गंध के साथ जाते हैं।अभिधात्मकता इनकी भाषा की सबसे बड़ी विशेषता है।ये अपने शब्दों पर विश्वास करने वाला है।
इस संग्रह को पढ़ने के बाद कह सकते हैं कि जितेन्द्र 
श्रीवास्तव उम्मीद और सपनों को जगाने वाले कवि हैं।

 कविता-संग्रह :- उजास
कवि :- जितेन्द्र श्रीवास्तव
प्रकाशक :- सेतु प्रकाशन,दिल्ली
संस्करण -2019
मूल्य :- ₹ 300
पेज़ :- 328


इस पेज़ पर अपने लेख प्रकाशित कराने के लिए निम्न नंबर या ईमेल पर संपर्क करें।

ह्वाट्सएप : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com

Sunday, 8 November 2020

युवा कवि "गौरव भारती" की दस कोरोजीवी कविताएं : गोलेन्द्र पटेल


युवा कवि गौरव भारती की कुछ कोरोजीवी कविताएँ :-


१.

वापसी

___________

घर छोड़ने के बाद

घर लौटने का अंतराल 

साल दर साल बढ़ता ही गया


बहुत दिनों बाद

घर पर हूँ

पलट रहा हूँ एल्बम

और देख रहा हूँ हँसते खिलखिलाते चेहरे

लेकिन नहीं ढूंढ़ पा रहा हूँ अपनी एक भी तस्वीर

मैं नहीं हूँ इन तस्वीरों में कहीं

मेरा बिस्तर भी कैमरे की फ्रेम से बाहर है 

मेरी जुटाई स्मृतियाँ अनमने भाव से एक जगह पड़ी हैं


मैंने छोड़ा था घर

घर ने भी छोड़ दिया है मुझे

अपनी वापसी पर हैरान 

सोच रहा हूँ -

मैं कौन हूँ? 

कहाँ हूँ? 


२.

 तुम्हारे जाने के साथ ही नहीं मरा था मैं

________________________________


तुम्हारे जाने के साथ ही नहीं मरा था मैं

मैं मरता रहा धीरे-धीरे

सबसे पहले

मेरी भाषा मरी

फिर मरे मेरे सारे ख़्वाब

धीरे-धीरे

मेरी यादें मरी

इच्छाएं मरी

और फिर एक दिन 

मर गया मेरा शरीर |


३.
हॉस्टल के इस नियत कमरे में
पर्याप्त जगह है मेरे लिए
आसमानी दीवारें हैं
घड़ी है
बिस्तर है
किताबें हैं
सिर्फ़ नींद नहीं है
जिसे समेटने के लिए 
मैं सड़कें नापता हूँ... 

४.
वह किसी उपन्यास का नायक जरूर हो सकता है
_____________________________________
खिड़की
दीवार
किवाड़
और ख़ुद से निराश हो 
हर रोज़ 
जब सूरज ढ़ल रहा होता है
मैं अपने कदमों को सायास ठेल रहा होता हूँ
चाय-दूकान की ओर
जहाँ कई अपरिचितों के बीच एक चेहरा ऐसा है
जिसे मैं परिचित मान सकता हूँ
वह मेरी आदतें जानता है
मेरे स्वाद की पूरी खबर है उसे
मुझे खाँसता देख 
बढ़ा देता है अदरक की मात्रा मेरी चाय में

कभी-कभी
सुबह जागते ही 
चेहरे के बासीपन को धोकर
पहुँच जाता हूँ वहाँ
मैं देखता हूँ
उसे दूकान सजाते हुए
सोयी हुई सीढ़ियों को झाड़ू मारकर वह जगाता है
उसने सुनाई है मुझे
अपनी यात्राओं की कई कहानियाँ
जिसे सुनकर मुझे लगता है
अब वह देश का प्रधान न सही 
किसी उपन्यास का नायक जरूर हो सकता है... 

५.
माँ ने नहीं देखा है शहर
__________________

गुज़रता है मोहल्ले से
जब कभी कोई फेरीवाला
हाँक लगाती है उसे मेरी माँ

माँ ख़रीदती है
रंग-बिरंगे फूलों की छपाई वाली चादर 
और जब कोई परिचित आने को होता है शहर
उसके हाथों भिजवा देती है 

माँ ने नहीं देखा है शहर 
बस टेलीविजन पर देखती रहतीं हैं खबरें
सुनती रहती हैं किस्सा 
बड़ी-बड़ी इमारतों का 
लंबी-चौड़ी सड़कों पर चारपहिए की कतारों का
शहर से लौटा कोई आदमी
जब नहीं करता है बात 
आकाश, चिड़ियाँ, वृक्षों, घोसलों और नदियों की
उन्हें लगता है-
शहर में नहीं खिलतें हैं फूल
उगतीं हैं सिर्फ इमारतें यहाँ

६.
पिता
_________

इस साल जनवरी में
नहीं रहे मेरे पिता के पिता

उनके जाने के बाद
इन दिनों
पिता के चेहरे को देखकर
समझ रहा हूँ पिता के जाने का दुःख

दुःख, पसर गया है पिता की पुतलियों में 
जिसे देख कर भयभीत हूँ मैं
दुःख, उपस्थित है पिता की दिनचर्या में
जिसने साँझ की परिभाषा बदल दी है

मैं देखता हूँ
दीवार पर टंगी तस्वीरों को 
और सोचता हूँ-
मनुष्य संबंधों की एक श्रृंखला में जन्म लेता है
और उसी में मरता है
जगह का ख़ालीपन 
भरा जा सकता है सामानों से 
लेकिन मन की रिक्तता मनुष्य ही खोजती है ।

७.
याद
______

एक वक़्त के बाद
नींद नहीं आती
बस! तुम्हारी याद आती है

तुम्हारी याद में 
मैं गुड़हल सा खिलता हूँ
महुए सा टपकता हूँ
भरता हूँ नदी की तरह
और मोगरे सा महकता हूँ

तुम्हारी याद में 
चलता हूँ तुम्हारे साथ भींगते हुए
और बहुत प्यार से लेता हूँ 
तुम्हारा नाम

हाँ, तुम्हारे नाम का एक अर्थ है मेरे जीवन में
जहाँ से मैं परिभाषित हो सकता हूँ ।

८.
समय का शोक गीत 
_________________

बहुत उम्मीद से
मोबाइल को देखता हूँ
व्हाट्सएप्प खोलता हूँ
चेक करता हूँ मैसेंजर 
हो आता हूँ ईमेल के इनबॉक्स तक
दिनभर में कितनी ही बार

उम्मीद लिए जाता हूँ
इंतज़ार लिए लौटता हूँ

ख़ाली बैठे-बैठे सोचता हूँ
न जाने किस समय में फँस गया हूँ
कोई मुझ तक नहीं पहुँचता
न मैं ही ठीक-ठीक पहुँच पा रहा हूँ कहीं 

ख़ाली सड़क पर 
ख़ुद की चहलकदमी को सुनते हुए
झींगुरों को अपने क़रीब, बेहद क़रीब पाता हूँ
झींगुर गा रहा है 
समय का शोक गीत...

९.
मैं खुद को हत्यारा होने से बचा रहा हूँ
____________________________
बहुत ही लापरवाह रहा हूँ मैं
अपनी देह को लेकर
पहनने ओढ़ने का शऊर भी नहीं रहा कभी
मुझे ध्यान नहीं रहता 
कब बढ़ जाते हैं मेरे नाख़ून 
झड़ने लगे जब बाल
मुझे लगा, शहर मुझे चाट रहा है
आँखें जब हुईं कमज़ोर
मुझे लगा, धूल ने स्थायी जगह बना ली है मेरी पुतलियों में 
पहली बार जब लेटा हरी चादर पर ईसीजी के लिए
मुझे लगा, मेरी धड़कनों पर हवाई जहाज़ का असर है

मेरा जितना साथ शहर की तंग गलियों ने दिया
उतना साथ नहीं दिया मेरे जूतों ने
एक जैसी रंगी, बिछी हुईं सड़कें 
मुझे अक्सर गुमराह कर जातीं हैं

मैं नहीं लड़ता 
खाने के स्वाद को लेकर अब
नमक उठाकर 
छिड़क लेता हूँ कभी दाल में
कभी हल्का सा गर्म पानी मिलाकर 
खा लेता हूँ सब्जी
स्वाद के लिए लड़ना 
भूख का मजाक उड़ाना है
जिसकी इजाजत मुझे मेरा देश नहीं देता 

मेरी दुनिया हमेशा से बहुत छोटी रही
मैं नहीं संभाल पाता अधिक रिश्तें
हमारा समाज जो बहुत जल्दी किसी निर्णय पर पहुँच जाता है
उस समाज से मुझे कुछ ही लोग चाहिए
जो ठहरना जानते हों

जब भीतर शोर होता है
आदमी बहरा हो जाता है
और कई बार गूंगा भी
भीतर का शोर किसी और को सुनाई नहीं देता
शोर कैसा भी हो
उसे सुना नहीं समझा जाना चाहिए

सच कह रहा हूँ:
हम बहुत हिंसक होते जा रहें हैं
हमारी सभी इंद्रियाँ पहले से कहीं ज्यादा हमलावर हुईं हैं 
हर जगह उग आएँ हैं नाखून
ऐसे हिंसक समय में
लगातार कोशिश करते हुए
मैं खुद को हत्यारा होने से बचा रहा हूँ... 

१०.
शिकायतें
________

अब तो ज़माना नहीं रहा चिठ्ठियों का
लेकिन अब भी 
समय-समय पर
पढ़ने को मिल जातीं हैं
छोटे-छोटे काग़ज़ों पर 
लिखीं गईं तुम्हारी शिकायतें

तुम्हारी शिकायतें
फुटनोट्स की तरह
मेरा मार्गदर्शन करती हैं । 

©गौरव भारती



संपादक परिचय :-
नाम : गोलेन्द्र पटेल {बीएचयू~बीए}
संपर्क सूत्र :-
ईमेल : corojivi@gmail.com
मो.नं. : 8429249326

"हजारी प्रसाद द्विवेदी एक जागतिक आचार्य" {संपादक ~ आचार्य श्रीप्रकाश शुक्ल} / वक्ता : कवि मदन कश्यप + आचार्य ओमप्रकाश सिंह + प्रो.कमलेश वर्मा

सेतु प्रकाशन


  

"भौतिकता की पक्षधरता के आचार्य थे  हजारी प्रसाद द्विवेदी" मदन कश्यप


पिछले दिनों सेतु प्रकाशन के फ़ेसबुक पेज पर काशी हिंदू विश्वविद्यालय के आचार्य श्रीप्रकाश शुक्ल जी द्वारा संपादित "हजारी प्रसाद द्विवेदी एक जागतिक आचार्य" नामक आलोचनात्मक पुस्तक पर एक व्यापक परिचर्चा का आयोजन किया गया। जिसके आयोजक व संचालन संस्था के सचिव व आलोचक अमिताभ राय जी थे। इस कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में युवा आलोचक वाराणसी कमलेश वर्मा जी व जे०एन०यू० से हिंदी के विद्वान ओमप्रकाश सिंह जी व महत्वपूर्ण कवि मदन कश्यप जी थे। उन्होंने अपने स्वागत वक्तव्य में कहा कि यह हमारे कार्यक्रम के  श्रृंखला की तीसरी कड़ी का महत्वपूर्ण आयोजन है। इसके श्रृंखला में हमने बाबूलाल की किताब व दूसरी श्रृंखला में कवि अशोक बाजपेयी जी की पुस्तक पर  इस तरह का आयोजन किया था। और यह हमारे श्रृंखला की तीसरी कड़ी है जिसमे हम आज श्रीप्रकाश शुक्ल जी द्वारा संपादित इस महत्वपूर्ण पुस्तक पर इन विद्वानों के बीच चर्चा व परिचर्चा कर रहा हूँ, और यह हम सबके लिए सुखद भी है।



उन्होंने बताया कि यह पुस्तक दस से बारह दिनों में छप कर हमारे पाठकों तक पहुंच जाएगी। पर इससे पहले सेतु प्रकाशन इस महत्वपूर्ण पुस्तक पर परिचर्चा करने हेतु प्रमुख विद्वानों को आमंत्रित किया है। आगे आने वाले समय मे हम और इस तरह के कार्यक्रम आयोजित करते रहेंगे। इसके पहले आज आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी एक जागतिक आचार्य नामक पुस्तक पर परिचर्चा आयोजित हुई है। इस पुस्तक में अनेक महत्वपूर्ण विद्वानों के लेख संकलित हैं। जो कि परिचय पत्रिका के 2007 के विशेषांक से संवर्धित है। पर इसे इसका पुनर्प्रस्तुति न समझा जाए।

***********************

संवाद की श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शताब्दी वर्ष पर 'परिचय' पत्रिका ने अपना विशेषांक निकाला था इस पुस्तक में अनेक विद्वानों के लेख, निबंध आदि संकलित थे, जिसे संपादक ने अपने सार्थक शाब्दिक अभिव्यंजना के द्वारा इसे संवर्धित व ऊर्जस्वित करते हुए आगे बढ़ाया है। हम इस कार्यक्रम में इस किताब के माध्यम से यहाँ द्विवेदी जी पर चर्चा करने के लिए आज इकट्ठे हुए हैं।

वैसे द्विवेदी जी का महत्व हिंदी साहित्य में अनेक कारणों से रहा है, यह एक विशेष जो लोक के प्रति उनकी अखण्ड आस्था को दर्शाता है। और अगर आज की आलोचनात्म भाषा मे मैं बात करूं तो द्विवेदी जी आधुनिकता के सम्भवतः पहले आलोचक रहे हैं। इस पुस्तक में नित्यानंद तिवारी सत्तमी दुबे, शिवकुमार मिश्र, शंभूनाथ जी व खगेन्द्र ठाकुर के लेख हैं।

इस पुस्तक में द्विवेदी जी के व्यक्तित्व के साथ कृतित्व का जो महत्वपूर्ण है, उसे इसमें संजोया गया है। इसमे सत्रह निबंध हैं। इस तरह यह पुस्तक हम सभी पाठकों के लिए बेहद मूल्यवान है।

**************************प्रतम वक्ता के रूप में बोलते हुए श्री कमलेश वर्मा ने कहा कि जब यह पत्रिका छपी थी तो द्विवेदी जी मौजूद थे, और जब जब उनपर यह किताब छप रही है तो वे इस संसार मे नही हैं। उन्होंने कहा कि द्विवेदी जी आधुनिकता के पहले आलोचक हैं। उनको सांस्कृतिक परंपरा की पूरी जानकारी थी। आलोचना के मानदण्डों के पीछे उनका देशज होना है। जिन अर्थों में हम द्विवेदी जी के लिए यह पद इस्तेमाल करते हैं वैसा नही है। आप इस पूरी पुस्तक को सुरु से अंतिम तक देखेंगे तो पाएंगे कि  सांस्कृतिक परंपरा में उन शब्दों को प्वाइंट करते हुए इनके इर्द गिर्द जो निबंध है उनका विश्लेषण करते हुए जितने मात्रा में निबंध आये हैं शायद वो इन बातों की एक छोटी सी गवाही हो। यह किताब द्विवेदी जी का मूल्यांकन तो करती ही है और जिन पर पहले विचार हुए थे उन पर फिर विचार करती है और कुछ नए पक्षों को भी लेकर हमारे सामने आती है।

तो जाहिर सी बात है कि जब पाठक के हाँथ में यह किताब आएगी तो लगेगा कि कुछ हमने नया भी जाना है। व पुराने पक्षों पर पुनर्विचार नही करती बल्कि हमने नया भी कुछ जाना है।

इस तरह कुछ नए पक्ष व कुछ पुराने पक्ष ही इस किताब की खूबसूरती है।

श्रीप्रकाश जी ने इस किताब की भूमिका में लिखा है कि बनारस को और बीएचयू के हिंदी विभाग को और और उस विभाग में काम करने वाले लोगों को जिसमे श्रीप्रकाश जी खुद शामिल हो सकते हैं जबकि द्विवेदी जी तो खुद शामिल हैं ही

ये लालित्य बहुत है। इस पुस्तक में विभाग द्वारामें हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के लेखन लालित्य पर भी खूब चर्चा हुई है।

*************************

जे०एन०यू० के हिंदी विभाग के प्रो० ओम प्रकाश सिंह ने अपने पहले वक्तव्य में ही इस जागतिक विषय पर अपना पक्ष रखते हैं और कहते हैं कि श्रीप्रकाश जी ने बड़े ही परिश्रम से इस किताब को तैयार किया है। क्योंकि जिस तरह से जागतिक व अन्य शब्दों को लेकर चौका

उसी तरह श्रीप्रकाश जी भी इन शब्दोँ  से चौके थे इसका प्रमाण उनकी भूमिका में भी मिल जाता है।

उनका जागतिक की बात जगत और जागृत के रूप में जुड़ता है। इस सन्दर्भित  उन्होंने पुस्तक की भूमिका लिखने पर श्रीप्रकाश की जम कर तारीफ भी करते हैं। और कहते हैं कि ज्यादेतर संपादक इससे भागते हैं। पर श्रीप्रकाश जी ने उन पक्षों को समूल रूप से उद्घाटित किया हैं

साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि इस पपुस्तक में तीन तीन पीढ़ी के रचनाकार एक साथ सक्रिय हैं जो कि सुखद है ।

उन्होंने सूरसागर का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी रचनाकार के विवेचन व विश्लेषण के संदर्भ में लगातार नए पक्ष जुड़ते जा रहे हैं। इसी बीच वे द्विवेदी जी के व्यक्तित्व व कृतित्व पर भी व्यापक चर्चा करते हैं। और कहते हैं कि आचार्य द्विवेदी का लेखन कार्य आलोचना में भी है और साहित्य के इतिहास में भी है, परंपरा में भी है, और उसके सांस्कृतिक साहित्य पर भी है और निबंधों में भी है। इस तरह वे कहते हैं कि शुक्ल जी द्वारा संपादित यह पुस्तक बेहद महत्वपूर्ण है जो द्विवेदीजी के सम्पूर्ण व्यक्तित्व व कृतित्व का विश्लेषण करती है। उनके इस समय के रचनाकार के प्रभाव की सबसे बड़ी विशेषता है यह है कि हम आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी व उनके साहित्य का जब भी मूल्यांकन में प्रवित्त होंगे और उनपर बात चीत करेंगे तो उसमें कुछ न कुछ नया जुड़ता जाएगा।

उन्होंने कहा कि परिचर्चा के इस क्रम में इस तरह कुछ न कुछ छूटता जाता है । और इस छूटन को समेट लेना ही संपादक का कार्य है। इस कार्य को श्रीप्रकाश जी ने किया है। लिए मैं उनको साधुवाद व बधाई देता हूँ।

आज जब आलोचना की पुस्तकें कम लिखी जा रही हैं तो ऐसे दौर में श्रीप्रकाश जी द्वारा इस तरह की पुस्तक पर कार्य करना बेहद महत्वपूर्ण है।

अपने वक्तव्य में समय के महत्वपूर्ण कवि मदन कश्यप जी ने कहा कि श्रीप्रकाश शुक्ल जी मेरे प्रिय कवि भी हैं। वे हमेशा कुछ न कुछ अलग करते हुए चौंकाते रहते हैं। इसी बीच उन्होंने उनकी एक कविता प्रधानमंत्री के नाम जनता का संदेश नामक कविता का भी जिक्र करते हैं। यहीं नही इस कोरोनाकाल मे लिखी जा रही कोरोजीवी कविता की सैद्धान्तिकी का श्रेय भी उन्ही को देते हैं।

इस तरह वे कहते हैं कि श्रीप्रकाश जी कोरोजीवी कविता की अवधारणा के जनक हैं। इस किताब के सन्दर्भों पर चर्चा करते हुए कहते हैं कि किताब को पढ़ने पर मुझे लगा कि आचार्य द्विवेदी जी ने इसे जैसा समझा और श्रीप्रकाश जी ने उसे उसी हिसाब से रखा भी है। इस तरह वे जगत और जागृत दोनों के अर्थ को लेते हैं। इसी बीच वे अपने गुरु आलोक शास्त्री जी के संदर्भों को रेखांकित करते हैं और कहते हैं कि कोई भी शब्द पर्यायवाची नही होता हर शब्द का अपना एक अलग अर्थ होता है। संसार, विश्व और जगत ये तीनों ही पर्यायवाची हैं लेकिन सांसारिकता इसका एक दूसरा अर्थ है और वैश्विकता का भी एक अलग अर्थ है। और जागृत का तीसरा और एक अद्भूद अर्थ है। बल्कि इस पर चर्चा करने के पहले वे आचार्य द्विवेदी जी के दो किताबों पर चर्चा करते हैं, देश परदेश'  और दूसरी परंपरा की खोज इस तरह व कहते हैं कि एक सांसारिक आचार्य के रूप में द्विवेदी जी का जो व्यक्तित्व है। उसे सबसे पहले विश्वनाथ त्रिपाठी जी रखते हैं और उसके माध्यम से उनके विचार यात्रा तक चलते हैं।

उन्होंने कहा कि ठीक इसके पहले नामवर जी उन्हें एक वैश्विक आचार्य के रूप में मान्यता दी है।

इस तरह सिर्फ द्विवेदी जी के जीवन है नही बल्कि उन परंपरा, आलोचना की बात करते हैं।और ये जो जागतिक शब्द की अर्थ अंतर्निहित हो जाते हैं।

जागतिक वह है जो सांसारिक भी है और वैश्विक भी द्विवेदी जी ने अपनी इस भूमिका में बहुत ही सम्पूर्णता में लिया है। और लेखन को समझने के लिए बहुत सारे श्रोत निकाले हैं। जिसे श्रीप्रकाश जी ने भी निकाला है। उनके लेखन के आधार पर विस्तृत चर्चा उन्होंने अपनी भुमिका में किया है। जिसका जिक्र ओमप्रकाश जी भी करते हैं। आचार्य द्विवेदी जी भौतिकता की पक्षधरता के वे आचार्य थे और भारत की आध्यात्मिक परंपरा व सांस्कृतिक परंपरा का जितना गहरा ज्ञान उन्हें था उतना हूत कम लोगों के पास है।

 था वे भौतिकता के पक्षधर भी रहे हैं। और उन्होने कयी बार कहा भी है जिसका विस्तार इस भूमिका में भी मिलता है।

इस तरह सौन्दर्य की सुंदरता की नई व्याख्या जो संघर्ष की अवधारणा में निहित है।

यहाँ वे समाज व व्यक्ति के सन्दर्भों पर चर्चा करते हुए कहते हैं कि समाज व व्यक्ति का सच एक जैसा होना चाहिए।

लेकिन द्विवेदी जी ने उसको कैसे समझा था उसे श्रीप्रकाश शुक्ल जी ने अपनी भूमिका में लिखा है  कि व्यक्ति मनुष्य और समष्टि मनुष्य  दो रूपों के माध्य्म से

व्यक्ति और समाज के अंतर्संबंधों को भी नहीं समझा है। उसकी व्यापकता को अवधारणा के भीतर समेटने की जो कोशिश द्विवेदी जी ने की है।उसकी शुक्ल जी ने अच्छे से व्याख्या की है।

दूसरी चीज यह कि यह भारतीय परंपरा पूर्णतः आध्यात्मिक परंपरा है। द्विवेदी जी बार-बार उससे सामंजस्य बैठाते हैं। इस पक्ष का भी विश्लेषण शुक्ल जी ने दो से तीन पैरा में ही इस पुस्तक में किया है।

जिसे मदन जी खुद महत्वपूर्ण मानते हैं। इस भूमिका में कुछ काट भी है जैसे अविछिन्नता कि अवधारणा जिसमे जाहिर है कि अविछिन्नता का मतलब समग्रता भी है। और अपनी तरफ से इस अवधारणा की  व्याख्या भी जो द्विवेदी जी के पक्ष से एक अपनी नई व्याख्या शुक्ल जी ने इस पुस्तक में की है।

इसी बीच वे द्विवेदी जी के महत्वपूर्ण वाक्यों को भी दुहराते हैं। जैसे मंत्र वेद होने से ज़्यादा महत्वपूर्ण है आत्मवेद होना।

इससे पता चलता है कि उस पूरी कर्मकाण्डी परंपरा के बूते वे खड़े होते हैं इस तरह इंशानी चीजों को देखने के लिए श्रीप्रकाश जी ने अपनी भूमिका में अच्छा लिखा है। कि वे संस्कार से परंपरावादी और मन से आधुनिक थे यह द्विवेदी जी को समझने के लिए महत्वपूर्ण सूत्र है। इस तरह वे आधुनिकता व परंपरा के माध्यम से द्विवेदी जी को समझा जा सकता है।

वे कहते हैं कि आत्मवेद में चैतन्य है, जागरण है और मंत्रवेद में कर्मकांड है 

जहाँ द्विवेदी जी मष्तिष्क के साथ रीढ़ के होने की बात करते हैं जो आज के संदर्भों में ज्यादे जरूरी भी है।

इस तरह वे कहते हैं कि ज्ञान के साथ साहस का होना जरूरी है।

श्रीप्रकाश जी लिखते हैं कि ठंढ से नही मरते शब्द मर जाते हैं साहस की कमी से

इस तरह उन्होंने इस पक्ष को जोड़कर उसे परंपरांगत चिंतन विचारों से जो मध्ययुगीन विचारों वाले लोग हैं उनसे बिल्कुल अलग आधुनिक विवेक से ज्ञान को जोड़ा है। जिसमे ज्ञान का उपयोग परंपरांगत ज्ञान में परिवर्तन व बदलाव किया जाना अपेक्षित है।

इस तरह इस भूमिका को पढ़ने से लगता है कि  इस भारतीय संस्कृति एवं परंपरा व द्विवेदी जी के व्यक्तित्व व कृतित्व को समझने के लिए यह पुस्तक महत्वपूर्ण है।

वे कहते हैं कि मैं इस पुस्तक की भूमिका के इस पक्ष को देख रहा हूँ कि यह एक ऐसा पक्ष है जिसमे हम उनके जटिलता के साथ-साथ भारतीय सांस्कृति की जटिलता को भी समझने की एक  खिड़की खोलती है। इस प्रकार से हम पाते हैं कि इस पुस्तक पर उन्होंने काफी परिश्रम से उपयोगी कार्य किया है। मैं इस  महत्वपूर्ण कार्य के संपादन हेतु उन्हें साधुवाद व बधाई देता हूँ।

इसी बीच वे सेतु प्रकाशन की प्रकाशकीयता पर भी विस्तार में प्रकाश डालते हैं और तारीफ भी करते हैं। और कहते हैं कि सेतु प्रकाशन के लिए यह पुस्तक आलोचना के रूप में सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक होगी।

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बतौर संपादक के तौर पर अपनी बातों को निष्पक्ष रूप से रखते हुए श्रीप्रकाश शुक्ल जी ने कहा कि कमलेश जी ने बहुत ही सार्थक वक्तव्य दिया, और आदरणीय ओमप्रकाश जी ने सुचिंतित वक्तव्य दिया और मदन कश्यप जी ने बहुत ही व्यवस्थित वक्तव्य दिया। इस प्रकार सार्थक, सुचिंतित व व्यवस्थित इन तीनों विद्वानों के वक्तव्य के उपरांत मेरे लिए कुछ भी कहना कठिन है। इसी बीच वे आयोजन के सचिव अमिताभ जी का व संस्था के प्रति अभवादन व आभार प्रकट करते हुए कहते हैं कि उन्होंने इस कोरोनाकाल मे भी इस पुस्तक पर प्री बुकिंग परिचर्चा जो पश्चिम की बुक लॉन्चिंग सेरेमनी आय कह सकते हैं जो कि जोड़ा उन्होंने इसके बाद पुस्तक प्रकाशित होगी इसपर फिर चर्चा भी होगी इसके पूर्व और हम इस पुस्तक के बारे में बार-बार सुनेंगे जानेंगे इसके पूर्व हम इस विद्वानों की टिप्पणियों के माध्यम से हम इस पर जानेंगे।

उन्होंने कहा कि द्विवेदी जी की इस पुस्तक का संपादन 2007 में उनकी शताब्दी वर्ष के अंतर्गत हुवा था, इस तरह यह एक ऐतिहासिक पत्र है। जी शांतिनिकेतन से शिवालिक तक उनके षष्ठ  कुर्ति पर 1967 में प्रकाशित हुई थी और परिचय का यह विशेषांक 2007 में उनके शताब्दी वर्ष पर प्रकाशित हुवा था। जी कि यह मेरे लिए अत्यंत हर्ष का विषय है की सेतु प्रकाशन इस पुस्तक का प्रकाशन कर रहा है तो उस हिंदी विभाग का शताब्दी वर्ष भी है जिस हिंदी विभाग में द्विवेदी जी कभी कार्यरत थे। और इसी में मुझे वर्तमान में सेवा करने का अवसर मिला है।

कुल मिलाकर शांतिनिकेतन से शिवालिक तक के1967 से लेकर परिचय 2007 के प्रकाशन से होते हुए 2020 तक के इस सफ़र की जो तिथियाँ हैं इन तिथियों का अपना महत्व रहा है।

आचार्य द्विवेदी जी की चर्चा तो पुस्तक आने के बाद आगे भी होती रहेगी पर मेरी कोशिश ये रही है कि तब और अब भी कि द्विवेदी जी के सभी पक्षों पर कुछ न कुछ यहाँ पर जरूर राखूं जिससे शोधार्थियों शिक्षकों और छात्र-छात्राओं को अधिक से अधिक लाभ पहुंचाया जा सके। सर्जक और लेखक तो लाभान्वित होते ही रहते हैं।

आगे वे कहते हैं कि द्विवेदी जी बहुत ही शुद्ध व मेधी लेखक रहे हैं। पर किसी कारण से बहु- विधात्मक लेखन भी किये हैं। जैसे आलोचना, निबंध, कविता, जयोतिष आदि बहुत सारी विधाएं, इस तरह उनके व्यक्तित्व को देखा जाए तो जाहिर सी बात है कि इनकी एक-एक विधाओं पर बड़ी से बड़ी चर्चा हो सकती है।

इस पुस्तक में  कुल 28 अठ्ठाईस लेख हैं कहीं भूमिका को छोड़कर के और उआँ 28 लेखों ने निश्चित रूप से बहुत सामग्री ऐसी मिलेगी जो द्विवेदी जी पर अबतक उपलब्ध नही हो पायी है।

 वे यह भी कहते हैं कि परिचय पत्रिका का जो विशेषांक आया था, उसके अतिरिक्त भी बहुत कुछ सामग्री इसमे जोड़ी गई है। जैसे काशी हिंदू विश्वविद्यालय का हिंदी विभाग तथा बनारस का उनसे अन्तर्सम्बन्ध खासकर उनके कार्यकाल में विभाग से जुड़े प्रसंग आदि उसे भी जोड़ा गया है।

इस तरह द्विवेदी जी के शांतिनिकेतन से शिवालिक तक कि यात्रा व फिर बनारस वापसी व अन्यान्य अंतर्संबंधों पर भी व्यापक चर्चा की गई है।

उन्होंने यह भी कहा की जब मैं 2005के बनारस बीएचयू में आया तो उसके तुरंत बाद मेरी मुलाकात  हजारी प्रसाद द्विवेदी जी से हुई, उसके बाद मेरी प्रगाढ़ता बढ़ती ही गयी और उनके प्रति मेरा रुझान भी बढ़ता गया। उसका एक कारण यह भी था कि वे मुझे अत्यधिक स्नेह भी देते थे। इसी बीच वे ।जूझे अपने घर भी ले गए इस तरह वे द्विवेदी जी के साथ बिताए पल के तमाम संस्मरणों को भी सुनाते हैं।

और कहते हैं कि मेरे मन मे द्विवेदी जी के प्रति पहला व्यवस्थित रूप से सुरु करने का विचार  मुकुंद जी के संपर्क में आने के बाद हुवा, ख़ासकर एक बात जो मेरे मन मे बार बार उठती है कि बनारस में सबकुछ है बीएचयू आचार्य शुक्ल शोध संस्थान लेकिन इस बात को लेकर मुझे पीड़ा होती रही कि आचार्य द्विवेदी जी को लेकर कोई भी संस्थान यहां नही है।

सोचता हूँ कि जो व्यक्ति जीवन के जागतिक पक्ष पर जीव जगत व प्रकृति व मनुष्य के संबंधों पर संघर्षों पर बराबर सोचता रहा उस पर पूरे बनारस में कोई हलचल नही थी। इसी बात को लेकर जो मेरे मन मे बात उठी उसी को लेकर मैन एक भूमिका लिखी है। और मैन कोशिश भी की है उसमे उनकी पीड़ा को भी मैंने लिखी है। 

वैसे उसकी भूमिका थोड़ी लंबी है पर आप पुस्तक को पढ़ेंगे तो बहुत कुछ पाएंगे।

वे यह भी कहते हैं कि मेरा इस महान पुस्तक पर लिखने का कोई महान इरादा नही था और आज भी नही है, पर आज जो पुस्तक सेतु प्रकाशन से आ रही है इसमे आपको कुछ नई चीजें मिलेंगी। इस तरह वे चर्चा करते हैं कि मुझे शीर्षक को लेकर जो सूत्र मिला वो मुझे इस तरह द्विवेदी जी पर कुछ अलग ही सोचने के लिए बाध्य किया जिसे चिंतन के दौरान मुझे इस पुस्तक के शीर्षक को लेकर सूत्र मिला।

इस तरह यह द्विवेदी जी पर साधारण तरीके से उनके असाधारण व्यक्तित्व के बारे में सोचने की मैंने कोशिश जरूर की है और इतना विशाल व्यक्तित्व है आचार्य द्विवेदी व आचार्य शुक्ल जी का कि हम लोग कहीं से सुरु करेंगे तो पहुंचेंगे उन्ही के यहाँ।

इस तरह की जो समस्याएं हैं या जो भिन्नताएं हैं उनपर कोई नही जानता पर उनके जागतिक पक्ष पर सोच रहा था कि द्विवेदी जी के बारे में में जो उनकी पुस्तक लालित्य तत्व है, तो लालित्य तत्व में उनका एक वाक्य आता है जिसे वहीं से आरंभ किया था मैंने जब वो लालित्य तत्व पढ़ा था लेकिन मुकुंद द्विवेदी से जब मेरी बात होती थी तो लालित्य तत्व पर होती थी क्योंकि उन्होंने मुझे इसकी पूरी सूची दी थी।

1936 में आचार्य द्विवेदी जी की पहली पुस्तक सूर साहित्य प्रकाशित हुई थी वहां से लेकर लालित्य तत्व की पूरी सूची मुझे दी थी और मुझसे कहते थे कि द्विवेदी जी को समझना ही तो क्योंकि वे जसनते थे कि मैं कविताएँ लिखता हूँ  और मैं बनारस में आ गया हूँ।  क्योंकि इसके पूर्व मैं यहां नही था उनसे इतना संपर्क भी नही था अतः वे कहते थे कि आप लालित्य तत्व को पढ़िए क्योकि उससे आपके कवि मन को प्रेरणा भी मिलेगी।और द्विवेदी जी को समझने की पूँजी भी।

उनके इस वाक्य पर मेरा ध्यान गया। जब पढ़ना सुरु किया था तो 2006 के आस पास आज के करीब 14 वर्ष पहले उसमे एक वाक्य आता है कि स्थूल जगत को छोड़कर मनुष्य जी नही सकता और अपने देशकाल की सीमाओं से अस्पृश्य रहकर कोई शिल्प सृष्टि नही कर सकता।

अब ये अस्पृश्यता जगत को छोड़कर कोई मनुष्य जी नही सकता क्योंकि इसमें जो जगत की स्थूलता है, ये द्विवेदी जी के यहाँ बार-बार अति है। उनके उपन्यासों में भी आती है और निबंधों में भी आती है। तो ये जो जगत है असल मे  इसमे जगत के व्यापने का भाव ही समाहित है। और वहीं प्राणी जगत अगर है तो उसमें गति अवश्य है। इस तरह गति को छोड़कर के जगत को नही समझा जा सकता , ये समझ मेरी दद्विवेदी जी को पढ़ने व पढ़ाने की प्रक्रिया में ही बनी है और वहीं मेरी इस पुस्तक 'आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी एक जागतिक आचार्य' पुस्तक की प्रेरणा स्रोत रही है। और इसमे तुलसी की याद का आना स्वाभाविक है कि सबसे भले विमूढ़......जनहिं न व्यापति जगत गति।।

अब जो जगत गति है यानी कि तुलसी जी शुक्ल जी के साथ द्विवेदी जी के भी प्रिय रहे हैं। तो जगति गति की जो व्यपकता है यानि कि जगति नही जगत गति की जो व्यापकता है यह द्विवेदी जी के यहाँ तुलसी जी के माध्यम से जिस तरह से आई और उसके पीछे की जो परंपरा है, तो जिनहिं न व्यापहिं जगत गति में मुझे जिस प्रकार जगत के गति की सम्भावना दिखाई देती है। वो मुझे बडी नयी दृष्टि लगी थी। द्विवेदी जी को पढ़ते समय....! और जिसमे गति की गूंज हो तो मैंने साफ-साफ सुनने की कोशिश की है। क्योंकि गति के बगैर ये जो जगत है, रूढ़ है या रूढ़ हो जायेगा, ठहर जाएगा इसकी समझ मुझे द्विवेदी जी की रचनाओं से मिली। वे बार-बार लिखते हैं कि मानवी आदान-प्रदान इन्हीं जागती प्रपंचों के बाद चलता है। अब ये जागतिक प्रपंच है मानवीय व्यापार यहीं जगत गति है। ये बार-बार द्विवेदी जी के यहां दिखाई देता है। यहीं से द्विवेदी जी की सबसे बड़ी व्यवस्थित समझ है। कि पश्चिम की भारत व्याकुल आध्यात्मिकता को अपनी रचना में रखते हैं और सम्बंधों को वे समझने की कोशिश वे करते हैं। और भारत के सांस्कृतिक व्यवस्था के  भारत निर्माण को समझने की कोशिश करते हैं।

आप उसमे व्यवस्थित चित्त की बात देखिए कि जगत में गति आई और गति में समष्टिगत चेतना है। तो जगति गति के माध्यम से समष्टिगत चित्त की ओर हमेशा अग्रसर होता रहता है

 और यह जोवैज्ञानिक शब्दावली है ये जो समष्टिगत चित्त है उसमें भारतीय मनीषा काम जिसे मैं कहता हूँ कि यह सामान्यकोटि है और यहीं से जो है जिसका माध्य्म से सामान्य मनुष्य अपना समूल तत्वों का विकाश भी करता रहता है। इस तरह यह जागतिक शब्द से जागतिक में बदला जा सकता है। लेकिन ये मुझे जागतिक शब्द का प्रयोग उनकी रचनाओं में दिखाई दिया। इस तरह मैं जो सोच रहा था द्विवेदी जी वे ही सोच रहे थे। इस प्रकार उनके सोचने व मेरे सोचने 

में एक खास दृष्टि का अंतर नही था।

इसी बीच वे उनके निबंध अशोक के फूल से संकलित भारत मे वर्ण की सांस्कृतिक समस्या पर भी चर्चा करते हैं। और कहते हैं कि इस जागतिक व्यवस्था ने जनता को उदासीन बना दिया है। यह शुद्ध वाक्य है जो भक्तिकाल को समझने का आधार देता है। ये जो जागतिक शब्द का सर्वाधिक संकेत या प्रयोग द्विवेदी जी ने किया है ऐसा भारत की सांस्कृतिक समस्या में दिया है।

ये जो जगत है, मनुष्य है उसके साथ जो प्रकृति है मनुष्य व प्रकृति के संघर्ष में उस सौन्दर्य का सृजन होता है। जिससे इस साहित्य का स्वर कहीं न कहीं शामिल रहता है।

क्योंकि यहां पर जगत भी है, विवेक भी है और बोध भी..!

द्विवेदी जी इस जगत के माध्यम से वे जगत का ही बोध नही कराते बल्कि विवेक और वैराग्य की भी बात करते हैं।

इस तरह द्विवेदी जी केवल जगत के जागतिक बोध प्रबंध की बात करते हैं। जिसे समझने की ही बात नही करते, वे कहते हैं कि बोध हो गया तो विवेक आयेगा, जो आधुनिक चेतना है उसके बाद वैराग्य आएगा, को आगे की जितना है आधुनिकता का जो परिष्कृत रूप है

इस प्रकार मैं कहना चाहूंगा कि द्विवेदी जी का जो व्यक्तित्व था ओ कबीर के विद्रोह व सुर के प्रेम और तुलसी के ऐश्वर्या से भी बना हुवा है। उसमे मानव जीवन में जो मिश्रण था वे इन्हीं रचनाकारों के माध्यम से समझने की कोशिश करते हैं।📚✍️

प्रस्तुति : मनकामना शुक्ल 'पथिक'

संपादक संपर्क सूत्र :-
ईमेल : corojivi@gmail.com

मो.नं. : 8429249326

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