Thursday, 31 August 2023

बहन का मतलब (meaning of sister)

बहन का मतलब

अंग्रेजी में ‘बहन’ को ‘सिस्टर’ कहते हैं
जिसका मशहूर मतलब है
‘स्वीट’ , ‘इनोसेंट’ , ‘सुपर’ , ‘टैलेंटेड’ , ‘एलिगेंट’ और ‘रिमार्केबल’

हिन्दी में बहन का पहला मतलब है
‘ब’ से ‘बज़्म’ है बहन
‘ह’ से ‘हथौटी’ है बहन
‘न’ से ‘नज़्म’ है बहन

बहन का दूसरा मतलब है
‘ब’ से ‘बल’ है बहन (भाई का)
‘ह’ से ‘हल’ है बहन (हर सवाल का)
‘न’ से ‘नल’ है बहन (पानी का)

बहन का तीसरा मतलब है
‘ब’ से बाप के लिए बधाई बन जाना
‘ह’ से हक के लिए हथियार उठाना
‘न’ से नीच के लिए नाख़ून बढ़ाना

बहन! बहन का चौथा मतलब क्या है?
“दूसरे की बहन को अपनी बहन समझना!”

(©गोलेन्द्र पटेल / 31-08-2023)

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डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
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Tuesday, 29 August 2023

बहनापा : रक्षाबंधन / माँ-बहन की जीवनगाथा : गोलेन्द्र पटेल

1).

लड़के सिर्फ़ बचपन में रोते हैं
लेकिन लड़कियाँ हमेशा,
लड़कियों को यह कहा जाता है
कि पेड़ों पर मत चढ़ना, उनमें जिन्न होते हैं;
एक लड़के ने एक लड़की से पूछा,
लड़कियों के खाद्य लड़कों से क्यों भिन्न होते हैं?
जबकि अन्य जीवों में ऐसा नहीं है!

2).

हमारे और हमारी बहन के बीच

नारीवादी आलोचना पर बहस जारी है
हमने अपनी बहन से कहा—

स्त्री-विमर्श की दृष्टि से
यह बात सही है 
कि बहनापे में जो आत्मीयता है
वो भाईचारे में नहीं है।

हम शब्दों के दुनिया से परिचित हैं
अभी स्त्रियों की भाषा पुल्लिंग प्रधान है
उन्हें ख़ुद का व्याकरण गढ़ना है
हम पुरुष हैं
पर, हमें उनका दुःख पढ़ना है
ताकि हमारे भीतर की स्त्री ज़िन्दा रहे
जो कहे, ‘वेदना विभूति है
स्त्री पुरुष की अनुभूति है।’ (कवितांश : 'बहनापा' से)

3).

इस दुनिया में 
जीवन से जीवन मसले गये हैं

आधी आबादी
कब तक
अक्स से आँसू का आयतन मापेगी?

अब वक्त आ गया है
अस्मिता को खोजने के लिए
हो सके तो नदी में
ख़ुद डूबें

अगर देह
आत्मा की बेगार की जननी है
अगर आँखें
दिन के दुःख रात में छुपा रही हैं
तो समझना 
सच के मुहावरे क्रांति चाहते हैं

4).

प्रश्न
_____________
आग से प्रश्न :
पानी 
मेरा पति है
पर , हवा पत्नी ।
मैं कौन हूँ ?

5).

माँ-बहन की जीवनगाथा


क्या लिखूँ मैं जननी पर, जन्मभूमि पर, भगिनी पर...


यदि मेरी माँ महाकाव्य है

तो मेरी बहन उपन्यास है

और अभी तक मैंने इन पर एक शब्द भी नहीं लिखा है

जब लिखूँगा, तो निःसंदेह

मैं अमर हो जाऊँगा

लेकिन अमरता का अपना दुःख है न?

उसी से भय लगता है मुझे, माँ शारदे!


माँ शारदे, मैं तुम्हारी आज्ञा की अवहेलना नहीं कर रहा हूँ

सच बता रहा हूँ मैं डरता हूँ अमर होने से

मेरे जो पुरखे आसमान में धरती की कथा लिखकर अमर हुए हैं

उन्होंने मुझे यह सीख दी है कि पानी पर लिखा हुआ सत्य

पत्थर पर लिखा हुआ सत्य से कई गुना अधिक दीर्घजीवी होता है 

बशर्ते पानी स्त्री की आँखों का हो


पर, पानी पर लिखे हुए अक्षर

उन्हें ही नज़र आते हैं जिनकी आँखों में सागर जितना पानी होता है

अभी मेरी आँखों में उतना पानी नहीं है, माँ शारदे!

मैं कैसे लिखूँगा पानी पर अपनी माँ-बहन की कहानी?

क्या एक पत्ते पर उनके बारे में लिखकर तैरा दूँ नदी में?

पर, एक पत्ते पर तो सिर्फ़ पत्र लिखा जाता है

मुझे तो उन पर महाकाव्य और उपन्यास लिखने हैं

जिसके लिए दुनिया के सारे पेड़ के पत्तों की ज़रूरत होगी

यानी पृथ्वी के सभी हरे पेड़ों को नग्न होना होगा

तब जा कर इनकी पूरी कथा पानी पर होगी


इनकी पूरी कथा पूरी पृथ्वी पर भी नहीं लिखी जा सकती है

पत्तों पर लिखने से यह फ़ायदा होगा 

कि वे नदी-सागर में भी तैरेंगे

जो बचेंगे उन्हें धरती पर फैला दिया जाएगा

क्योंकि इनकी जीवनगाथा एक पर एक सरियाने से 

इतनी ऊँची हो जाएगी कि वह आसमान से सट जाएगी

मानो मनुष्य की निगाह में क्षितिज


अभी तुम्हीं बताओ, माँ शारदे!

क्या ब्रह्मदेव मुझे इतने पत्ते, इतनी रोशनाई देंगे

कि मैं लिख सकूँ अपनी माँ-बहन की पूरी जीवनगाथा!

यदि मिलने की संभावना है, तो

मैं उनकी कठोर तपस्या करने को तैयार हूँ

कई हजार वर्षों तक समाधि में लीन रहने को तैयार हूँ

चाहे मेरी हड्डियों को दीमक चाट जाए

या फिर मुझे अजगर निगल जाए

मैं साधनारत रहूँगा

ऐसा मुझे शिव से वरदान मिला है

विष्णु ने अपना शंख दिया है लेखनी के लिए

बस, पत्ते और स्याही चाहिए, माँ शारदे!


माँ शारदे, तुम्हें तो यह ज्ञात है

कि यह अतिशयोक्ति नहीं, परम सत्य है 

इनकी कथाओं को लिपिबद्ध करना कितना चुनौतीपूर्ण कार्य है?

इसे तो विघ्नहर्ता श्रीगणेश भी लिपिबद्ध करने में असमर्थ हैं 

तो फिर मैं यह कैसे कर सकता हूँ?

मैं तो मनुष्य हूँ, मुझे कुछ वरदान मिले हैं तो क्या हुआ

अभी अपनी माँ-बहन की कथा लिखने के लिए

और वरदान चाहिए

अभी और तपस्या करनी है, साधना करनी है मुझे

वह मंत्र दो, माँ शारदे!

जिससे ब्रह्मदेव प्रसन्न होते हैं

ताकि मैं तुम्हारी आज्ञा की अवज्ञा न कर सकूँ


माँ शारदे!

मुझे भी लिखनी है अपनी माँ-बहन की जीवनकथा

आज नहीं, तो कल।


(©गोलेन्द्र पटेल / 29-08-2023)

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Thursday, 24 August 2023

मुक्तिबोध पर मुक्तिबोध की तरह कविता : गोलेन्द्र पटेल

मुक्तिबोध पर मुक्तिबोध की तरह कविता

शब्दबद्ध— उत्कृष्ट तीव्र अनुभव

युगबोध...
इस अर्थ क्रीड़ा के दौर में और क्या है?
काव्य-नायक का

उसकी क्या पहचान है?
जो आत्मा सभ्यता को मरता देख,
अपने अर्थ से अनजान है
क्या वह इनसान है?

कैसा है उसका रिश्ता?
स्याह आसमान की आह से
सागर में नदियों के आँसू
संचित हैं; धरा का हरापन गायब हो रहा है
आहिस्ता! आहिस्ता!! आहिस्ता!!!
किन्तु, किन्तु-परन्तु उपस्थित रहेंगे
लेकिन के साथ
और इत्यादि भी; पर,
दुःख, पीड़ा, वेदना व संवेदना के बाद


क्या यह उसके सत्य का संवाद है?
नहीं, अपने मूल्य में सिर्फ़ नाद है
उसके अनुप्रासिक आयतन का, 
शायद आंतरिक आवाज़ का

क्योंकि वह वाद है
वह अपने मूल में त्रिकोणीय चक्कर लगा रहा है
लगातार
वह अँधेरा रचता है, उसके लिए
रात रचनात्मक है
वह सुबह के इंतज़ार में रात रच रहा है
(रोशनी की भाषा में रात
पेड़ों की आँखों से
टपकती है
और नींद के मुहावरे जाग जाते है
स्मृति की बात
उसकी कविता है!)
यह उसके सपनों का ज्ञानोदय है

मतलब, उसकी नयी ज़िंदगी की नयी लय है
सपनों की दुनिया में
उसने सोचा,
वक्त के वाचक को पता है,
सच्चा प्रेम स्वतंत्रता का हेतु है
वह लोकोन्मुख शास्त्रज्ञ है
कोई महान दुःख
उसके हृदय और मन का सेतु है

वह भावनात्मक विचार में डूब गया है
उसकी नसों में बिजली दौड़ रही है
उसने अपनी साँसों की गति पर काबू करते हुए कहा,
जनता के शोर से नहीं,
शब्दों के शोर से सत्ता को डर लगता है
शब्द हथियार होते हैं
इसीलिए वह भावभूमि और मनोभूमि में शब्दों की खेती कर रहा है

वह खेत भर कुदाल से लिखता है
कि वह सिर्फ़ वह नहीं है, इस वह में कई वह शामिल हैं

वह पानी पर पदचिन्हों को पढ़ता है

उसका;
जो उसके रक्त की राजनीति करता है

उसके निर्णय और निष्कर्ष के बीच
सभ्यता-समीक्षा का दृष्टिकोण है
स्वतः स्फूर्त संवेदन व साध्य गतिशीलता
उसकी दुरूह व कठिन संप्रेषणीयता को नयी दिशा
व दृष्टि प्रदान करती हैं
उसके जीवन का ताना-बाना
सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक एवं नाना
प्रकार की मानवीय क्रिया-प्रतिक्रिया है
जहाँ नवोन्मेषी चेतना
उसकी सोच की पहली इकाई है
वह शोध कर रहा है
बाह्य जगत के स्रोतों को आधार बनाकर
आंतरिक जगत पर
अपने इस शोध के बाद
वह विश्वदृष्टि का रूपक हो जाएगा

लयबद्ध— उसकी उदात्त आत्मा
व्यष्टि से समष्टि की ओर उन्मुख है
और उसकी भाषा
शास्त्र से लोक की ओर
वह हजारों गुफाओं से गुज़रता हुआ
हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर
तपस्यारत है

वह कभी नहीं सोता है
समाधि में सिर्फ़ शिव उसे टक्कर दे सकते हैं
वह परम-अनंत का अनंत हो चुका है
उसके उच्चरित मंत्र से
सृष्टि की संपन्नता है

उसकी आँखें एकांत में हैं
किन्तु, कान नहीं
उसकी आँखों से विश्वदर्शन के प्रकाश फूट रहे हैं
वह समय सापेक्ष सत्य का स्रष्टा है
उसकी वाणी में नदी-सागर के संगीत हैं
जंगल की हरियाली है, चिड़ियों के मधुर स्वर हैं
पर्वत-पठार के प्रगीत हैं

और है अग्नि की ध्वनि
वह परम-अभिव्यक्ति का पर्याय है
उसी के शिष्य प्रियतम पुरखे मुक्तिबोध हैं

मुक्तिबोध?...मुक्तिबोध??...मुक्तिबोध???

स्याह संवेदना को शस्त्र
एवं अँधेरा को अस्त्र में रूपांतरित करने वाले
सर्जक हैं मुक्तिबोध

मुक्तिबोध की 'अंधेरे में' कविता
मेरे लिए कविता नहीं
नाटक है
उसमें चार दृश्य हैं परंतु आठ अंक हैं
सो , सब कविता समझते हैं
उसमें आत्मचेतस् से अधिक विश्वचेतस् की ठूँसाठूँसी है
अर्थात् शब्दों की सघनता में विचार लगातार
बार-बार उहापोह होते हुए भी
आशंका के आकाश में उदात्तता की उड़ान भरता है
एक नये उजास के साथ उस पार
पहुँच जाता है कवि

उसकी भीतरी छवि देखने पर पता चला कि
मन और हृदय के बीच
बुद्धि का अद्वितीय अनुरोध है
प्रतिबद्ध प्रसंग में आधुनिक सभ्यता का बोध
मुक्तिबोधीय चेतना का शोध है
जहाँ भाव विकल और ज्ञान पिपासु समय के साधक ने
जीवन के वन में व्यक्तित्व वृक्ष के नीचे
अपना विराट विवेक विपश्यना की मुद्रा में बैठाकर
अनुभव की उर्ध्वगति साध ली है
उसके संवेदित सच का आधार
स्याह संवेदना है
उसके लिए मनुष्यता मूल्यवान निधि है
यह आत्मनिरीक्षण द्वारा आत्मशुद्धि की
अत्यंत पुरातन साधना-विधि है

उजाले की तलाश में भविष्यवक्ता भटकता है
कहीं और नहीं, अपने भीतर
आनंद के नहीं
आघात के अन्वेषक हैं वे
जटिल मन:स्थिति के लेखक हैं
आत्मा के शिल्पी हैं

वाद-विवाद से दूर
निनाद और संवाद प्रिय वक्त के वक्ता हैं

उनके द्वारा अँधेरे की आवाज़ को
अभय व कर्म तत्परता का मंत्र मिला है
वे आंतरिक पुनर्रचना के प्रगतिशील स्वर हैं

उनकी रचनाओं से गुज़रते हुए
मैंने महसूस किया है कि
नये शिल्प की सम्भावनाओं को लेकर
वैचारिक द्वन्द्व की अभिव्यक्ति जनपक्षधरता की ओर
अभूतपूर्व ऊर्जा और आवेग से आगे बढ़ती है
जो स्वयं को गढ़ती है

सघन अंधकार में सहर्ष स्वीकार का मौलिक संसार
आत्मालोचना की भाषा में अंतर्मन का विस्तार है
उनकी चिन्ता में वह मनुष्य है
जो पूँजीवादी तंत्र में उत्पीड़न का शिकार है
यह हम सबके प्रियतम पुरखे का साहित्यिक सरोकार है

संवेदना के सफ़र में स्वप्नजीवी की संघर्षरत सम्प्रेषणीयता
आग के राग से है
जो आँखों में नवोन्मेषकारी शक्ति की तरह
मौजूद है
वरना वाचक का क्या वजूद है?

उनकी अंतर्यात्रा में सौंदर्य का संवेदन है
वे लगातार चेतना की चित्रकारी में फैंटेसी का प्रयोग करते हैं
वे कविता के नये प्रतिमान हैं
उनकी पंक्ति-पंक्ति में राजनीति का रस है
अस्मिता की खोज की प्रक्रिया को प्रेरणा देने के लिए
असल में अँधेरे की भयानक आकृति
ब्रह्मराक्षस है!

जनपक्षधरता— आधुनिकता-भाष्य

नई अस्मिता, पुराने स्व-संवाद

मशीनी मनुष्य की ज्वलंत समस्या

विद्या और विधा के बीच— वैविध्य विधि-प्रसंग

जादुई यथार्थ, रचना-शीलता

उत्थान-पतन, नाटकीयता— कथा-भंग

वर्चस्व के ख़िलाफ़ लगातार संघर्षरत व्यक्ति

सहज शक्ति, सजग भक्ति

ऊँची सतह, गहरी अनुभूति

द्वंद्वात्मक संबंध— उत्तम उमंग

निर्बंध-गंध, रस-रंग, सौंदर्य-संग, निःसंदेह

परिवर्तनकारी शांतिपूर्ण क्रांति के महासूत्र

ये सब के सब हैं इनके पास

और आत्म-इतिहास भी।

(©गोलेन्द्र पटेल / रचना : 30-05-2022)

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Monday, 31 July 2023

लहरतारा से लमही (प्रेमचंद की 143वीं जयंती) / धुआँ और कुआँ : गोलेन्द्र पटेल

लहरतारा से लमही


लहरतारा से लमही जाते हुए
मैंने जाना—
मन और हृदय के योग से बुद्धि का विस्तार होता है

हे महाप्राण!
मुझे प्रेमचंद जयंती पर नागार्जुन क्यों याद आ रहे हैं?

मैंने जब भी पकड़ी है कुदाली
मेरे लिए
तब खेत कागज़ बना गया है
और कुदाली कलम
और स्याही
मेरे पसीने से मंठा माटी

मैंने जो लिखें अक्षर
वे बीज की तरह उग गये
पूरे खेत में

एक वाक्य मेंड़ पर उगा—
समय के शब्द शोषण मुक्त समतामूलक समाज के पक्षधर हैं

संघर्ष के स्वप्न श्रम के सौंदर्यशास्त्र रचते हैं
क्योंकि कलम के सिपाही सेवा, संयम, त्याग
और प्रेम के किसान हैं
जहाँ नई फ़सलों के नये गान हैं
कि कथा के प्रतिमान प्रेमचंद हैं
वे मानवीय पीड़ा की प्रतिध्वनि के छंद हैं।


धुआँ और कुआँ


क्या धुआँ तुम्हारे फेफड़े को पसंद है?

हुक्का पीते हुए
मैंने सोचा—
क्या भाषा में दुःख का हुक्का-पानी बंद है?

चिन्तन और चेतना के संगम पर
जाति की अस्मिता है

मैं गहरा कुआँ हूँ
मेरे सोते उस पानी को खींचते हैं
जिसके ऊपर अछूत रहते हैं

मेरे भीतर नेह की नदी बहती है
पर, जो मेरे पानी पीते हैं
उनके भीतर इतनी घृणा क्यों?
वे उन्हें जगत पर क्यों चढ़ने नहीं देते हैं?
जो मेरे ऊपर रहते हैं

अरे! अब
कहाँ?
किसे?
कौन?
कुएँ पर चढ़ने नहीं देता है

दुनिया में कुछ अपवाद होते हैं न?

अपवादों से दुनिया नहीं चलती है
दुनिया चलती है अधिकांश के अनुसमर्थन से....

खैर, मुझे याद है कि स्कूल के उस बच्चे ने घड़े से
सिर्फ़ एक गिलास पानी लिया था
जो पैर के प्रहार से मरा है

आह! घाव हरा है, दुःखी धरा है!!

(©गोलेन्द्र पटेल / 31-07-2023)

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नोट: प्रेमचंद पर केंद्रित मेरी तीन दर्जन कविताएँ हैं।

Thursday, 27 July 2023

मेरी प्रतिभा विरासत नहीं, विपन्नता की देन है : गोलेन्द्र पटेल (ऋतु गर्ग से बातचीत)

सादर नमस्कार मैं ऋतु गर्ग सिलिगुड़ी पश्चिम बंगाल से

गृहिणी समाज सेवी साहित्यकार आपसे आदरणीय कलमकार केशव विवेकी जी द्वारा संपादित काव्य प्रहर मासिक पत्रिका हेतु

आपकी साहित्यिकी यात्रा से जुड़े कुछ प्रश्न में जानना चाहते हैं जिससे हमारे पाठक पढ़कर प्रेरणा प्राप्त करें। 


*1. हम आपका परिचय अपने पाठकों को करवाना चाहते हैं, आप अपने सहज सरल शब्दों में अपनी बारे में हमें बताएं।*

 

A.  नमस्कार! सर्वप्रथम आपके और प्रिय यशस्वी संपादक श्री केशव विवेकी जी के प्रति हार्दिक आभार एवं साधुवाद! मुझे अपने कार्यक्रम से जोड़ने के लिए।


वैसे तो मेरा कोई विशेष सफल परिचय नहीं है, न ही वह पठनीय है। फिर भी, मैं पूरी ईमानदारी के साथ अपने बारे में बताऊँगा लेकिन आपको क्या लगता है कि हर रचनाकार अपने बारे में पूरा सच बताते हैं! क्या एक रचनाकार के साक्षात्कार से उसके व्यक्तित्व के बारे में सही जानकारी प्राप्त होती है? मुझे लगता है कि रचनाकार के व्यक्तित्व के बारे में जानने के लिए रचनाकार का नहीं, बल्कि उसके करीबी उन लोगों का साक्षात्कार लेना चाहिए, जो भाषा में उपेक्षित हैं। मसलन— रचनाकार की जन्मभूमि, कर्मभूमि व भावभूमि से जुड़े हुए लोगों का साक्षात्कार, ख़ासकर उन स्त्रियों का साक्षात्कार लेना चाहिए, जो रचनाकार को जन्म से जानती हैं ।


बहरहाल, मेरा घरेलू नाम 'गोलेन्द्र ज्ञान' है और साहित्यिक नाम 'गोलेन्द्र पटेल'। मेरा जन्म 5 अगस्त, सन् 1999 ई. को उत्तर प्रदेश के चंदौली जिला के खजूरगाँव में एक किसान-मजदूर परिवार में हुआ। मेरे पिता दिव्यांग (विकलांग) हैं और मेरी माता किसान-बनिहारिन हैं, वे दूसरे के खेतों में काम करती हैं, रोपनी से लेकर सोहनी तक। हम तीन भाई व एक बहन हैं और सबसे बड़ा मैं हूँ।


मेरी प्रारंभिक शिक्षा मेरे गाँव की सरकारी स्कूल से हुई है। मेरी शिक्षा का किस्सा रोचक इस अर्थ में है कि मैंने भोजन के लिए सरकारी स्कूलों में पढ़ा है। बचपन में एक उदार शिक्षक की नज़र मुझपर पड़ी, वे मुझे अपने प्राइवेट स्कूल में ले गये। उनकी कृपा से फ़ीस माफ़ थी लेकिन भूखे पेट पढ़ाई में मेरा मन नहीं लगता था। क्योंकि उन दिनों मेरे घर की स्थिति बहुत ख़राब थी। किसी दिन चूल्हा जलता था, तो किसी दिन नहीं। इसलिए मैं नियमित क्लास नहीं कर पाता था। अंततः मैं भूख से परेशान होकर सरकारी स्कूलों में चला गया। वहाँ शुरू-शुरू में चावल-गेहूँ मिलता था। लेकिन कुछ सालों में 'दोपहर का भोजन' मिलना शुरू हो गया। खाना बनाने वाली चाची-दादी मेरे घर की दैन्य स्थिति से अच्छी तरह से परिचित थीं, इसलिए मुझपर उनकी दया दृष्टि बनी रहती थी। गुरुजन की कृपा से किताब-कॉपी की दिक्कत नहीं होती थी और ऊपर से मैं बुनकरों के साथ सुबह-शाम हथकरघे पर कढ़ाई करता था और चरखे पर उनकी नरी भरता था। 


माध्यमिक विद्यालय में पहुँचा, तो नरेगा (मनरेगा) में काम करने लगा। गाँव में सड़कें या नालियाँ बनती थीं, तो उसमें काम करता था। सम्पन्न किसानों के खेतों में भी काम करता था लेकिन मजदूरी बहुत कम मिलती थी और काम गँड़ियाफार करना पड़ता था। मजूरी कम मिलने से मन खिन्न हो गया, तो कभी रामनगर मजदूर मंडी तीनपौलिया, तो कभी पड़ाव मजदूर मंडी के जरिये, मैं शहरों में राजगीर का काम करने लगा। बैग लेकर मैं अपने साथियों के साथ पढ़ने जाता था लेकिन पढ़ने न जाकर हम सब काम करने चले जाते थे। सबके घर की स्थिति ठीक नहीं थी। 10वीं तक जो मेरे सहपाठी थे, अब वे सब शहर में मजूरी करते हैं। चौथी कक्षा से आठवीं कक्षा तक की पढ़ाई मैंने ऐकौनी से की। यह गाँव मेरा पड़ोसी गाँव है और 9वीं से 12 वीं प्रभुनारायण राजकीय इंटर कॉलेज, रामनगर, वाराणसी से। 12 वीं के बाद इंजीनियरिंग परिवेश परीक्षाएं पास करने के बाद आर्थिक स्थिति ठीक न होने की वजह से एक साल घर बैठना पड़ा, फिर काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी, पालि , ए.आई.एच.सी., फ्रेंच व अँग्रेज़ी से बी.ए. किया और संस्कृत से दो वर्ष का डिप्लोमा कोर्स भी। फिलहाल मैं हिंदी विभाग, बीएचयू में परास्नातक फाइनल ईयर का शिक्षार्थी हूँ। मैं नेट भी पास हो चुका हूँ।


बचपन में इंद्रजीत सिंह एवं अन्य साथियों के साथ मिर्जापुर के लालपुर के पहाड़ों में काम करता था, पत्थर तोड़ता था, गिट्टी फोड़ता था और गायों के लिए घास छिलता था तथा गोबर सैंतता था, रात में खेत की फ़सलें अगोरता था। इसलिए वे पढ़े-लिखे लोग जो मेरे जीवन से थोड़ा बहुत परिचित हैं, वे मुझे कभी हल्कू, तो कभी होरी, तो कभी पहाड़ी कवि कहते हैं। इंद्रजीत अभी भी पहाड़ों में पत्थर तोड़ते हैं।


*2. आपका लेखन काल कब से प्रारंभ हुआ।*


A. देखिए! लेखन कार्य तो बचपन से शुरू है। मैं पढ़ने में सामान्य था, लेकिन कहते हैं न कि अँधों में काना राज होता है, सभी सहपाठी साथी एक जैसे परिवेश से आते थे। हम सब मजदूर के बच्चे थे। कोई क्लास मानीटर बन जाए, हमें फ़र्क नहीं पड़ता था। हमारे बीच लोकतांत्रिकता थी, हमें जाति का बोध नहीं था। हिन्दू-मुसलमान व दलित-सवर्ण सब एक ही थाली में खाते थे, मेरे गाँव में चार हजार से अधिक दलित हैं। एक दिन चौथी कक्षा में मैंने प्रार्थना के बाद 25 तक पहाड़ा सुनाया, तो मुझे क्लास-मॉनीटर बनाया गया। रोज़-रोज़ गुरुजन हमें प्रार्थना कराने के लिए बुलाते थे, रोज़ एक ही राष्ट्रगान गाते-गाते बोरियत महसूस होने लगा था, फिर क्या एक दिन गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर की जय हे, जय हे, जय हे, जय, जय,...से प्रेरणा और प्रतिक्रिया एक साथ भीतर उपजी और मैंने भी राष्ट्रगान के तर्ज पर 'नवराष्ट्रगान' लिखा तथा सुबह की प्रार्थना के बाद 'नवराष्ट्रगान' सुनाया। गुरुजन को लगा कि मैंने किसी का चुराया है लेकिन उसमें वर्तनी त्रुटि ज़बरदस्त थी, जिसको ठीक किया गया। सातवीं-आठवीं कक्षा तक मेरी रचनाओं का संशोधन गुरुवर मुमताज अहमद सर व गुरुवर विकास चौहान सर करते थे, विकास सर ख़ासकर अंग्रेज़ी की कविताओं का संशोधन करते थे। उन दिनों विकास सर भोजपुरी में गीत लिखा करते थे। मैं भी लिखा करता था। हम एक दूसरे को अपना गीत सुनाया करते थे। विकास सर के यहाँ मैं चार बजे भोर में ही चला जाता था। किसी-किसी दिन सर और मैम एक साथ बिस्तर पर सोये रहते थे और मैं पहुँच जाता था।...खैर, उन दिनों गाँव के प्रेमी अपनी प्रेमिकाओं के लिए मुझसे शेरों-शायरी लिखवाते थे बदल में मुझे पैसे देते थे। एक पंक्ति किसी और की होती थी तो एक पंक्ति अपनी। इसी तरह लिखता रहा एक दिन एक प्रेमी की प्रेमिका मेरे गाँव की निकली और पोल खुल गया कि प्रेमपत्र की हैंडराइटिंग मेरी है। भीतरी शीतयुद्ध छिड़ गया। परिणामतः मुझे प्रेमियों का प्रेमपत्र लिखना छोड़ना पड़ा।  


9 वीं कक्षा तक आते-आते मुझे 'कस्बे का कवि' ,'युवा किसान कवि', 'पहाड़ी कवि' व 'गँवई गंध के कवि' आदि के रूप में प्रसिद्धि मिली। कॉलेज में कुछ गुरुजन कवि-शिक्षक थे, उन्होंने मेरी कविताओं को सुना और संशोधन किया। लेकिन जब मैं बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में पहुँचा तो मेरी रचनात्मकता को नयी दिशा व दृष्टि मिली क्योंकि वहाँ देश के प्रतिष्ठित साहित्यकारों से मुझे पढ़ने का मौका मिला। वहीं मुझे 2019 में काव्यगुरु श्रीप्रकाश शुक्ल मिले। उन्होंने सर्वप्रथम मेरे कवि को उम्मीद की उड़ान दी। उनके मार्गदर्शन में मेरी रचनाधर्मिता को गति मिली। मुझे उनकी कृपा से कई शब्द-शिक्षक, ज्योति-पुरुष व चेतना के चिराग़ मिले। मेरे प्रिय पथप्रदर्शकों की सूची में लीलाधर जगूड़ी, अशोक वाजपेयी, अरुण कमल, ज्ञानेंद्रपति, राजेश जोशी, मदन कश्यप, लीलाधर मंडलोई, सदानंद शाही, श्रीप्रकाश शुक्ल, जितेंद्र श्रीवास्तव, स्वप्निल श्रीवास्तव, सुभाष राय, वशिष्ठ अनूप, अरुण होता, कमलेश वर्मा, आशीष त्रिपाठी, राकेशरेणु, शंभुनाथ, ममता कालिया, श्रद्धा सिंह, शैलेंद्र शांत, गिरीश पंकज, पलाश विश्वास व वाचस्पति से लेकर विन्ध्याचल यादव आदि हैं।


*3.हमने साधारण रूप से देखा है कि किसी भी कवि या कवित्री को एक ही उपनाम या उपाधि प्राप्त होते हैं लेकिन आपको अनेक बार उपनाम और उपाधियां प्राप्त हुई ।इसको संक्षेप में हम जानना चाहते हैं।*


A. उपनाम या उपाधि से कोई व्यक्ति बड़ा नहीं होता है। न ही ये व्यक्तित्व को बड़ा बनाते हैं। इसलिए हमें इनके चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए कि फला कवि या लेखक को इतने सारे उपनामों या उपाधियों से जाना जाता है। एक समय था कि कवियों को उपाधियाँ दी जाती थीं। एक समय था कि लोग छद्मनाम से लिखा करते थे। मेरे उपनाम व उपाधि, दरअसल मेरे मित्रों और मार्गदर्कशों के प्रेम व स्नेह के प्रतीक हैं। मैं साहित्यिक दुनिया में उम्र व अनुभव में सबसे छोटा हूँ। सो, मुझे सभी सहृदय समीक्षकों से वात्सल्यपूर्ण आशीर्वाद प्राप्त होते रहते हैं। मेरे प्रिय पथप्रदर्शक मेरे अभिभावक की भूमिका में होते हैं और आत्मीय अभिभावक वैसे भी अपने वत्स को किसी ख़ास विशेषण या दिलचस्प नाम से संबोधित करते हैं। मेरे भी आत्मीय जन मुझे तमाम उपनाम व उपाधियों संबोधित करते हैं। जिनमें कुछ वायरल उपनामों और उपाधियों से आप परिचित हैं। खैर, उपाधि मेरे लिए एक जिम्मेदारी है। मैं मरते दम तक इन उपाधियों पर ख़रा उतरने की कोशिश करूँगा।


*4.आपने इतनी कम उम्र में अपने लेखन को इतना प्रभावशाली कैसे बनाया। क्या आपको यह प्रतिभा विरासत में मिली है?*


A.नहीं, मेरी प्रतिभा विरासत नहीं, विपन्नता की देन है। अर्थात् मुझे लेखन की प्रतिभा विरासत में नहीं मिली है। मेरी माँ अँगूठाछाप हैं और मेरे पिता दो-तीन क्लास तक ही पढ़े हैं, यानी वे भी अँगूठाछाप हैं। मेरी प्रतिभा की जननी मेरी गरीबी है। वह महान है कि नहीं? यह भविष्य तय करेगा। हमें अपने महान होने के बोध से बचना चाहिए, जो अपने महान होने के बोध से बचकर लिखते हैं वे लंबे समय तक अच्छा लिखते हैं। ऐसा पुरखों का कहना है। उपन्यास सम्राट प्रेमचंद भी यह मानते हैं कि गरीबी महान प्रतिभा को जन्म देती है। लेकिन मैं 'महान' शब्द को भविष्य पर छोड़ता हूँ। मेरी प्रतिभा भी दीनता की कोख से जन्मी है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि 'प्रतिभा' जन्मजात चीज़ है। आचार्य भामह ने भी कहा कि काव्यप्रतिभा कुछ ख़ास लोगों में ही होती है। इस संदर्भ में मुझे आचार्य कुंतक याद आ रहे हैं, वे कहते हैं-"प्राक्तनाद्यतन-संस्कार-परिपाक-प्रौढ़ा प्रतिभा काचिदेव कविशक्तिः।" (अर्थात् पूर्व एवं वर्तमान जन्म के संस्कारों से मिली कवित्व शक्ति प्रतिभा है।) प्रतिभा को प्रमुख काव्य हेतु माना जाता है। लेकिन आचार्य दण्डी ने अभ्यास पर ज़ोर दिया है। क्योंकि अब अभ्यास कर के कोई भी कवि बन सकता है। अभ्यास कर कविता लिखी जा सकती है और लिखी जा रही हैं। लेकिन अभ्यास उस कवि को परिष्कृत करता है, जिसमें कवित्व की प्रतिभा होती है, जो जन्मजात कवि हैं। लेकिन यह भी ध्यान रखने वाली बात है कि सभी को संतुष्ट करने की इच्छा कारयित्री प्रतिभा की मृत्यु का कारण होती है!


अब रही बात इतनी कम उम्र में अपने लेखन को प्रभावशाली बनाने की बात, तो वह है सही पथप्रदर्शक के चुनाव से संभव हुआ है। मैं बार-बार अलग-अलग साहित्यिक मंचों से यह बात कहता रहा हूँ कि मित्र व मार्गदर्कश का चयन सोच समझ कर करें। हमें स्वामी विवेकानंद की परंपरा का शिष्य बनना चाहिए, यानी हमें भी अपने गुरु की परीक्षा लेकर ही उन्हें गुरु बनाना चाहिए। चयन के मामले में मैं अपने को सौभाग्यशाली मानता हूँ कि मैंने सही पथप्रदर्शकों का चयन किया है। मेरे सभी पथप्रदर्शक साहित्य के सूर्य हैं, मनुष्यता के मार्गदर्कश हैं। जिनकी रोशनी में मेरी सृजन-यात्रा जारी है।

 

*5.आप हिंदी एवं भोजपुरी दोनों भाषाओं में लिखते हैं इसकी कोई खास वजह।भोजपुरी भाषा की तरफ कैसे रुझान हुआ।*


A. वैसे तो विद्यालय से विश्वविद्यालय के सफ़र को ध्यान रख कर देखा जाए, तो अब तक मैंने संस्कृत, पालि, अपभ्रंश, हिंदी, भोजपुरी, फ्रेंच व अंग्रेजी भाषाओं का अध्ययन किया है। तमिल भाषा सीखने की प्रबल इच्छा है। रही बात भोजपुरी में लिखने की, तो भोजपुरी में अभी तक मैंने कोई ढंग की साहित्यिक रचना नहीं की। आर्थिक संकट के दंश से बचने के लिए 2015 से 2018 के बीच भोजपुरी सिनेमा के गीत मैंने लिखे हैं जो कि भर्ती हैं, लेकिन अब मुझे कुछ साहित्यिक चीज़ें लिखनी हैं। क्योंकि यह मेरी पितृभाषा है, मेरी मातृभाषा अवधी और भोजपुरी के संयोग से निर्मित भाषा है, क्योंकि मेरे पिता भोजपुरी हैं और मेरी माता अवधी।


*6.युवा कवि के रुप में आपकी बहुत प्रतिष्ठा है। इसे आपने कैसे अर्जित किया। हमारे नए रचनाकारों को लेखन विषय संबंधी क्या जानकारी देना चाहेंगे।*


A. आपके इस सवाल का उत्तर चौथे सवाल के उत्तर में निहित है। खैर, रही बात नए रचनाकारों को लेखन विषय संबंधी जानकारी देने की, तो नये रचनाकारों को एक बात हमेशा ध्यान रखनी चाहिए कि उनमें धीरता और गंभीरता ये दो चीजें होनी चाहिए। उन्हें अपने लेखन से किसी को ख़ुश करने से बचना चाहिए। साथ में उन्हें परंपरा का भी ज्ञान होना चाहिए, इसके लिए उन्हें अपने समकालीन साहित्यकारों के साथ-साथ पुरखों को ख़ूब पढ़ना चाहिए। उन्हें पुरखों से प्रेरणा और प्रतिक्रिया एक साथ ग्रहण करनी चाहिए। उन्हें अपनी भाषा और संवेदना पर काम करना चाहिए तथा किसी बड़े रचनाकार के शिल्प को कॉपी करने से बचना चाहिए। यह तभी संभव हो पाएगा, जब आपका कोई साहित्यिक गुरु होगा, इसलिए एक अच्छे साहित्यिक गुरु की तलाश करें, जो आपके करीब भी हों, नहीं कि हमें लिखनी है कविता और हम कथाकार को गुरु बना लें।


*7.आपका लालन-पालन किन परिस्थितियों में हुआ। क्या लेखन कला और अन्य प्रतिभाओं का जन्म पारिवारिक परिवेश से हुआ।*


A. आपके इस प्रश्न का उत्तर पहले व दूसरे प्रश्न के उत्तर में दिया जा चुका है। लेकिन एक बात जो नहीं बतानी चाहिए, लेकिन मैं बता दे रहा हूँ, वह यह कि मेरा लालन-पालन विपरीत परिस्थितियों में हुआ है। शैशवावस्था में जब मैं दुधमुंहा शिशु था, तो मेरे पिता मेरी माँ को पाँच बरस के लिए वनवास भेज दिये थे। मामला दहेज-वहेज का था। माँ मुझे लेकर अपने मायके चली गयीं। उनके पिता व भाई पहाड़ों में काम करते थे, बोल्डर काटते थे व पटिया निकालते थे इसलिए मुझे बचपन में मेरे हाथों कलम की जगह छेनी-हौथी, चकधारा, टाँकी, गुट्ठा व घन आदि मिला। मेरी माँ बीमार थीं, उन्हें दूध नहीं होता था, तो माँ की सहेलियों ने मुझे अपना स्तनपान कराया। पड़ोसियों ने अपनी बकरी का दूध दिया। यहाँ सब कुछ बताना संभव नहीं है। मेरे बचपन के बारे में अधिक जानने के लिए माँ की सहेलियों, भौजाइयों और मेरे गाँव की औरतों से संपर्क करें।


*8.आपके लेखन से ऐसा लगता है कि आपके हाथों में करनी और हथौड़ी हमेशा रहती है जिससे आप समाज के हर तबके की बुराइयों को तराशते नजर आते हैं कोई खास वजह।*


A. माँ खेतों में काम करती थीं, तो विरासत में मेरे हाथों में कुदाल, फावड़ा व खुरपी मिलीं। माँ अभी भी खेतों में काम करती हैं। शहर में मैं लेबर बना, तो मेरे हाथों में करनी व बसूली मिलीं। हथौड़ी तो नाना-मामा से मिली है। इन्हीं हथियारों से अपने समय को तराशने की कला सीख रहा हूँ। मेरी आत्मा के संगतराश मेरे शब्द हैं।


 *9. आपका मन अंतस की पीड़ा को बहुत बारीकी के साथ पढ़ना जानता है शायद यही वजह है कि आपके काव्य में लाचारी पर बहुत अधिक लिखा गया है। हमारे पाठक जाना चाहते हैं कि लेखक बनने से पहले किन भावों  का अत्यधिक महत्व है।*


A. पीड़ा प्रबोधन की पंक्तियाँ जनविमुखव्यवस्था का प्रतिपक्ष होती हैं, जो मानवीय संवेदना के संघनित होने पर प्रोक्ति में तब्दील हो जाती हैं। ऐसी पंक्तियां अंतर्मन की आँख से पढ़ी जाती हैं। मेरे यहाँ काव्य में लाचारी, मनुष्य की लालसा की तरह है और उदासी उम्मीद की तरह, क्योंकि लाचारी, उदासी व पके हुए दुःख में जीवन की लय होती है, उदात्त जिजीविषा होती है। खैर, लेखक बनने से पहले उसकी भीतरी या सच्ची प्रवृत्ति-निवृत्ति को जागृत रखने वाले भावों का अत्यधिक महत्व है। लेखक को सामाजिक मन को उद्दीप्त करने वाले भावों को पहचानने की कला में सिद्धहस्त होना चाहिए। उसे उन भावों को शब्दबद्ध करना चाहिए, जो समाज को मनुष्यता की उच्च भूमि पर लेकर जाएं। इन्हीं भावों को लोकमंगल की भावना के अंतर्गत रखा जाता है। जब ऐसे उदात्त भाव से पाठक गुज़रते हैं, तो वे अपने संकुचित व कुंठित मानसिकता से मुक्त होते हैं और जो रचना अपने पाठक को कुंठित मानसिकता से मुक्त करती हुई उसे आनंद की अनुभूति कराती है, वह अच्छी रचना होती है।


*10. किन बातों से प्रेरित होकर अपने दिव्यंग सेवा संस्थान खोलने का निर्णय लिया।*


A. दरअसल 'दिव्यंग सेवा संस्थान' एक आभासी मंच है। जहाँ दृष्टिबाधित विद्यार्थियों के लिए निःशुल्क में अध्ययन सामग्री उपलब्ध करायी जाती है। मेरे पिता रीढ़ से दिव्यांग हैं प्रेरणा तो उन्हीं से मिली है क्योंकि वे फक्कड़ स्वभाव के हैं बिलकुल कबीर की तरह लेकिन मैं उन्हें अमीर खुसरो कहता हूँ क्योंकि वे पहेलियाँ पूछते रहते हैं। बहरहाल, मेरे कई सहपाठी साथी नेत्रहीन हैं, उनके कहने पर ही 'दिव्यंग सेवा संस्थान' को खोला गया है। इस मंच पर कवि, लेखक, शिक्षक, प्रोफेसर, पत्रकार, वकील व समाजसेवी आदि सभी का वक्तव्य उपलब्ध कराया जाता है, जो हमारे पठन-पाठन से संबंधित होते हैं।


नाम : गोलेन्द्र पटेल

संपर्क :

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

पिन कोड : 221009

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com

Friday, 21 July 2023

मणिपुर की घटना पर केंद्रित कविताएँ (manipur kee ghatana par kendrit kavitaen)

 मणिपुर की घटना पर केंद्रित कविताएँ : गोलेन्द्र पटेल


1).


पके हुए दुःख

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घटनाएँ उत्प्रेरक होती हैं,

जो दुःख की रचनात्मक क्रिया की गति को बढ़ाती हैं


पके हुए दुःख 

कला में उस क्षण उतरते हैं

जब कलाकार भीतर से द्रवित होता है!


अमानवीय घटनाएँ

संवेदनशील मनुष्य को झकझोरती हैं

ताकि वह अत्याचार पर मौनव्रत सरकार से सवाल करे

वह ऐसी घटनाओं पर आवाज़ उठाये

जो नफ़रत की राजनीति को जन्म देती हैं

जो मनुष्यता को शर्मसार करती हैं


यह देश के लिए दुखद है 

कि राज्य में ऐसी घटनाएँ राजधानी की देन हैं

दुर्नीति-निर्मित हैं


आए दिन ऐसी घटनाओं की ख़बरें देखकर 

मन बहुत दुखी है

जन! दुखी मन कल का राज्य कैसे रचे?

राष्ट्र कब रोता है? 

क्यों रोता है? 


देखो न! सुनो न! 

निर्वस्त्र नारियों का चीखना, चिल्लाना, चीत्कारना, चोकरना, चिंघाड़ना, सिसकना

गरियाना, गुर्राना, बर्राना और दर्द की चुप्पी

इस रचना में

राष्ट्र की रूह रो रही है न?


उनका दुःख हमारा दुःख है

हम उनके हैं

वे हमारे

हम उनके दुःख को भाषा के हवाले कर रहे हैं

क्योंकि भाषा से केंद्र की सत्ता तय होती है!

(रचना : 21 जुलाई 2023)

तसवीर साभार : गूगल

2).


लहूलुहान आत्मा

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वीभत्स वीडियो है

पता नहीं कब से रौंदी जा रही हैं वे?


इस धरती पर

वे जो अपने पेट में तुम्हारा पुरुषार्थ ढोती हैं

और तुम्हारे हिस्से की धूप अपनी पीठ पर

और कंधे पर आसमान


उन्हें कभी लकड़ी समझ कर चूल्हे में जलाया जाता है

तो कभी खेत समझ कर जोता जाता है

तो कभी पत्थर में तब्दील कर दिया जाता है

तो कभी उनकी देह युद्धभूमि होती है

तो कभी वे जुए में हारी जाती हैं


अभी वे ख़ुद की ख़ुदी खोज कर रही हैं

अभी वहाँ उनकी हत्या हुई है

अभी यहाँ उनकी आत्मा लहूलुहान है

अभी वे यौन हिंसा और दरिंदगी के दुर्दांत खेल के ख़िलाफ़

अँधेरे में केवल जलती मशाल हैं


वे अन्याय के प्रति असहिष्णु हैं

उनकी रचनात्मक पीड़ा में उग्रता की गंध है

उनकी आँखों में आग है

उनकी भाषा में टीस है

उनके गीतों की टेक है—

“मर गया देश, 

अरे जीवित रह गए तुम!”

(रचना :  22 जुलाई 2023)

तसवीर साभार : गूगल

[नोट: अंतिम दो पंक्तियाँ मुक्तिबोध की हैं।]


3).


दो हरी पीड़ित पत्तियाँ 

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चारों ओर शोर है


सन्नाटा बढ़ता जा रहा है

उफनी हुई नदी की स्याह लहरें

बातें कर रही हैं

आगामी सुनामी पर

जिन पर बोलना ज़रूरी है

वे सब चीज़ें अनुपस्थित हैं


एक नदी जब दीन होकर 

रोती है

तो कुछ गाँव, कुछ शहर डूबते हैं

लेकिन एक पत्ती की आँखों से 

जब ख़ून के आँसू टपकते हैं

तो पूरा देश डूबता है

और सारे पहाड़ धरती में धँस जाते हैं


जितने भी द्वीप डूबे हैं, देश डूबे हैं

वे सब के सब पत्तियों के आँसू में डूबे हैं

पर, वे दो हरी पत्तियों के आँसू में डूबे नहीं

क्योंकि अब कागज़ की नाव आँसू में गलती नहीं है

भँवर में डूबती नहीं है

वे उसी नाव में सवार हैं

उन्हें तकलीफ़ के तूफ़ान से भय नहीं है


जनतंत्र के जंगल में 

दोनों पीड़ित पत्तियाँ 

न्याय की गुहार किससे लगायें

पेड़ से?

प्रभु से?


दोनों पत्तियों का दुःख देश का दुःख है

क्योंकि देश पत्ती है!

(रचना :  21 जुलाई 2023)

तसवीर साभार : गूगल

4).


समाज इतना संवेदनहीन क्यों होता जा रहा है?

_________________________________________


नदियाँ तब उफनती हैं

जब उनके परिसर को लोग हथिया लेते हैं

इतना ही कागज़ पर लिखा था मैंने

कि मछलियों की आँखों से टपकीं 

आँसू की बूँदों ने पानी में डूबे हुए सूरज से पूछा,


यह जघन्य, घिनौना, निंदनीय व भयानक अपराध किसकी देन है?


पुरुषों का इतिहास गवाह है

कि स्त्रियाँ धर्म व जाति के नाम पर सबसे अधिक छली गयी हैं 


पहाड़ के पत्थर पर शर्म से लहूलुहान स्त्रियों के सजीव चित्र हैं

सुबह-शाम चेतना की चिरई पीड़ा का प्रगीत गाती है


आज फिर कुछ कलियों को रौंदा गया है

पेड़ की पत्तियों से हवा की तरह

भाषा आती है

जंगल की ख़बर से सनी सुगंध संसद में यह सवाल करती है

कि पुरुषप्रधान राजनीति स्त्रियों की इज़्ज़त कब की है!


अमानवीय षडयंत्रकारी घटनाओं के इतिहास में

एकैक अक्षरों के नीचे अनेक स्त्रियों की चीखें दबी हैं

अहिल्या के बलात्कार से लेकर द्रौपदी के चीरहरण तक 

और नंगेली के स्तन कटने से लेकर निर्भया कांड तक

इस तरह की तमाम घटनाओं की स्मृति मात्र से भीतर ज्वाला सी धधक उठी है

मन कर रहा है कि फूँक दूँ उन्हें

जिनकी राजनीति स्त्री की देह से होकर गुज़रती है

जिनकी विजययात्रा उसकी योनि में होती है


जिस देश को माता कहा जाता है—भारत माता

जहाँ स्त्रियाँ पूजी जाती हैं

वहाँ आरक्षण की आग में जल रही हैं जातियाँ

उजड़ रही हैं बस्तियाँ


मणिपुर में क्रिस्चन कुकी दो औरतों को नंगा घुमाना

राष्ट्रनायक की आत्मा का मरना है!


घुमाने वालों की ज़मीन मर चुकी है

उनकी माँएँ अपनी कोख को कोस रही हैं

उनकी रूह काँप गयी है

यह सोच कर कि कल कहीं उनके साथ ऐसा न हो जाए!


आख़िर समाज इतना संवेदनहीन क्यों होता जा रहा है?

इस घटना पर जनबुद्धजीवी चुप क्यों हैं?

क्या वे सत्ता के सिंहासन को हिलाने में असमर्थ हैं?


वे अंधे तो नहीं हैं, वे बहरे तो नहीं हैं

फिर वे बोल क्यों नहीं रहे हैं

उनके पक्ष में जिनको उनके साथ की ज़रूरत है


जो कमज़ोर के पक्ष में बोल रहे हैं 

उनकी बातें दबा दी जा रही हैं

मगर मज़ेदार बात यह है कि

सवाल करने वाले साहित्य को सत्ता जितनी अधिक दबाती है

वह उतनी अधिक दूरी तय करता है।

(रचना :  21 जुलाई 2023)


5).


मृत मणिपुर

________________________________


यह भाषा में स्याह संवेदना रचने का समय है


मणिपुर की मणि गायब है

वह अँधेरे में है

उसकी इन्सानियत मर गयी है

उसका पुर जल रहा है


बर्बर, बलात्कारी व हैवान पुरुषों की भीड़ द्वारा

वहाँ दो स्त्रियों का नग्न परेड कराया गया

लेकिन सब चुप रहे 


जो स्वयं को कलंकित कर रहे हैं

वे पूरी पुरुष-जाति को बदनाम कर रहे हैं


मृत मुल्क में न्याय की उम्मीद किससे है?

सरकार से?

जनता से?

(रचना :  21 जुलाई 2023)


6).


न्यायसंगत प्रतिरोध शक्ति

_________________________________________


तुम मसल सकते हो सभी कलियों को

रौंद सकते हो सभी फूलों को

मगर तुम सुगंध को आने से नहीं रोक सकते


यह उन मधुमक्खियों की निजी क्रांति है 

जिन्हें बोलने मात्र के लिए सज़ा होती रही है

जिनके पंख कुतरे जा रहे हैं


रंग के चुप रहने का मतलब यह तो नहीं 

कि तितलियों के भीतर कोई हलचल नहीं है! 


ये मधुमक्खियाँ और तितलियाँ 

रस के हक लिए

आभूषण नहीं, औज़ार लैस होना चाहती हैं


ये तुम्हारी जीभ पर अपने डंक से लिखना चाहती हैं

न्यायसंगत प्रतिरोध शक्ति!

(रचना :  21 जुलाई 2023)


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Friday, 14 July 2023

स्त्री, औरत और महिला में क्या अंतर है? : गोलेन्द्र पटेल / stree, aurat aur mahila mein kya antar hai? : Golendra Patel

 स्त्री, औरत और महिला में क्या अंतर है?




हमारी भाषा में सच तो यही है कि

दो शब्द एक दूसरे के पर्यायवाची नहीं होते


स्त्री, औरत और महिला में क्या अंतर है?


नारीवादी दृष्टि में ‘स्त्री’ वह संज्ञा है

जो अपनी अस्मिता का अन्वेषण कर रही है

और वह अन्य दोनों संज्ञाओं को अपने में समेटी हुई है


‘महिला’ वह संवैधानिक शब्द है

जो सभ्य, शिष्ट और शिक्षित की ओर संकेत करता है

लेकिन ‘औरत’ वह साहित्यिक शब्द है

जो अनपढ़, असहाय और गँवई की ओर संकेत करता है

हालांकि वाचक और बोधक के बीच

ये संज्ञाएँ

अपने अलग-अलग अर्थ का बोध कराती हैं


ये संज्ञाएँ अपने अस्तित्व के लिए

संघर्षरत हैं


पुरुषों के व्याकरण में नारी का विलोम नर है

स्त्री का विलोम पुरुष है

और औरत का विलोम मर्द है 

पर, प्रश्न यह है, महिला का विलोम क्या है?

जबकि चारों शारीरिक संरचना में एक हैं!


(©गोलेन्द्र पटेल / 15-07-2023)

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बेरोज़गारों का देश

बेरोज़गारों का देश बेरोज़गारी की पीड़ा ने नहीं बल्कि पाँव की प्रसन्नता ने फेफड़े से कहा  कि जब जनरल डब्बे में पैखाने के पास  हमें खड़ा होने ...