कुर्मी समाज : एकता की राह—श्रेष्ठता-बोध से समता-बोध तक
कुर्मी समाज की सामाजिक और क्षेत्रीय पहचान अत्यंत विस्तृत और विविध है, जिसमें अलग-अलग प्रदेशों, भाषाई परंपराओं, ऐतिहासिक परिस्थितियों तथा स्थानीय सामाजिक संरचनाओं के कारण अनेक जाति-सूचक नाम, उपनाम, शाखाएँ, उपाधियाँ और क्षेत्रीय संबोधन प्रचलित दिखाई देते हैं। कुर्मी, कुनबी/कुणबी/कणबी, कुलमी/कुल्मी, कुम्भी, कूर्म, कूर्मवंशी, कुडुम्बी, कुडुम्बर, कुडुम्बि, कुटुम्बी, कुंबी, कुम्बि, कुरु, कुरुम, कुरुम्बा, कुरुम्बि, कुरुमनायक, कुलुम्बि, कापू, कम्मा, वेलमा, रेड्डी, नायडू, वोक्कालिगा/वक्कलिगार, गौड़ा/गौर, खंडायत, कुडुमी, पटेल, पाटीदार, लेवा पाटीदार, कड़वा, पाटील, पवार, मराठा/मराठे, कुनबी-मराठा, भोंसले, गायकवाड़, शिंदे/सिंधिया, होल्कर, चव्हाण, मोरे, सावंत, देशमुख, देसाई, वानखेड़े, वाघेला, बघेल, चौहान, चंदेल, चंद्रवंशी, चंद्राकर/चंद्रराकर, चंद्रौल, चंद्रनाहू, राठौर, परिहार, बैस/बैसवार, जैसवार/जयसवार, बंसवार, बारवार, समसवार, सैंथवार, सिंगरौर/सिंगरौल, गंगवार, गंगापारी, सचान, कटियार, कन्नौजिया/कनौजिया, अवधिया, पटनवार, पतरिहा/पतरिया, पुरबिया, चनऊ/चनउ, कोचैसा/कुचैसा, घमैला/घमालिए, मनवा/मनवार, महतो/मेहतो, धाकड़, उमराव, वर्मा, चौधरी, राय, राव, रावत, राजवाड़े, मल्ल, मुराव, लोधा-कुर्मी, महालोधी, धानुक, गंगौता, कोलीय, शाक्य, मौर्य, कश्यप, सिंह, निरंजन, राघव, यदुवंशी, जादौन/जादौनवंशी, लिच्छबी, गहोई, महापात्रा, महेसरी, उत्तम, गबेल/गवेल, खुरासिया/खुरसिया, खाटी, कौसिक, आर्य, कुरुसेन्य, केराती, ब्रजवासी, कच्छवार, कछार, कछवाहा, ठाकुरिया, मल्लीथारू, जिचकर, जोशवर, कांत, कोप्पिकर, मेने, मोहंती, तिहाड़, सनाड्य, सनोडिया, अथरिया, सरेठी, पटोले, पांनड़ी, कुसमरिया, मलैया, चोल, उसरेठा/उसरठा, खरबिंद, अजुदया, कटवार, रारह, चांदपुरिया, अकरेठिया, औधार, बाछर/बाछिल, बेहमनिया, बर्धिहा/बर्दिया, बरगेयान, बाथवा, भंडारी, भुकारसी, भुर/भर, भरती, बिरतिया, बोट/बोटा/भोट, घोई, गोइट, गोंडाल, हार्दिया/हार्दिहा, हरदबारी/हरदवरिया, जरूहार, जामैया, झुरा, कारजवा, खापरिबंध, लकारिया, लोहट, मेवार, पत्थारिहा, सहजन, सकरवार, समाना, संसोयल, संकट/संकटा, संखवार, संधाउवा, सिम्मल, सिरकीबंद, तरमला, तोगड़िया और घुड़चढ़े आदि नाम विभिन्न सूचियों तथा क्षेत्रीय संदर्भों में मिलते हैं। इनमें से कुछ नाम व्यापक जातीय पहचान को व्यक्त करते हैं, कुछ क्षेत्रीय या भाषाई पहचान हैं, कुछ पारिवारिक उपनाम अथवा सामाजिक उपाधियाँ हैं और कुछ ऐसे नाम भी हैं जो अन्य समुदायों में समान रूप से प्रचलित हैं; इसलिए केवल उपनाम के आधार पर किसी व्यक्ति की जातीय पहचान निर्धारित करना उचित नहीं है तथा उपर्युक्त सभी नामों को स्वतः कुर्मी समाज की स्वतंत्र और सर्वमान्य उपजातियाँ मानना भी ऐतिहासिक दृष्टि से सावधानी की अपेक्षा रखता है। इसी प्रकार ‘कुर्मी (खत्तिय) वंश की 1488 उपशाखाओं’ का उल्लेख ‘Castes and Tribes’ जैसे स्रोतों के संदर्भ में किया जाता है, किंतु इस संख्या की प्रामाणिकता के लिए मूल ग्रंथ, संस्करण, खंड और संबंधित पृष्ठ का सत्यापन आवश्यक है। वस्तुतः इतनी व्यापक नाम-विविधता कुर्मी समाज के लंबे सामाजिक इतिहास, क्षेत्रीय विस्तार और आंतरिक विभाजन की जटिलता को सामने रखती है; अनेक स्थानों पर अलग-अलग उपजातीय और क्षेत्रीय समूह अपनी विशिष्ट पहचान को प्राथमिकता देते हैं तथा कभी-कभी उनमें पारस्परिक श्रेष्ठता-बोध भी दिखाई देता है, जिसके कारण व्यापक सामुदायिक एकता और संगठन का निर्माण कठिन होता है। समस्या केवल उपनामों की अधिकता नहीं, बल्कि उन नामों को लेकर विकसित होने वाला ऊँच-नीच, श्रेष्ठता और अलगाव का भाव है; जब कोई उपसमूह स्वयं को दूसरे से अधिक श्रेष्ठ समझता है, तब साझा सामाजिक पहचान कमजोर होती है और समाज संगठनात्मक रूप से बिखरा हुआ दिखाई देता है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि उपनामों और उपशाखाओं को विभाजन का आधार बनाने के बजाय उन्हें ऐतिहासिक एवं क्षेत्रीय विविधता के रूप में स्वीकार किया जाए तथा समानता, शिक्षा, सामाजिक न्याय, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और पारस्परिक सम्मान को व्यापक एकता का आधार बनाया जाए। कुर्मी समाज अपने गौरवशाली पुरखों और महापुरुषों—राष्ट्रसंत तुकाराम महाराज, छत्रपति वीर शिवाजी महाराज, राजर्षि छत्रपति शाहूजी महाराज, भारतरत्न लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल और महामना रामस्वरूप वर्मा—के जीवन, विचारों, संघर्षों और सामाजिक सरोकारों को केवल जातीय गौरव के प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि समानता, स्वाभिमान, शिक्षा, सामाजिक न्याय और मानव-मुक्ति के प्रेरक स्रोत के रूप में आत्मसात करे। यदि समाज इन साझा मूल्यों को अपनी सामूहिक चेतना का आधार बनाता है, तो उपजातीय श्रेष्ठता-बोध से ऊपर उठकर समता-बोध विकसित किया जा सकता है और बिखरी हुई सामाजिक पहचान को संगठित, शिक्षित तथा प्रगतिशील सामुदायिक शक्ति में बदला जा सकता है। इस दृष्टि से कुर्मी समाज की वास्तविक एकता उपनामों की समानता में नहीं, बल्कि समान सम्मान, समान अवसर, साझा हित, सामाजिक न्याय और समतामूलक चेतना में निहित है।
कुर्मी समाज की एकता केवल जातीय पहचान के आधार पर नहीं, बल्कि साझा इतिहास, समान हित, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर अधिक टिकाऊ बन सकती है। इसके लिए कुछ ठोस कदम महत्वपूर्ण हैं:
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साझी पहचान विकसित हो — अलग-अलग उपजातियों, शाखाओं और क्षेत्रीय उपनामों को लेकर श्रेष्ठता-बोध छोड़कर “हम सब एक व्यापक कुर्मी समाज का हिस्सा हैं” की भावना विकसित हो।
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उपनाम और उपशाखा को श्रेष्ठता का आधार न बनाया जाए — पटेल, कुनबी, सचान, कटियार, गंगवार, सैंथवार आदि नामों को लेकर आपसी ऊँच-नीच के बजाय उनके ऐतिहासिक और क्षेत्रीय संदर्भों को समझा जाए।
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महापुरुषों को साझा विरासत माना जाए — राष्ट्रसंत तुकाराम, छत्रपति वीर शिवाजी महाराज, राजर्षि शाहूजी महाराज, सरदार वल्लभभाई पटेल, महामना रामस्वरूप वर्मा, सोनेलाल पटेल और नीतीश कुमार जैसे व्यक्तित्वों को किसी एक उपसमूह की संपत्ति न मानकर उनके सामाजिक विचारों, संघर्षों और योगदान को व्यापक रूप से पढ़ा जाए।
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संगठन जाति-विरोधी नहीं, भेदभाव-विरोधी हो — समाज के भीतर उपजातीय भेदभाव, ऊँच-नीच और आपसी श्रेष्ठता की मानसिकता को समाप्त करना एकता की पहली शर्त हो।
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शिक्षा को केंद्रीय आधार बनाया जाए — विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति, पुस्तकालय, प्रतियोगी परीक्षा मार्गदर्शन, डिजिटल शिक्षा और शोध-संस्थानों का निर्माण किया जाए।
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आर्थिक सहयोग बढ़े — किसान, मजदूर, उद्यमी, कर्मचारी और पेशेवर एक-दूसरे के आर्थिक हितों में सहयोग करें। सहकारी संस्थाएँ और सामुदायिक विकास मंच इस दिशा में उपयोगी हो सकते हैं।
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महिलाओं और युवाओं की बराबर भागीदारी हो — केवल पारंपरिक नेतृत्व के भरोसे संगठन मजबूत नहीं होता। महिलाओं और युवाओं को निर्णय लेने की वास्तविक भूमिका मिलनी चाहिए।
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वैचारिक मतभेद को दुश्मनी न बनाया जाए — अलग-अलग राजनीतिक विचार रखने वाले लोग भी सामाजिक और शैक्षिक मुद्दों पर साथ काम कर सकते हैं। संगठन किसी एक राजनीतिक दल का उपकरण बनने के बजाय समुदाय के दीर्घकालिक हितों पर केंद्रित रहे।
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साझे कार्यक्रम बनाए जाएँ — अलग-अलग क्षेत्रों के संगठनों को जोड़कर शिक्षा सम्मेलन, किसान सम्मेलन, साहित्यिक आयोजन, युवा संवाद और सामाजिक सुधार अभियान चलाए जाएँ।
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सोशल मीडिया पर संयम और संवाद — उपजातीय विवाद, अपमानजनक भाषा और श्रेष्ठता के दावों को बढ़ाने के बजाय इतिहास, शिक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सामाजिक एकता से संबंधित प्रमाणित सामग्री साझा की जाए।
सबसे महत्वपूर्ण बात: कुर्मी समाज की एकता का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि सभी लोग एक जैसा सोचें; बल्कि इसका अर्थ यह होना चाहिए कि मतभेदों के बावजूद समान सम्मान, समान अधिकार और साझा हितों के लिए साथ खड़े होने की क्षमता विकसित हो।
एक प्रभावी सूत्र हो सकता है:
“उपनाम अलग हो सकते हैं, क्षेत्र अलग हो सकते हैं, विचार अलग हो सकते हैं; लेकिन सम्मान, शिक्षा, समानता और सामाजिक न्याय के लिए हमारा साझा मंच एक हो।”
लेखक: गोलेन्द्र पटेल (अध्ययनरत, हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/किसान कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
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