Thursday, 20 March 2025

समय का संताप || विश्व कविता दिवस की हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनायें! || 21 March

 समय का संताप 

हालात की लात
परिस्थिति की मार
बेरोज़गारी की चोट
पीड़ा का प्रहार
शिक्षकों की ईर्ष्या
सहपाठियों का व्यंग्य
समय का संताप सह कर बड़ा हुआ है
मेरा कवि
इतना बड़ा हुआ है
कि अब संत कवियों को छोड़कर
अपने से किसी को बड़ा कवि मानता ही नहीं है
न वाल्मीकि को, न वेदव्यास को
न गुरु को, न गार्जियन को
न आचार्य को, न अभिभावक को
न मित्र को, न मार्गदर्शक को
न प्रेमिका को, न पथप्रदर्शिका को
किसी को भी नहीं!

मेरे कवि का दुःख ही उसका दीपक है
मेरा कवि मेरा प्रतिरूप है
उसी की कविता से
इस कोहरे में मेरे पास धूप है!

(®गोलेन्द्र पटेल / 21-03-2025)

21 मार्च : विश्व कविता दिवस की हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनायें! 

संपर्क: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/जनपक्षधर्मी कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

पिन कोड : 221009

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com

Wednesday, 19 March 2025

Golendrism (गोलेन्द्रवाद) का Flag (ध्वज)

Golendrism (गोलेन्द्रवाद) का Flag (ध्वज) :
(नवीनतम) 
जीवन में रंगों का महत्व बहुत गहरा और बहुआयामी है। रंग न केवल हमारे आसपास की दुनिया को सुंदर बनाते हैं, बल्कि हमारे भावनात्मक, मानसिक, धार्मिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, दार्शनिक, वैज्ञानिक, साहित्यिक जीवन पर भी प्रभाव डालते हैं। रंग जीवन को अर्थ, सुंदरता और भावनात्मक गहराई देते हैं। वे सिर्फ दृश्य अनुभव नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व का एक अभिन्न अंग हैं। मानवीय रंग सभी प्राणियों के प्रति दया, सहानुभूति और समानुभूति दिखाना के लिए प्रेरित करते हैं। ये रंग मानवीय मूल्यों जैसे पीड़ा, प्रसन्नता, ज्ञान, प्रेम, स्वाभिमान, समता, समानता, स्वतंत्रता, न्याय और एकता के प्रतीक हैं। गोलेन्द्रवाद में जीवन के विभिन्न वैश्विक रंग शामिल हैं। “गोलेन्द्रवाद मानवीय जीवन जीने की पद्धति है, गोलेन्द्रवादी दर्शन जाति, धर्म, भाषा एवं भूगोल निरपेक्ष है, यह पूरी तरह मानवतावाद पर केंद्रित वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। गोलेन्द्रवाद समय-सापेक्ष वैज्ञानिक दर्शन है, मानवतावादी दृष्टिकोण है।” गोलेन्द्रवादी ध्वज में 7 खाने और 9 रंग हैं, वैसे ‘ग्लोबल’ में सभी रंग और सभी देशों का ध्वज है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, यहाँ संविधान ही सर्वोपरि है। तिरंगे के नीचे ही सब ध्वज हैं। तिरंगा ही सभी ध्वजों का मार्गदर्शक/पथप्रदर्शक/गुरु/शिक्षक है। बहरहाल, गोलेन्द्रवादी ध्वज में ग्लोबल में सभी देशों के ध्वज, भारत का मानचित्र, भारत का राष्ट्रीय ध्वज (तिरंगा), अशोक चक्र, अशोक स्तंभ शीर्ष, आसमान में जहाज, संविधान पढ़ती हुई स्त्री, विज्ञान के दृश्य, किसान, मज़दूर उपस्थित हैं। इसमें तिरंगा और संविधान शिक्षक की भूमिका में हैं।आप एलोरा की गुफा-12 के 7 खाने (पट्टियों) को #सप्तऋषि/सप्तबुद्ध/सप्ततथागत/ ज्ञान के सप्तसमुंदर से जोड़ कर समझें। सप्तबुद्ध हैं क्रमशः विपश्यी, सिखी, विश्वभू, क्रकुच्छंद, कनकमुनि, कश्यप और शाक्यमुनि (तथागत गौतम बुद्ध) हैं।

बुद्ध की धरती पर ये 9 रंग 9 ग्रहों को दर्शाता है, बौद्ध धर्म में संख्या 9 को ज्ञान, करुणा और पूर्णता का प्रतीक माना जाता है, साथ ही यह आत्मज्ञान और उच्च चेतना का प्रतिनिधित्व करता है। बौद्ध धर्म में बुद्ध के 9 गुणों का भी उल्लेख है। बुद्ध के नौ गुण हैं: भगव (धन्य), योग्य, पूर्ण आत्मज्ञानी, ज्ञान और आचरण से युक्त, सौभाग्यशाली, लोकों का ज्ञाता, शिक्षा योग्य मनुष्यों को अद्वितीय रूप से प्रशिक्षित करने वाला, देवताओं और मनुष्यों का गुरु, प्रबुद्ध और धन्य। 

अशोक का सिंह स्तंभ, भारत के सारनाथ में, लगभग  250 ईसा पूर्व, मौर्य सम्राट अशोक द्वारा बनवाए गए एक स्तंभ का शीर्ष या शीर्ष है। चार एशियाई शेर एक गोलाकार एबेकस पर पीठ से पीठ सटाकर खड़े हैं । प्रत्येक शेर के नीचे नैतिक कानून का बौद्ध चक्र (धम्मचक्र) उभरा हुआ दिखाई देता है। चक्रों के बीच चार जानवर दिखाई देते हैं- घोड़ा, बैल, हाथी और शेर। एबेकस के नीचे वास्तुकला की घंटी , एक शैलीगत उल्टा कमल है।

गोलेन्द्रवादी ध्वज में इन रंगों का मतलब और महत्व निम्नलिखित हैं।

1).

•लाल रंग — यह रंग शक्ति, स्फूर्ति, प्रेम, ज्ञान, सदाचार, गरिमा और साहस का प्रतीक है। अर्थात् यशसिद्धी, शहाणपण, सदाचार, संपन्नता व प्रतिष्ठा यांचे प्रतीक आहे। लाल रंग — शौर्य और साहस का प्रतिक है! लाल रंग: ऊर्जा, जोश, प्यार, शक्ति, खतरा, गुस्सा का प्रतीक है! आधुनिकता को दर्शाता है।

2).

•नीला रंग — यह रंग शांति, दयालु स्वभाव, एवं प्रेम का प्रतीक है। अर्थात् प्रेमळवृत्ती, दयाळूपणा, शांती आणि वैश्विक करुणा यांचे प्रतीक आहे। नीला रंग — शांति एवं प्रेम का प्रतीक है और गहरे नीले रंग का अशोक चक्र गतिशीलता का प्रतिनिधित्व करता है। नीला रंग: शांति, विश्वास, सच्चाई, शीतलता का प्रतीक है।

3).

•पीला रंग — यह रंग, पवित्रता, तेज और उत्साह का प्रतीक है। यह रंग मध्यम मार्ग को प्रदर्शित करता है। बुद्ध के आत्मज्ञान से मिलने वाला प्रकाश का प्रतिनिधित्व करता है। अर्थात् मध्यम मार्ग, टोकाची भूमिका त्याज्य, निश्चल शांतता यांचे प्रतीक आहे। पिला रंग — तेज और उत्साह का प्रतीक है! पीला रंग: खुशी, आशावाद, ऊर्जा, चेतावनी का प्रतीक है! 

 4).

•गुलाबी रंग — यह सौभाग्य, प्यार और खुशी का प्रतीक है। साथ ही, यह स्त्री शक्ति, स्त्रीत्व, कोमलता और करुणा का भी प्रतीक है। गुलाबी रंग को माता महामाया का प्रतीक माना जाता है। गुलाबी रंग को स्वास्थ्य और तंदुरुस्ती का प्रतीक माना जाता है। गुलाबी रंग को शांति, करुणा, आशावाद और रचनात्मकता से जोड़ा गया है। गुलाबी रंग को उत्सव, उल्लास, कोमलता और स्वभाव की सरलता का प्रतीक माना जाता है।

5).

•नारंगी रंग — यह रंग ज्ञान, ऊर्जा, उत्साह और रचनात्मकता का प्रतीक है। यह रंग प्रज्ञा और प्रेम के प्रकाश का प्रतीक है। नारंगी रंग स्त्रियों के लिए हिंसारहित बेहतर भविष्य का प्रतीक है। नारंगी रंग: खुशी, उत्साह, रचनात्मकता, गर्मजोशी का प्रतीक है।

6).

•काला रंग — यह रंग अन्याय के ख़िलाफ़ न्याय की आवाज़ का प्रतीक है। काला रंग प्रकाश की अनुपस्थिति है, अंधकार का प्रतीक है। काला रंग दुख और शोक के निवारण का प्रतीक है। काला रंग: शक्ति, रहस्य, दुख, शोक का प्रतीक है।

7).

•सफेद रंग — यह रंग शुद्धता, सादगी, स्पष्टता, त्याग, पवित्रता, शुद्धता और निर्मलता का प्रतीक है, यह वास्तविक जीवन को प्रदर्शित करता है। सफेद रंग शांति, सत्य, अहिंसा, त्याग और पवित्रता का प्रतीक है। अर्थात् पांढरा रंग — धम्म शुद्धता, सर्वत्र स्वातंत्र्यभिमुखताव निर्मलता यांचे प्रतीक आहे। यह रंग सत्य, शांति और पवित्रता का प्रतीक है। सफ़ेद रंग - शांति, सत्य, पवित्रता, और सबका साथ-सबका प्रयास का प्रतीक है। सफेद रंग: शुद्धता, शांति, शुरुआत, निर्दोषिता का प्रतीक है।

8).

•हरा रंग — यह आशावाद, नई शुरुआत, स्वास्थ्य, ताज़गी, उर्वरता, वृद्धि, हरियाली, संपन्नता और शुभता का प्रतीक है। यह रंग उर्वरता, वृद्धि और भूमि की पवित्रता को दर्शाता है। यह रंग भूमि की उर्वरता, वृद्धि और शुभता को दर्शाता है और हरा रंग मानवता का प्रतीक है। हरा रंग: प्रकृति, समृद्धि, स्वास्थ्य, विकास, खुशी का प्रतीक है।

9).

• केसरिया रंग — केसरी रंग — त्याग, बलिदान, ज्ञान, शुद्धता, सेवा, शौर्य, और वीरता और करुणा का प्रतीक है, यह रंग बुद्ध के ज्ञान की शक्ति और धम्म के समृद्ध अर्थ और उसकी चमक को प्रदर्शित करता है। अर्थात् कषाय रंग - भगवान बुद्ध की विभिन्न शरीर धातुओं को धम्म रश्मियों के प्रतीक समझे जाते हैं। केसरी रंग — त्याग और करुणा का प्रतीक है ! यह केसरिया रंग देश की ताकत, साहस और संस्कृति को दर्शाता है, यह रंग शक्ति और आत्मविश्वास को दर्शाता है। केसरिया रंग - देश की शक्ति, साहस, त्याग और बलिदान का प्रतीक है।


बुद्ध के 9 गुण :-

भगव (धन्य):

बुद्ध को धन्य माना जाता है क्योंकि वे सभी बुराइयों और दोषों से मुक्त हैं, और उनकी पूजा मनुष्य और देवता करते हैं. 


योग्य:

बुद्ध को योग्य माना जाता है क्योंकि वे सभी प्राणियों के लिए कल्याणकारी हैं और उन्हें सही मार्ग दिखाते हैं. 


पूर्ण आत्मज्ञानी:

बुद्ध को पूर्ण आत्मज्ञानी माना जाता है, क्योंकि उन्होंने स्वयं ज्ञान प्राप्त किया है और वे दूसरों को भी ज्ञान प्राप्त करने में मदद करते हैं. 


ज्ञान और आचरण से युक्त:

बुद्ध ज्ञान और आचरण से युक्त हैं, जिसका अर्थ है कि वे ज्ञान को केवल सिद्धांत रूप में नहीं जानते हैं, बल्कि वे इसे अपने जीवन में भी लागू करते हैं. 


सौभाग्यशाली:

बुद्ध को सौभाग्यशाली माना जाता है क्योंकि वे सभी प्राणियों के लिए एक प्रेरणा हैं और वे हमेशा दूसरों की मदद करने के लिए तैयार रहते हैं. 


लोकों का ज्ञाता:

बुद्ध लोकों का ज्ञाता हैं, जिसका अर्थ है कि वे सभी प्राणियों की प्रकृति और उनके दुखों के कारणों को जानते हैं. 


शिक्षा योग्य मनुष्यों को अद्वितीय रूप से प्रशिक्षित करने वाला:

बुद्ध शिक्षा योग्य मनुष्यों को अद्वितीय रूप से प्रशिक्षित करने वाले हैं, जिसका अर्थ है कि वे सभी मनुष्यों को ज्ञान प्राप्त करने में मदद करते हैं, चाहे वे कोई भी हों. 


देवताओं और मनुष्यों का गुरु:

बुद्ध देवताओं और मनुष्यों के गुरु हैं, जिसका अर्थ है कि वे सभी प्राणियों के लिए एक मार्गदर्शक हैं. 


प्रबुद्ध और धन्य:

बुद्ध प्रबुद्ध और धन्य हैं, जिसका अर्थ है कि उन्होंने ज्ञान प्राप्त कर लिया है और वे अब दुखों से मुक्त हैं. 


नोट: अभी इस गोलेन्द्रवादी ध्वज पर संशोधन का काम जारी है।

Monday, 17 March 2025

योगी और अखिलेश बहन जी से बहुत छोटे नेता हैं : गोलेन्द्र पटेल

 

योगी और अखिलेश बहन जी से बहुत छोटे नेता हैं

यूपी में
बीजेपी ने ‘इलाहाबाद’ का नाम बदलकर प्रयागराज किया
‘फैजाबाद’ का नाम बदलकर अयोध्या
‘मुग़लसराय’ स्टेशन का नाम बदलकर पं. दीनदयाल उपाध्याय स्टेशन
गोरखपुर में ‘उर्दू बाजार’ को हिंदी बाजार,
‘हुमायूंपुर’ को हनुमान नगर,
‘मीना बाजार’ को माया बाजार
और ‘अलीनगर’ को आर्यनगर कर दिया
उन्होंने कई ‘उर्दू-फारसी’ वाले नाम बदलें
क्यों बदलें? क्या योगी मुसलमान विरोधी नहीं हैं?

लेकिन सपा ने ‘छत्रपति शाहूजी महाराज नगर’ का नाम बदलकर गौरीगंज किया
‘पंचशील नगर’ का नाम बदलकर हापुड़,
‘प्रबुद्ध नगर’ का नाम शामली
‘महामाया नगर’ का नाम हाथरस,
‘रमाबाई नगर’ का नाम कानपुर देहात,
‘ज्योतिबा फुले नगर’ का नाम अमरोहा,
‘भीमनगर’ का नाम बदलकर बहजोई
और ‘कांशीराम नगर’ का नाम कासगंज,
क्या सचमुच अखिलेश PDA के नेता हैं?

यदि ‘छत्रपति शाहूजी महाराज’ यादव कुल में जन्मे होते
तो वे नहीं बदलते
‘बुद्ध’ यादव कुल में जन्मे होते
तो वे नहीं बदलते
‘माता महामाया’ यादव कुल में जन्मी होतीं
तो वे नहीं बदलते
‘माता रमाबाई’ यादव कुल में जन्मी होतीं
तो वे नहीं बदलते
‘ज्योतिबा फुले’ यादव कुल में जन्मे होते
तो वे नहीं बदलते
‘अंबेडकर’ यादव कुल में जन्मे होते
तो वे नहीं बदलते
‘कांशीराम’ यादव कुल में जन्मे होते
तो वे नहीं बदलते
क्योंकि वे समाजवादियों से अधिक सामंतवादियों के नेता हैं
उन्हें ‘संविधान’ लहराने की वजह से नहीं जीताया गया है
बल्कि फिलहाल यूपी में OBC और अल्पसंख्यक के पास कोई विकल्प नहीं है
इसलिए जीताया गया
जिस दिन कोई विकल्प सामने आया,
उस दिन इनका पत्ता साफ़!

योगी और अखिलेश बहन जी की तुलना में बहुत छोटे नेता हैं
कोई मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बनने से बड़ा नेता नहीं होता है
बड़ा नेता तो वह होता है, जिसके पास बड़ा दिल हो।

© गोलेन्द्र पटेल

(नोट: इन तीनों नेताओं का आपसे में अच्छे संबंध हैं, इसलिए इनके समर्थकों को एक-दूसरे के समर्थकों से आपस में लड़ना नहीं चाहिए, क्योंकि पार्टी या विचारधारा से बड़ी चीज़ है मनुष्यता। गुरु संत कबीरदास कहते हैं कि सत्य के लिए किसी से नहीं डरना चाहिए। यही बात ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ में  आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने भी लिखी है:
“सत्य के लिए किसी से नहीं डरना, गुरु से भी नहीं, लोक से भी नहीं, वेद से भी नहीं।”)


संपर्क: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/जनपक्षधर्मी कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

पिन कोड : 221009

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com


Tuesday, 14 January 2025

'असहमति' सहमति से अधिक रचनात्मक है (सर्वश्रेष्ठ संपादक कौन हैं?)

 

“हमारे समय का संपादक होना, भाषा में ही नहीं, बल्कि भूमि पर भी मनुष्य होना है।

अच्छा संपादक होने के लिए किसी लेख, किताब या सामग्री को सुधारने और बेहतर बनाने में सक्षम होना ही काफ़ी नहीं है, बल्कि एक श्रेष्ठ मनुष्य होना ज़रूरी है, क्योंकि एक अच्छा संपादक न केवल व्याकरण और शैली पर ध्यान देता है, बल्कि लेख की भावनात्मक गहराई, संवेदनात्मक संदर्भ और उद्देश्य को भी समझता है। वह लेखन की गुणवत्ता को सुधारने में कुशल होने के साथ-साथ सृजनात्मकता, सूझबूझ और सटीकता के साथ काम करता है। वह रचनाकार के विचारों को स्पष्ट और प्रभावी तरीके से पाठकों तक पहुँचाता है। वह रचनाकारों के साथ सहयोग करके उनके विचारों को सही दिशा में मार्गदर्शन करता है।

श्रेष्ठ मनुष्य ही त्रिकालदर्शी होते हैं। त्रिकालदर्शी संपादक केवल वर्तमान के संदर्भ में नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा और विकास को समझते हुए अपने संपादन निर्णयों को लेते हैं। वे न केवल सामग्री की गुणवत्ता और प्रस्तुति पर ध्यान देते हैं, बल्कि यह भी सोचते हैं कि इस सामग्री का प्रभाव भविष्य में क्या हो सकता है और इसे किस तरह से व्यापक और दीर्घकालिक दृष्टिकोण से बेहतर किया जा सकता है, क्योंकि वे मौजूदा समय के साथ-साथ भविष्य की संभावनाओं को भी समझते हैं। एक बेहतरीन संपादक रचनाकार को बेहतर दिशा और संरचना देने के लिए सुझाव देता है।

निःसंदेह हिंदी में सम्यक दृष्टि वाले सहृदय संपादक बहुत कम हैं! 

हमें वे संपादक कत्तई पसंद नहीं हैं, जो उन युवा स्वरों को प्रकाशित नहीं करते हैं, जो हाशिये की आवाज़ हैं, जिनके घरों में कोई कवि, लेखक, संपादक, प्रकाशक, प्रोफेसर, शिक्षक नहीं हैं। जिनके लिए कोई यह कहने वाला नहीं है कि यह 'युवा स्वर' हमारी जाति, धर्म, घर-परिवार, ज़िला-जवार से है, अपना है, इसमें अपार संभावनाएं हैं!

जो भी संपादक जाति-धर्म-भाषा निरपेक्ष हैं, परिवारवाद और मित्रवाद से अधिक मानवतावाद के करीब हैं, वे हमें पसंद हैं, क्योंकि वे हाशिये की रचनाधर्मिता को प्रकाशित करते हैं, निखारते हैं।

हमारे जैसों को जो छापते हैं, वही हमारी नज़रों में सर्वश्रेष्ठ संपादक हैं, हमारा प्रिय संपादक हैं, हमारे हीरो हैं। शेष संपादकों के लिए निराला ने 'सरोज स्मृति' में 'निरानंद' विशेषण का प्रयोग किया है, लेकिन हम उनके लिए 'निकृष्ट' विशेषण प्रयोग करते हैं।

जो मेरे प्रिय कथाकार हैं, लेकिन अप्रिय संपादक भी हैं, हमने उनके बारे में सुना है कि वे सबको नहीं छापते हैं, वे जिसे छाप देते हैं, वे स्थापित हो जाते हैं, वे इस भ्रम में हैं! 

ख़ैर, उन्होंने न हमें छापा है, न ही हमारे जैसे किसी और को, शायद इसलिए हम स्थापित नहीं हुए, लेकिन वे यह मानते हैं कि हम अपने समय के 'सजग स्वर' हैं! 

'असहमति' सहमति से अधिक रचनात्मक है, पर परास्नातक के दौरान जब हमने फ़ेसबुक पर उनकी संपादकीय के संदर्भ में टिप्पणी की थी, तो हमारे शुभचिंतक शिक्षकों ने पोस्ट डिलीट करवा दी थी। बहरहाल, जिस दिन वे हमारी पृष्ठभूमि के किसी 'युवा स्वर' को छापेंगे, उस दिन वे हमारे प्रिय संपादक हो जायेंगे। धन्यवाद!”―गोलेन्द्र पटेल

Monday, 23 December 2024

जीवन राग के कवि हैं विनय बौद्ध

 जीवन का होना

उत्सव होना है

मतलब नया राग बोना है।


बोना है धरती में पीड़ा को

जो वीणा की धुन सुनाती इड़ा को

खुल जाता ज्ञान की इंद्रियाँ

सराबोर हो जाता पंचतत्व

जीवन के इस उत्सव में।

-विनय बौद्ध 

विनय कुमार विश्वकर्मा/विश्वा/बौद्ध जी युवा पीढ़ी के महत्त्वपूर्ण कवि, लेखक, शिक्षक व शोधार्थी हैं। उनकी कविताओं में सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक संवेदनाओं का गहरा प्रभाव देखा जाता है। विनय बौद्ध की संवेदना को समझने के लिए "जीवनोत्सव", "कवि हृदय", "महाभिनिष्क्रमण", "लोकतंत्र के आड़ में", "सबसे बड़ा दुःख", "न्याय के देवता" आदि रचनाओं को देखा जा सकता है। वे अपनी रचनाओं में हमेशा उन लोगों के पक्ष में खड़े नज़र आते हैं, जो समाज में शोषित और उत्पीड़ित हैं। उनकी रचनाओं में एक प्रकार का विद्रोह और संघर्ष का स्वर दिखाई देता है, जिसमें वे समाज के असमानताओं और अन्याय के खिलाफ बोलते हैं। वे कभी-कभी प्रकृति से अपने जीवन के संघर्षों और विचारों को जोड़ते हैं, जिससे उनका साहित्य और भी गहन हो जाता है। प्रकृति से जुड़ने से आत्मा की शांति और संवेदनाओं में गहराई आती है। इस संदर्भ में उनकी आगामी पंक्तियों को पढ़ें, "पहाड़ों में ही क्यों सारी माई भगवती हैं/कहीं ऐसा तो नहीं 

बुद्ध के ताप से/पहाड़ स्त्री हो गई/और पूजी जाने लगी।/

जब नारी जन्म जन्मांतर से पूजनीय हैं/तो तुलसी बाबा भी नारी से लाग कैसा..."

विरोध और विद्रोह की धरती पर विनय बौद्ध जी के धूमिल के करीब हैं, तो करुणा और दर्शन की भावभूमि और मनोभूमि पर बुद्ध और कबीर के करीब हैं। उनमें विद्रोही चेतना है, जो भोजपुरी जनपदी जीवन की असंतुलन और गरीबी के खिलाफ है। उनके रचनाओं में गहरी कड़वाहट और आक्रोश दिखता है, जो वर्तमान समय के भोजपुरी जनपदी जीवन के विद्रूप पहलुओं को सामने लाता है।

विनय बौद्ध जी की कविताओं में भारतीय ग्रामीण जीवन की कठिनाइयाँ और संघर्ष प्रमुखता से दिखाई देती हैं। वे उन किसानों और मजदूरों के जीवन की त्रासदी को प्रस्तुत करते हैं, जो सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े होते हैं। उनकी रचनाओं में साम्राज्यवाद, पूंजीवाद और सामाजिक असमानता के खिलाफ विरोध देखा जा सकता है। बहरहाल, विनय बौद्ध जी की संवेदना में समाज के प्रति एक प्रकार की क्रांति और बदलाव की इच्छा है। 

उनकी संवेदना एक उग्र और सत्य के प्रति निष्ठा से भरी हुई है। मुझे उनकी रचनाधर्मिता से काफ़ी उम्मीद है, क्योंकि उनकी रचनाओं में आत्मा की उन्नति, आत्मसाक्षात्कार और जीवन के गहरे उद्देश्यों के प्रति गहरी संवेदना पाई जाती है।

"मेरा 'पटेल से 'पेरियार' और उनका 'विश्वकर्मा' से 'बौद्ध" होने का एक दिलचस्प किस्सा है, जिस पर कभी चर्चा परिचर्चा होगी। ख़ैर, विनय जी मेरे अग्रज हैं, मैं उन्हें अपना गार्जियन मानता हूँ, लेकिन वे मुझे अपना गुरु मानते हैं। शायद इसलिए कि वे उम्र नहीं, अनुभव को महत्व देते हैं। ख़ैर, मैं ख़ुद अभी सीखने की प्रक्रिया से गुज़र रहा हूँ और शायद यह सीखने और सिखाने की क्रिया-प्रक्रिया उम्रभर बनी रहेंगी! जब वे मुझे काव्यगुरु कहते हैं, तब अच्छा नहीं लगता है। मैं सच कहता हूँ कि मैंने उनको जितना सिखाया नहीं, उससे ज़्यादा सीखा है।... किसी को कुछ सिखाने के लिए बहुत कुछ सीखना पड़ता है!...

इस जीवन में मैंने सबसे अधिक फ़ोन पर विनय जी से ही बातचीत की है, शायद ही कभी एक घंटे से पहले फोन कटा हो! उनकी बातें मुझको जीवन, संघर्ष और आत्मोत्थान के विषय में गहरे विचार करने के लिए प्रेरित करती हैं। विनय जी यह मानते हैं कि भारतीय गाँवों में समाज के सबसे निचले स्तर के लोग, जैसे दलित, आदिवासी और छोटे किसान, अपनी मूलभूत जरूरतों से भी वंचित हैं। उनका कवि इस असमानता को समाप्त करने के लिए जागरूकता पैदा करने की कोशिश करता है। ऐसा उनकी अधिकांश रचनाओं का प्रथम पाठक होने तौर पर नहीं, बल्कि उनकी रचनाओं से गुज़र हुए मैं अक्सर महसूस करता हूँ। बहरहाल, आज उनका जन्मदिन है, उन्हें जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएं, हार्दिक बधाई एवं आत्मिक अभिवादन! वे इसी तरह अपनी कविताओं में गहरी संवेदनाओं और मानवता के प्रति एक उत्कट अनुराग व्यक्त करते रहें और उनकी रचनाएं समाज में परिवर्तन और जागरूकता की दिशा में प्रेरक बनें!...प्रस्तुत हैं उनकी कुछ ताज़ी पंक्तियाँ :-

यह जागने का समय है

अपनी थाती सँभालने का समय है

अपनी जागीर बचानी है

अपनी ज़मीन बनानी है

क्योंकि हर युग में हम शास्त्र - शस्त्र में निपुण हैं

चाहे अश्वघोष

चाहे वाल्मीकि

चाहे रावण

चाहे शंबूक

चाहे व्यास

चाहे एकलव्य

चाहे आंबेडकर

शास्त्र तो हमीं लिखे, पर

अफ़सोस हमारे ही लोग नहीं जगे

क्या आप हमें पढ़ते हैं ?

या सिर्फ़ पूजते हैं

या हमारे सिर्फ़ अनुयायी बन कर रहना चाहते हैं

ऐ मेरे वंशज मैं चाहता हूँ तुम मुझे पढ़ो 

मुझे जियो

जैसे जिया हूँ मैं

तब मेरे तुम्हारे जीवन की संगीत बनेगी

क्योंकि अब तुम्हारे जागने का समय है।


टिप्पणीकार: गोलेन्द्र पटेल (युवा कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

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(दृष्टिबाधित विद्यार्थियों के लिए अनमोल ख़ज़ाना)


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Wednesday, 11 December 2024

अंकिता अग्रहरी की कविताएँ

अंकिता अग्रहरी की कविताएँ

लेखन के शुरुआती दिनों में जो कवि/कवयित्री/लेखक/लेखिका रचनात्मक भूमि में अपने नए वैचारिकी बीज, नयी संवेदनात्मक पौध के साथ एक किसान की भाँति उपस्थित होते हैं/होती हैं, उन्हें नवोदित, नवांकुर, नए रचनाकार के रूप में संबोधित किया जाता है, क्योंकि उनकी रचनाएँ आमतौर पर अनुभवहीनता, अपरिपक्वता और विचारों की ताजगी का मिश्रण होती हैं। अर्थात् उनकी रचनाएँ ताजगी और नए विचारों की खोज की खेती हैं, उनके लेखन में समाज, संस्कृति और व्यक्तिगत अनुभवों का कच्चापन मौजूद होता है, लेकिन उनमें ताजी, तटकी अनुभूति की अभिव्यक्ति होती है, एक तरह की मिठास होती है। उनका लेखन अधिक परिपक्व नहीं होता है, लेकिन उसमें नयापन, ऊर्जा और बदलाव की संभावनाएँ होती हैं। नवोदित रचनाकार अक्सर नए विचार, दृष्टिकोण और शैलियों के साथ रचना लिखते हैं, भले ही उनकी भाषा में व्याकरणिक त्रुटियाँ हों, लेकिन उनके भाव में चुंबकीय शक्ति होती है। वे नये शैलियों, शब्दों और विचारों के प्रयोग से अपनी रचनाएँ प्रस्तुत करते हैं। वे अपने समय की सामाजिक, राजनीतिक और व्यक्तिगत चुनौतियों को रचना के माध्यम से व्यक्त करते हैं, जिससे उनकी रचनाओं में ताजगी, समकालिकता और नवीनता की छाप दिखाई देती है, क्योंकि वे अपने लेखन की दिशा, शैली या स्थानिक पहचान पर ज़्यादा ध्यान नहीं देते हैं, उनकी रचनाओं में सहानुभूति और स्वानुभूति का संगम है। मेरे प्रिय नवोदित साथियो! सृजनात्मक संसार में हर नये रचनाकार को पुराने रचनाकारों से टकराना होता है, उनसे बेहतर लिखने के लिये उनसे बेहतर सोचना पड़ता है, उनके लेखन के साथ-साथ अपने समय और समाज को ख़ूब पढ़ना पड़ता है! सच्चे भूतपूर्व रचनाकार नये रचनाकारों को ही जन्म नहीं देते, बल्कि सच्चे नये रचनाकार भूतपूर्व रचनाकारों को पुनर्जीवित भी करते हैं, क्योंकि साहित्य भाषा में पुनर्जीवन है!

पुरुषप्रधान समाज में स्त्री चेतना का विकास तब होता है, जब स्त्रियाँ अपने अनुभवों को साझा करती हैं, अपनी आवाज़ को प्रमुखता से दर्ज करती हैं और समाज की रूढ़िवादी धारणाओं को चुनौती देती हैं। मानवतावादी स्त्री की अभिव्यक्ति स्त्री चेतना, स्त्री अस्मिता, आत्म-संवर्धन, आत्म-प्रकाशन, आत्मनिर्भरता, सम्मान, स्वतंत्रता और समानता का अधिकार देती है। इस संदर्भ में नवोदित कवयित्रियों की रचनाएं दृष्टव्य हैं।

सुश्री अंकिता अग्रहरी जी काशी हिंदू विश्वविद्यालय में बी.ए. द्वितीय वर्ष की मेधावी छात्रा हैं। जो कविता की दुनिया में अभी प्रवेश कर रही हैं और अपने रचनात्मक यात्रा के प्रारंभिक चरण में हैं। उनकी कविताओं में एक विशेष रूप से कोमलता और शुरुआती अवस्था की छवि है, अंतर्मन की सादगी है। उनकी कविताओं में शक्तिशाली भावनाओं का सहज प्रवाह तो है ही; साथ में हृदय की मुक्ति की साधना का स्वर भी है, उनकी कविताओं में मानवीय संवेदना है, मूल्य है, जीवन के रंग हैं, ख़ुशबू है, सृजनात्मक स्मृतियों की तरंग है और उनकी कविताओं में समसामयिक दर्द, द्वंद्व, अँधेरा, उजाला, उम्मीद, टूटन, जिज्ञासा, जीजिविषा जैसे तत्व भी हैं। बहरहाल, मुझे उनकी रचनाधर्मिता से उम्मीद है, वे आने वाले दिनों में और बेहतर रचेंगी! 

मैं उनके रचनात्मक उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए उनकी कुछ कविताएँ सुधी पाठकों के प्रस्तुत कर रहा हूँ :-

(संपादकीय: गोलेन्द्र पटेल)


1).

मैं कहाँ हूँ? 

ख़ुद से कुछ कहने जा रही हूँ, 

एक ऐसी मुलाकात करने जा रही हूँ, 

मत पूछो कौन हैं वो, 

बस ख़ुद से ही मिलने जा रही हूँ! 


कहाँ हो तुम, 

ख़ुद से सवाल किये जा रही हूँ, 

अपने मन की गहराइयों को छूने जा रही हूँ, 

जो हार रहा था;

बस उसे ही उँचाईयों तक पहुँचाना चाह रही हूँ! 


मेरी ख़ुद से मुलाकात बहुत दिनों बाद होती हैं;

वैसे रोज तो बहुतों से मिलते हैं हम;

बस ख़ुद से मिलना भूल जाते हैं;

शायद ख़ुद को पहचानने से इंकार करते हैं, 

या फिर सच्चाईयों से दूर भागते हैं हम! 


मेरी ख़ुद से इतनी शिकायते हैं कि किताब लिख डालूँ;

मगर मेरी क़लम ही मुझे धोख़ा दे जाती है!

2).

मैं एक अमिट निशानी बन जाऊँ!

आज की फिजाओं का हाल ना पूछों, 

बदलते  लोगों का सवाल ना पूछों;

यहाँ हर रोज़ प्रेमियों की बदलती कहानी है, 

ख़ुदा की इनायत हैं हीर- राँझा की आज भी निशानी है

आज फ़िर वक़्त मेरी दहलीज पर आया है, 

खुदा की खैरियत मुझसे फ़िर वही वायदा पाया है! 


काश! कोई कहानी बन जाए, 

मैं जो लिखूँ मेरी निशानी बन जाए, 

मेरी राहों में कोई पत्थर न आए, 

जो मुझे कभी गले से लगाए! 


मैं अम्बर सी अनंत बन जाऊँ;

मैं ऊँचाईयों से भी ऊँची हो जाऊँ, 

चाँदनी की चमक सी;

सूरज की किरणों सी, 

मैं भी एक चमकती अमिट निशानी बन जाऊँ! 


मैं बादलों जैसी श्वेत बन जाऊँ, 

जिसमें एक भी दाग न हो इतनी विशेष बन जाऊँ;

मैं आसमां की तारा बन जाऊँ

अगर तारा न बन सकूँ

तो ज़मीं की धारा बन जाऊँ! 


न भूल पाए कोई, मैं ऐसी कहानी बन जाऊँ, 

काश! मैं एक अमिट निशानी बन जाऊँ! 

3).

मेरी सादगी

किसी को मेरी सादगी पसंद आई, 

तो किसी को वो चाँदनी पसंद आई, 

किसी को मेरी मुलाक़ाते पसंद आई, 

तो किसी को मुझसे बिछड़ना पसंद आया, 

किसी को मेरी बाते पसंद आई, 

तो किसी को मेरी यादें पसंद आई, 

किसी को मेरी फरमाइशें पसंद आई, 

तो किसी को मेरी गुज़ारिशें पसंद आई, 

किसी को मेरे अल्फ़ाज़ पसंद आये, 

तो किसी को मेरी खामोशी पसंद आई, 

किसी  को मेरी रूह पसंद आई, 

तो किसी को मेरे जिस्म पसंद आये, 

किन लब्ज़ों से बयां करू , 

लोगों को खुदसे ज्यादा मुझमें क्या पसंद आई! 

काश! मुझमे पसंद करने से ज्यादा, लोगों को खुद मे भी कुछ पसन्द आई होती! 


एक दिन आयेगा जब लोगों को, 

खुद से ज्यादा मुझमें सब कुछ पसन्द आयेगा! 


वो होता हैं न जुबां होते हुए भी बेजुबां होते हैं लोग, 

वही रहेंगे ये लोग! 

वो सारी फ़िज़ूल बाते होंगी लोगों से लिपटे हुए, 

मगर टकराने से ज्यादा उस जुबां को भी, 

मुझसे दूर रहना पसंद आयेगा! 


4).

लक्ष्य

तेरा लक्ष्य पूरा करने का समय कब आयेगा? 

तु खुद से पूछ कब अपने जीवन को साजयेगा, 

तु खुद से झूठा वादा कर कब तक रह पायेगा, 

जो पाने की विप्लव तेरे मन मे उमड़ी थी, 

उसको कितने दिनों तक टालता जायेगा! 


माना तेरा बचपन था कभी, 

खुद को न समझा पाया तू, 

निष्काम की चीजों से भी दिल लगाया तू;

कहकर यूँही टालता गया जवानी का दिन आयेगा अभी, 

जो इस दिन को सजायेगा कभी! 


जवानी के दिन दस्तक दिये जब, 

यौवन प्रेम और लालसाओ से खुद को न रोक पाया तु, 

सुदृढ़ व भावशून्य से, वहाँ न संभल पाया तु, 

थोड़ा मिट गया, यह संदेशा जब पाया तु, 

फिर भी शेष फिसलता गया तु, 

बुढ़ापे के लोभ से, 

एक ऐसी सोच से, 

इस विष भरी आबादी से, 

पृथक् स्थान मे खुद को ले जाना चाहा तू, 

कुछ दिन हीं तो बचे हैं जिस्त के, 

निशंक फिर डगमगाया तू! 


तु कब मिट गया यह कभी न समझ पाया तु;

अपनी पैगामी का निशाना न दे पाया तु, 

सोच खुद को कितना जर्फ बनाया तू! 

5).


मेरे प्रिये

मैं फूल की महकती खुशबू;

जिसके बिना तुम अधूरे प्रिये, 

मैं गुलशन की इत्र;

जो तुमको महकाये प्रिये, 

मैं फूलों की हार;

जिसे गले मे तुम सजाओ प्रिये, 

मैं हाथों की लकीरें;

जिसे तुम कभी न मिटा पाओ प्रिये, 

मैं वो गीत;

जिसे हर शाम तुम गुनगुनाओ प्रिये, 

मैं वो तश्वीर;

जिसे सीने से तुम लगाओ  प्रिये, 

मैं वो वक़्त;

जिसे जब चाहो बुला लो प्रिये, 

मैं वो आदत;

जिसे चाह के भी न दूर कर पाओ प्रिये

मैं ऐसी अमिट  निशानी;

जिसे तुम चाह के भी न भूल पाओ प्रिये! 

6).

दिल का शहर

मेरे दिल के शहर का तू फसाना हो गया, 

मेरे दिल  को बहलाने का तू बहाना हो गया;

मेरे गम को भुलाने मे जमाना हो गया, 

तू आया तो एक पल मे ये गम भी बेगाना हो गया;


मेरा गम भी तेरा अफसाना हो गया

क्योंकि ये भी तेरा आशिकाना हो गया;

मेरे दिल के अम्बर में मेरे ख्वाहिशों का चाँद था, 

मगर वो चाँद भी तेरा दीवाना हो गया! 


ता उम्र तकती रही मैं उस चाँद को

मगर तु आया तो वो चाँद भी मुझसे बेगाना हो गया

ख्वाहिशें नही थी तुझे पाने की, 

मगर मेरी ख्वाहिशें भी तेरे दीवाने हो गये! 


तु उस चाँद को  मेरी आँखों से कुछ

इस तरह ओझल किया, 

मानो उस चाँद से रिश्ता टूटे मेरा

जमाना हो गया, 


तेरे आने की ख़ुशी मनाऊ, 

या उस चाँद को भूलने का गम, 

मुझे यह तराशते जमाना हो गया! 


दिल को जब  से तेरे आने की आहट हुई,

न जाने तब से क्यूँ? 

दिल के शहर को तुझे पाने की चाहत हुई! 

                          ©अंकिता अग्रहरी

                     नवोदित कवयित्री- अंकिता अग्रहरी 

पिता - विनोद कुमार अग्रहरी

माता- श्रीमती प्रभावती देवी

पता- सिद्धार्थनगर

कक्षा- बी.ए.( द्वितीय वर्ष), काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।

संपादक : गोलेन्द्र पटेल (युवा कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

संपर्क सूत्र :-

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

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Sunday, 24 November 2024

जनविमुख व्यवस्था के प्रति गहरे असंतोष के कवि हैं संतोष पटेल

 जनविमुख व्यवस्था के प्रति गहरे असंतोष के कवि हैं संतोष पटेल 

साहित्य वह कला है, जो मानव अनुभव, भावनाओं, विचारों और जीवन के विभिन्न पहलुओं को कलात्मक और सृजनात्मक रूप से व्यक्त करने का एक माध्यम है, जो कि सही अर्थों में दर्पण की भूमिका में है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और भाषा उसकी सामाजिकता का मूल आधार है। मनुष्य भाषा का उपयोग करके समाज, संस्कृति और व्यक्तिगत अनुभवों को अभिव्यक्त करता है, क्योंकि भाषा केवल संवाद का साधन नहीं है, बल्कि संस्कृति, सभ्यता और पहचान का भी अभिन्न हिस्सा है। साहित्य के माध्यम से लेखक या कवि अपने विचारों को रचनात्मक रूप से प्रस्तुत करते हैं, जो पाठकों पर मानसिक, भावनात्मक और बौद्धिक प्रभाव डालते हैं। साहित्य न केवल मनोरंजन का साधन है, बल्कि समाज की समस्याओं, संघर्षों और मानवीय संवेदनाओं को उजागर करने का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम भी है। कवि शब्दों के माध्यम से गहन अनुभूतियों और संवेदनाओं को व्यक्त करते हैं। 

बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ० संतोष पटेल जी मूलतः हिंदी और भोजपुरी में लिखते हैं। उनका जन्म बिहार प्रदेश के पश्चिम चंपारण जिला मुख्यालय बेतिया के पुरानी गुदरी स्थित सुप्रसिद्ध भोजपुरी-हिंदी साहित्यकार डॉ० गोरख प्रसाद मस्ताना जी के घर हुआ। श्रीमती चिंता देवी उनकी माताजी हैं। वे हमारे समय के सजग कवि-लेखक हैं। उनकी चर्चित पुस्तकें हैं 'भोर भिनुसार', 'अदहन' (दोनों (भोजपुरी काव्य संग्रह मैथिली भोजपुरी अकादमी, दिल्ली सरकार द्वारा  प्रकाशित), 'शब्दों की छाँव में' (हिंदी काव्य संग्रह), 'जारी है लड़ाई' (हिंदी काव्य संकलन), 'नो क्लीन चिट' (हिंदी काव्य संग्रह) आदि।

उनकी रचनाएं हिंदी और भोजपुरी साहित्य में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं। उनकी रचनाओं में जीवन की सच्चाइयाँ, मानवीय संवेदनाएँ और सामाजिक मुद्दों को सरल और प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत किया गया है। वे अपनी रचनाओं में आम आदमी की भावनाओं और संघर्षों को अभिव्यक्त करते हैं। संतोष पटेल का लेखन समाज में बदलाव की आवश्यकता और मानवता की महत्ता पर जोर देता है। उनकी भाषा लोकोन्मुखी है। उनकी रचनाओं में ग्रामीण परिवेश, सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदनाओं का गहन चित्रण मिलता है। उनके लेखन में शोषण, संघर्ष और उम्मीद की झलक दिखाई देती है, क्योंकि उनमें श्रमिक समाज के संघर्षों के प्रति गहरा अनुराग है, कहीं-कहीं आग का राग भी है! इसलिए उनकी रचनाएं दिल-दिमाग को झकझोरती ही नहीं, बल्कि अंतर्मन को द्रवित भी करती है अर्थात् भावभूमि और मनोभूमि को मानवीय संवेदनाओं से सिंचती हैं। उनकी रचनाएं सहृदय को मैत्री, प्रेम, प्रज्ञा, शील, करुणा, दया की ओर उन्मुख करती हैं।

उनकी सृजनात्मक संसार को देखेंगे, तो आप पायेंगे कि उनकी रचनाओं में महामानव तथागत बुद्ध, गुरु संत रविदास, संत शिरोमणि कबीरदास, संत तुकाराम, भोजपुरी के कालिदास भिखारी ठाकुर, राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिबा फुले, राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले, ई०वी० रामा स्वामी पेरियार नायकर, संत गाडगे, छत्रपति शाहू जी महराज, विश्वरत्न बोधिसत्व बाबा साहेब डॉ० भीमराव अम्बेडकर, अमर शहीद जगदेव प्रसाद, महामना राम स्वरूप वर्मा और जननायक कर्पूरी ठाकुर से लेकर तमाम बहुजन शुभचिंतकों के स्वर हैं। उनका लेखन जनपक्षधर्मी है। उनकी रचनाओं में सामाजिक विद्रूपताओं से सीधे मुठभेड़ है। उनकी रचनाएं सामाजिक न्याय, पाखंड, रूढ़िवादिता, जातिवाद, अस्पृश्यता, छूआछूत, धर्म-लिंग आधारित भेदभाव का प्रतिपक्ष रचती हैं, सत्ता से सवाल करती हैं, क्योंकि सच्ची रचनाएं मनुष्यता की आवाज़ होती हैं। उनकी रचनाओं में जनविमुख व्यवस्था के प्रति गहरा असंतोष है।

राजनीति की बर्बरता का प्रतिपक्ष साहित्य में है। मानवता-केन्द्रित कविता ही कवि का प्राण हैं। संतोष जी के तेवर और तर्क इधर और नुकीले हुए हैं, उनकी बेधकता बढ़ी है। संतोष जी की रचनाएं संघनित स्मृतियां, गहन अनुभव व आतंरिक विचारों से ओतप्रोत हैं अर्थात् उनकी रचनाएं सामाजिक विसंगतियों, उसकी मूल्यहीनता और संवेदनहीनता के आन्तरिक परतों और विडंबनाओं को भेदती हैं, क्योंकि जीवन की विसंगति और विद्रूपताओं की संवेदनात्मक अभिव्यक्ति कर के वे मनुष्यता का पक्ष गढ़ने की कोशिश करते हैं। प्रत्येक रचना में उनका आलोचकीय विवेक सदैव सजग रहता है, वे सामाजिक मन को पहचानते हैं। इसलिए उनकी अधिकांश रचनाएं अनुकरणीय हैं, जो मानव धर्म को अपनाने की अपील करती हैं। वे सामाजिक सरोकार के शब्दावली में सच्चाई, संवेदनशीलता और स्वाभिमान के कवि हैं! उनके स्वर सहानुभूति के नहीं, बल्कि समानानुभूति के स्वर हैं, समवेत स्वर हैं, क्रांतिधर्मी आवाज़ हैं। वे भावावेग के बजाय संयम और सांद्रता के साथ अपने समय को रचते हैं। उनकी रचनाएं मन ही नहीं, बल्कि चेतना को प्रभावित करती हैं, क्योंकि उनकी रचनाओं में रचना की मानवीय शक्ति तो दिखती ही है, साथ में प्रतिरोध का उसका साहस भी प्रखरता से सामने आता है, जो कि उनकी रचनात्मकता की अपनी ख़ास विशेषता है।

इन दिनों डॉ० संतोष भोजपुरी जनजागरण अभियान और तथागत बुद्ध पर केंद्रित अपनी कविताओं को लेकर चर्चा में हैं। भोजपुरी भाषा को संवैधानिक सम्मान मिले इसके लिए वे सामूहिक प्रयासरत हैं। तथागत बुद्ध के विचारों ने मानवता को सत्य की खोज, आत्मज्ञान और अहिंसा का मार्ग दिखाया है। उनके सिद्धांत आज भी बौद्ध धर्म के अनुयायियों द्वारा अनुसरण किए जाते हैं और वे जीवन के महत्त्वपूर्ण प्रश्नों का उत्तर प्रदान करते हैं। उनके उपदेशों का उद्देश्य हर व्यक्ति को अपनी आत्मा की सच्चाई को जानने और जीवन को शांति, संतुलन और करुणा से जीने की प्रेरणा देना रहा। आप संतोष जी के शब्दों में बुद्ध-दर्शन को समझने के लिये उनकी कुछ कविताएं पढ़ने से पहले उनकी आगामी पंक्तियों पर गौर करें कि "मेरे शब्द तुम्हारे स्वर में/ लगते सभी दुलारे हैं/ जितनी हँसी अधर पर मेरे/रख लो सभी तुम्हारे है।"(संपादकीय: गोलेन्द्र पटेल)


1).

अपनाने के लिए हैं बुद्ध

विडंबना है कि बुद्ध 

हो गए हैं लोगों के लिए 

सजावट की वस्तु

लेकिन आश्वस्ति यह है कि

अब भी लोगों को वे ही भाते हैं।


आज भी वे उनके यहां भी 

दिख जाते हैं

जिन्होंने बुद्ध को अब तक जाना नहीं 

उनको अब तक पहचाना नहीं।


पर अच्छा है कि 

दुनिया में जो तबाही का मंजर है

हिंसा और हथियार का जो होड़ है

ताकतवरों का गठजोड़ है

उनकी जीत होने से रही।


जीत तो होगी एकदिन

शांति, सद्भाव और प्रेम की ही

दुनिया करेगी याद बुद्ध की बातें

मेत्ता, करुणा, मुदिता

समता, दान, सहनशीलता 

तब समझ में आयेगा कि 

बुद्ध केवल सजाने के लिए नहीं

अपनाने के लिए हैं।


2).

दीप का महत्व

दीप केवल महाप्रकाश ही नहीं 

है दीपक प्रतीक ज्ञान का

विवेक और त्याग का

साधना और ध्यान का

बुद्ध का दीप है अखंडदीप

जलते हैं एक दीप से हजारों दीप

तब बनता है वह रत्नदीप।


दीप मंदिर में जले तो अक्षय जोत

देवस्थान में अक्षय अग्नि

यहूदी में जले तो सवाय

ईसाई में जले में बड़ा दिन

मुस्लिम में शब-ए-बारात।


शास्त्रों ने कहा कि 

अंधकार से प्रकाश की ओर चलो

तीनों लोक के अंधेरे का नाश करता है

सूर्य का एक अंश दीप

तभी तो कबीर 

अपने घट में बारते हैं दीप

और रैदास ज्ञान का दीपक जलाते हैं

दीप का महत्व सर्वोत्तम कह

कोई दिवाली तो कोई दीपदान मानते हैं।


3).

करुणापूर्ण समर्पण 

दृष्टि में हो स्नेह व दया 

मुक्त होता घृणा व अंहकार

मुस्कुराता हो मुखमंडल

दूर रहता अनेक विकार

नम्रता से बोलो सबसे

प्रसन्न हो जाता है संसार

आदरभाव का  समर्पण 

स्वभाव में हो ऐसा दरकार 

सच्चे हृदय से बातें करना

व्यवहार हो सबको स्वीकार

आदरपूर्वक स्थान देकर

सम्मान हो सबका अधिकार

स्वागत कर रहे सबका अपने घर

ना हो किसी का तिरस्कार

तथागत ने यही कहा कि 

दूसरों को प्रसन्न रखना हो तो

संवेदना से भरा हो संस्कार

करुणापूर्ण समर्पण में ही

मानवता का होता अभिसार।


4).

वत्सा की प्रवज्या 

सुनते पढ़ते महाभारत का 

'आदि पर्व ' बड़े हुए कि 

चली गई थी देवयानी

अपने पति ययाति को छोड़ 

अपने पिता के घर

केवल इसलिए कि देवयानी को बर्दाश्त नहीं हुआ था

ययाति की बेवफ़ाई।


गार्गी, वाचनक्वी, घोषा

मैत्रेयी को उपनिषद काल में 

दिया गया संज्ञा ब्रह्मवादिनी का

लेकिन कात्यायनी को रखा गया

वंचित इस पद से।


ऐसी रही कई स्त्रियां वंचित 

थेरीगाथा में भी

दर्ज नहीं हो पाया उनका नाम

ऐसी ही थी एक 

स्थिरचित्तवाली स्वतंत्र विचारिका उच्छेदवादिनी भिक्षुणी

है भी पहचान उसकी थेरीगाथा में

"वत्सा" वैशाली की एक भिक्षुणी

गृहस्थ, साधारण सी गृहिणी।


भोजन पकाते हुए उससे

जल गया कड़ाही में साग

मन में भर आया वैराग्य 

क्यों अधिक देर तक

भोजन को मिली आग

तो यह बात समझ में आई

अंतर का पट खुल गया

अधिक समय समाधि और कर्म से

जल जाता है द्वेष - राग।


गृहस्थी से मन गया उचट 

पति से लेकर मुक्ति 

महागौतमी से पाई धर्म दीक्षा 

प्रवज्या ग्रहण कर पाई शिक्षा

तथागत को शीश नवाया

अपनी आंतरिक वैराग्य के लिए

बुद्ध से सराहना पाया।


5).

मन की शुद्धि

मन अगुआ है सभी प्रवृतियों का

मन नियंत्रक है समस्त आवृत्तियों का

मन की पूर्ण रिक्ति 

रोकती है अंतर्विरोधों की पुनरावृति।


मन की शुद्धता 

इसलिए भी आवश्यक है कि 

चित्त की समस्त अवस्थाएं 

उत्पन्न ही होते हैं मन में

मन प्रधान है चेतनाशीलता के लिए।


मन साफ है तो सुख

रहता है साथ छाया की तरह

यदि मन दूषित है तो दुःख 

ऐसे ही पीछा करता है 

जैसे बैल के पीछे गाड़ी का पहिया

धम्मपद में उल्लेखित है

यह बात व्याख्यायित है


मन को शुद्धता हेतु प्रशिक्षित करें

मन को शुद्धता में समायोजित करें

मन यदि हो गया शुद्ध हो जाएगा

सम्यक ध्यान मानव पाएगा

अंत:करण, कार्य और वाणी होगा शुद्ध

निश्चित है आप भी होंगे बुद्ध।


6).

सुशांत की साहस

भंते! व्यतीत करना चाहता हूं

अपना चतुर्मास 

नगरवधू सोमलता के पास

विनम्रता से भिक्षु सुशांत ने

बुद्ध को बतलाया।


सुनकर बात सुशांत की

तथागत मुस्काये

सच्चा साधक के सब गुण

सुशांत में देख पाये।


दूसरे भिक्षुओं को आपत्ति भारी 

हो जाएगा सुशांत 

विचलित पथ से अपने

सोमलता की सुंदरता तोड़ देगी

उसके सारे सपने।


फिर भी बुद्ध थे निश्चित

दिया आशीष सुशांत को

जाओ ! सुशांत

करना पूरी अपनी साधना 

सहनी पड़ेगी मानसिक यातना।


पहुंचे सुशांत नगरवधू के पास

मन थी एक ही आस

रिझाती रही सोमलता

सुशांत को हर पल 

निर्लिप्त था सुशांत

दूर था उसका चित्तमल।


व्यतीत हुए तीन माह

एक के बाद एक

बधाएं आईं अनेक

अडिग रहा सुशांत

अपनी साधना में रहा लीन 

सोमलता और दूसरी सुंदरियों से

होकर बेखबर साधना में तल्लीन।


सोमलता को अब उसपर

सहानभूति आई

अब चौथे मास में

सुशांत के साधना में मदद की हाथ बढ़ाई।


चौथा मास निकट था

समय तो विकट था

फिर भी सुशांत मन पर नियंत्रण पाया

कारण था कि वह

संगीत को वह बुद्ध वाणी माना

नृत्य के आलय को देवालय जाना।


इसका हुआ सोमलता पर ऐसा असर

छोड़ छाड़ कर नगरवधू का जीवन बसर

सुशांत के पीछे पीछे मठ की ओर

चल गई 

संघ के शरण में आकर

भिक्षुणी में बदल गई।


7).

मध्यम मार्ग

जीवन में ऐसे आते हैं कुछ लोग

जैसे बाढ़ का पानी हो

जलराशि इतनी अत्याधिक कि 

सब कुछ अस्त व्यस्त

जीवन भी पस्त 

तृप्ति की अधिकता 

सीमांत उपयोगिता ह्रास नियम की तरह होता है

रह नहीं जाता कुछ और

पाने की लालसा।


फिर वे जीवन से जाते हैं ऐसे

लगता है मानो

नदी में कभी पानी था ही नहीं 

चारों तरफ रेत ही रेत 

कहीं कहीं से पतला सा 

बहता जलस्रोत

सब कुछ शांत मानो

वह श्रापित फल्गु नदी हो

जहां हटा कर रेत

ढूंढना पड़ता है पानी।


किसी चीज की अधिकता 

या हो उसकी अनुपस्थिति

दोनों ही अर्थों में वह है दुःखदायी 

तथागत बुद्ध ने तभी कहा 

जीवन जीने के लिए

सर्वोत्तम मार्ग है मध्यम मार्ग।


8).

सब्ब दुःख 

बुद्ध ने कहा सब्ब दुःख 

नैराश्य में डूबे लोगों ने

घोषित किया उन्हें निराशावादी

बिना अन्य तीन अरिय सत्य को

संज्ञान में लेते हुए।


कभी देखा है सागर में हिम पहाड़ 

बस दिखने वाला हिस्से का नाम है "सब्ब दुःख"

हिम पर्वत का बाकी तीन हिस्सा 

समुद्र में ही पानी के भीतर होता रहता है उत्प्लावित

जिसमें छिपा है सब्ब दुःख का निदान।


लेकिन कवियों ने दुःख को जैसा

देखा वैसा गाया 

पर कौन है जो दुःख से पार पाया

"दु:ख ही जीवन की कथा रही"

दुःख ने निराला को जब तोड़ा

तब केदारनाथ ने तो दुःख को ही

कविता की ममता से जोड़ा।


तारा ने दुःख को अंगीकार किया

कहा कि

मैं दुःख से श्रृंगार करूंगी।


दुःख का क्या 

वह तो मणिकर्णिका को भी आता है

तब श्रीकांत बोल पड़ते हैं

दुखी मत होना

मणिकर्णिका

दुःख तुम्हें शोभा नहीं देता।


बुद्ध ने दुःख तो स्वीकारा

कवियों ने उसको माना है

दुःख यदि सत्य है

तो सत्य को क्यों झुठलाना है।


9).

भूमि स्पर्श मुद्रा

ऊरवेला का वह विशाल पीपल वृक्ष

समाधिस्थ हैं शाक्यमुनि 

गहरी समाधि, गहन तपस्या में।


बधाएं दस दिशाओं से

अनवरत रूप से प्रलोभक 'मार' का

कर चुका है आक्रमण

बोल चुका है धावा 

अपनी दसों सेनाओं के साथ।


शामिल हैं जिसमें उसकी तीन पुत्रियाँ 

तृष्णा, अरति और राग*

अन्य दूसरे भी हैं हमलावर

असंतोष, भय और शंका

साथ में आते हैं मिथ्या शोक दंभ

अंत में युद्ध में शामिल होता है भूख प्यास ।


तोड़ना है आज गौतम का प्रयास

यही है मार को आस

होता है भयंकर संघर्ष 

आखिरकार

होता पराजित है मार

पर उसको विश्वास कहां?

कि मिली संबोधि गौतम को

अब वे कहे जाएंगे बुद्ध।


संशय से भरा मार

पूछ लिया साक्ष्य आखिरकार

सच में मिल गई संबोधि

बुद्ध ने उठाया दाहिना हाथ

निकाली हाथ से मध्यमा ऊंगली 

करते हुए स्पर्श भूमि को

माना साक्षी भू को।


वही पीपल वृक्ष कहलाया बोधि वृक्ष 

उरुबेला है आज बना बोधगया

जिसके नीचे विराजमान 

सम्यक सम्बुद्ध तथागत बुद्ध

भूमि स्पर्श मुद्रा में।


10).

नंदनगढ़ का स्तूप

कहता है कोई मौर्यकालीन गौरव 

कोई कहता घनानंद का रहस्यमयी किला

कोई बुद्ध का देसना स्थल

कोई बुद्ध का अस्थि स्थल

कोई कहता बुद्ध के महाभिनिष्क्रमण से जुड़ा स्थल

स्थानीय लोगों के लिए महत्वहीन

आँख रहते हुए भी हुक्मरानों के

आँखों से ओझल।


बामियान का ग़म है

लेकिन हम कौन से कम हैं?

बुद्ध का यह पवित्र स्थल

बना है आज मवेशियों का चरागाह

नशेड़ियों का गुप्त स्थल

चिलमचियों का अड्डा

दारूबाजों का आरामगाह

बच्चों का क्रीड़ास्थल।


स्तूप की ईंटें भराभरा कर

गिर रहीं है रोज रोज 

मानों इतिहास का पन्ना 

विनष्ट हो रहा है रोज रोज।


बचा रहा पुष्यमित्र शुंग के दंड से

बचा रहा शशांक के कोप से

बचा रहा बख्तियार के हमले से

लेकिन अब ऐसा लगता है

कि बेकार में ही हुआ इसका उत्खनन

अच्छा था यूं ही पड़ा रहता

जमीन के भीतर 

"चत्तारो महाभूतानी" में एक के पास 

सदा के लिए।


कविताएं साभार: डॉ० संतोष पटेल के फेसबुक वॉल से 

डॉ० संतोष पटेल 

सम्प्रति: सहायक कुलसचिव (असिस्टेंट रजिस्ट्रार), दिल्ली कौशल व उद्यमिता विश्वविद्यालय, दिल्ली सरकार, नई दिल्ली। 

सम्पर्क:

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