Sunday, 5 February 2023

गाँव :गोलेन्द्र पटेल


गाँव

धूल, धुआँ और कुआँ किसी पहचान है?

कितना घातक दाँव है
कहीं धूप, तो कहीं छाँव है
भँवर में फँसी नाव है
मेरा गाँव अपने जनपद में एक बड़ा गाँव है!

मेरे गाँव में एक घर पंडित है
और एक घर मुस्लमान
अधिक चमार हैं
और उसके बाद चौहान
आधा में कई जातियाँ हैं
कई टोले हैं -
यादव हैं
पटेल (कुर्मी) हैं
तेली हैं
कुम्हार हैं
मौर्या हैं
डोम हैं
नट हैं
गोड हैं
लोहार हैं
खट्टिक हैं
नाउन हैं
धोबी हैं
पासवान हैं
ठाकुर हैं...

जैसे हर गाँव में पण्डित पूज्य हैं
वैसे ही मेरे गाँव में भी
लेकिन मेरा पड़ोसी पंडित ऐसा कोई दिन नहीं है
कि वह दारू न पीता हो
ऐसा कोई दिन नहीं है कि वह नशे में गालियाँ न देता हो
ऐसा कोई दिन नहीं है कि नालियों में न सोता हो
ऐसा कोई दिन नहीं है कि वह मराता न हो

मुझे उस पर दया आती है
किन्तु मैं क्या करूँ
मैं समझा भी तो नहीं सकता हूँ
उसे समझाने का अर्थ है गालियाँ खाना

मैं उससे अधिक मुस्लमान का सम्मान करता हूँ
क्योंकि मेरे गाँव के मुस्लमान
मुस्लमान कम, इनसान अधिक हैं
वे कभी भी माइक व हारन लगाकर
अज़ान नहीं पढ़ते हैं
न ही करते हैं पर्दा

वे दूर से देखने पर
एक हिन्दू से भी अधिक हिन्दू दिखते हैं
वे हिन्दू-पर्व मनाते हैं
मुझे कई सालों तक नहीं पता था कि ये मुस्लमान हैं
वे मेरी नज़र में हिन्दुस्तान हैं
मैं उनके यहाँ कई बार खाना खाया हूँ
उनके आँगन में गौली-कौड़ी खेला हूँ
और पंडीजी के आँगन में आइस-पाइस

पंडीजी तब तक मेरे प्रिय रहे
जब तक मदिरालय से दूर रहे
रही बात चमारों और चौहानों की
तो वे सब मेरे अच्छे मित्र हैं
जब मैं भक्त नहीं था
तब सबकी थाली में खाता था
अब तो केवल आत्मीय जन के घर खाता हूँ

क्या पासवान?, क्या चमार?, क्या चौहान?
क्या पटेल?, क्या पंडित?, क्या मुस्लमान?
हम सब एक हैं हमारा गाँव एक है
जहाँ अब भी बसता है असली हिन्दुस्तान
वे हमारे घर के कारज़-परोज़ में आते हैं
हम उनके घर के कारज़-परोज़ में जाते हैं
वे हमारी मँड़ई उठाते हैं, हम उनकी
वे हमारी देवी-देवता को पूजते हैं, हम उनके
वे हमारे खेत अगोरते हैं, हम उनके

असल में मैं 'मैं' नहीं, 'हम' है
जो एक गाँव है
जो जोगी-फ़कीर का ठाँव है!

(©गोलेन्द्र पटेल / रचना : 02-05-2018)

कवि : गोलेन्द्र पटेल

संपर्क :

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

पिन कोड : 221009

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com

Tuesday, 31 January 2023

वेश्या विमर्श : कविताएँ (नगरवधू, तवायफ़ ,रंडी, छिनाल, वेश्या व गणिका)

 

गोलेन्द्र पटेल की वेश्या पर केंद्रित कविताओं में से छह कविताएँ प्रस्तुत हैं :-

तवायफ़


तवायफ़ 

जीभ पर उगी गाली नहीं

बल्कि ज़ख्मी जिस्म के लिए

तगड़ी तोहमत है


उस तबके में ज़ीनत की ज़ोरदार जीत है


जहाँ ज़मीन का दलाल

जाँघ पर लिख दी

अपनी ज़िंदगी!

वेश्यावृत्ति

अबोध बच्ची थी जब मुझे बेचा गया
सच्ची अभिव्यक्ति में
अपनी आबरू की क्या कीमत है?

बढ़ो, बढ़ो, बढ़ो!
मेरे कच-कुच, जल्दी बढ़ो!
मेरे गुलाबी अधरों पर अर्थहीन रस है,
आओ, आओ, आओ!
भोसड़ी के भूखे भक्तों, आओ!
मेरी जाँघों के बीच 
तुम्हारी जन्नत है,
क्या यह वक्त वासनारत है!

मुझे नोचो, मेरी चोथो, भें...चो!
मेरी आँखों में अफ़ीम से अधिक नशा है,
मत पूछो कि इस देह की कैसी दशा है!

तुम्हारे दाँतों और नाख़ूनों के निशान
मेरी पहचान है,
तुम्हारी विलक्षण गाली
सुनने की भयावहता से
अनिद्रा
आर्द्रता सी गीली बात है
मेरे लिए दिन 
रात है!

मैं अपने पेट के लिए
तुम्हें प्यार करती हूँ पाँच मिनट

मेरी साँसें चल रही हैं पर तन-मन निःशब्द हैं,
नगरवधू, तवायफ़ ,रंडी, छिनाल व वेश्या
ये सब सिर्फ़ शब्द हैं!
मेरे पास कोई प्रकाश नहीं है,
कोई आत्मा नहीं है,
कोई दिल नहीं है,
लेकिन वह बिल है,
जिस पर तुम एकाधिकार चाहते है,
जैसे कोई चूहा।

चंद पैसों के लिए
आसान नहीं है ख़ुद को सौपना,
जिस्मों के बाज़ार में रोज़ रौंदाना
मेरी नियति है!
मगर मेरी सुंदरता 
तुम्हारे गंदे विशेषणों पर मुस्कुराती है।
ताकि तुम उसे मेरा प्यार समझो
थोड़ी मेरी इज़्ज़त करो
उसकी भी इज़्ज़त करो, जहाँ से तुम आए हो

मैं तुम्हारी हवस की आग से 
सभ्य स्त्रियों को जलने से बचाती हूँ
मैंने अपने सीने पर 
तुम्हारे खंज़रों को झेलने की कला सीख ली है
दो अंगुल की खाल के ख़रीददारो!
मैं सौदाबाज़ी की वस्तु हूँ?
मेरे गुप्तांगों के आगे दुनिया के सारे धर्म झुक गये हैं!
मैं पाप और पुण्य से ऊपर हूँ,
फिर भी अपनी अस्मिता की खोज में लगी हूँ,
क्योंकि मैं भी एक स्त्री हूँ!

मेरी एक सखी का सवाल है
क्या बिन ब्याहे माँ बन चुकी स्त्री
वेश्या है?

संभोगरत शव

काश कि मैं कर पाता
मर्दाना भीड़ में स्त्रियों के स्वतंत्र अस्तित्व की तलाश! 
मैं उस गली से गुज़र रहा हूँ जिसमें सदियों से अंधेरा है
जो सौंदर्य के संगीत में सना है
वर्जित इच्छाओं की सड़क पर 
वेश्या वृत्तांत बना है यह

ओ वेश्याओ!
मैं बस तुम्हारी पीड़ा को समझ सकता हूँ
लिख सकता हूँ तुम्हारा दर्द
तुम्हारी आवाज़ बन सकता हूँ
लेकिन तुम्हें दिल में जगह नहीं दे सकता
क्योंकि मैं हूँ न सभ्य मर्द! 
मुझे मालूम है कि
तुम्हारे लिए प्रश्न अधिकार का है
मेरे लिए संवेदना का

मैं तुम्हारी देह के गेह में परिवेश करता हूँ
ताकि तुम्हारा क्षणिक स्नेह पा सकूँ
ख़ुद को रेह होने से बचा सकूँ
तुम चंपा, चमेली, रजनीगंधा, गेंदा या गुलाब की नहीं
बल्कि लाचार ज़िंदगी की गदराई गंध हो

मैं तुम्हें कोठे से नीचे उतारना चाहता हूँ
ताकि तुम तवायफ़ से अपनी औरत हो सको
क्या यह संभव है? 
जिस्म के बाज़ार में रूह की मौत पर 
मुहावरा कहना आसान है
मगर मुहावरा है कि वह मरती नहीं है
यह कैसा रव है कि
समय की सेज पर संभोगरत शव है?

मेरी ज़बान पर तुम्हारी कहानी है
तुम कामुकता की कुश्ती में विजयी बनो
मुझे हैवानियत की हँसी उड़ानी है
क्योंकि कोठे पर जो सपनों की रानी है
उसकी आँखों में सागर से अधिक पानी है!

लिखूँगा

मैंने जानबूझकर लिखी है, गंदी भाषा में वेश्याओं की दर्दभरी कहानी
मैंने जानबूझकर लिखी है, कविता में कर्षित किन्नरों की ज़िंदगानी
मैंने जानबूझकर लिखी है, पुस्तकों में दोहरी दलित देह की बानी

मैं अब भी लिखता हूँ आँखों के पानी पर
मैं अब भी लिखता हूँ राजा-रानी पर
मैं अब भी लिखता हूँ राजधानी पर
मैं अब भी लिखता हूँ खींचातानी पर

मैं लिखूँगा तब तक
जब तक चीख सुनाई देगी
जब तक भीख दुहाई देगी
जब तक लीख दिखाई देगी
जब तक सीख मिलेगी पीड़ा से
जब तक शोषण-शक्ति खत्म नहीं होगी इड़ा से

मैं इसी तरह लिखूँगा नदी का सूखना,
जंगल का जलना, पर्वत का टूटना,
सागर का रोना, किसान का बोना
मैं इसी तरह लिखूँगा लहू से लोकतंत्र
सत्ता का षड्यंत्र, ओझा का मंत्र

मुझे मालूम है कि लिखे बग़ैर कुछ नहीं मिलता
लड़े बग़ैर कुछ नहीं मिलता
मैं लिखूँगा अँधेरे के विरुद्ध 
उजाले का युद्ध!

वेश्या व्यथा

दिन हो या रात
मुझे डर नहीं लगता
घर से निकलने पर
आख़िर ऐसा क्यों?

दुख की दलदल में धँसी देह
नहीं सोचती मृत्यु के बारे में
नहीं सोचती मुक्ति की युक्ति
क्या तुम जानते हो
कि ऐसी दशा में दिमाग क्या सोचता है?
क्या तुम जानते हो
कि 
उसकी दो अंगुल की जगह में
समाया है
समूचा ब्रह्मांड?
वह वेश्या से पहले एक स्त्री है न!

उसके हाथों में कंडोम का डब्बा है
मैं कतई नहीं चाहता कि वेश्यावृत्ति बंद हो जाय
क्या उसका धंधा तुम्हारे चेहरे पर
एक अश्लील धब्बा है?

देह व्यापार उद्योग

दुनिया स्त्रियों के समान अधिकारों के लिए
संघर्ष कर रही है
वे शक्ति, शील, सौंदर्य और आकर्षण के प्रतीक हैं
उनकी देह दर्द का गेह है
लेकिन वे देखने में ठीक हैं

वैश्वीकरण के कारण गरीबी बढ़ी है
वस्त्र, भोजन और आश्रय की किल्लत की वजह से
वे वेश्यावृत्ति में उतर जाती हैं
तो कुछ अन्य मजबूरी में भी!

वे अंधेरे कमरों में रहती हैं
वे सदियों से अपनी नींद से वंचित हैं

वे कहती हैं कि
कोई भी पुरुष मेरे साथ सोना नहीं चाहेगा
मेरे पास उन्हें देने के लिए कुछ नहीं है

मुझे सोने से पहले वे ड्रग्स
या कोई नशीली चीज़ ज़बरन देते हैं
या इंजेक्शन देते हैं
मेरी चीख सुनने के लिए
मेरे गुप्तांगों में जलता हुआ सिगरेट ठूँस दिया जाता है

क्या अपना घर सबसे सुरक्षित जगह है?
जहाँ मैं पहली बार बलात्कृत हुई हूँ
खैर, मुझे मालूम है कि
जब मैंने वेश्यालय का दरवाज़ा खोला
मेरे जीवन के सारे दरवाज़े बंद हो गए

वेश्यावृत्ति को वैध बनाने के प्रयास विफल हो गए हैं
पर यह प्राचीनकालीन पेशा है

अब भी सामाजिक और मानवीय स्वीकृति द्वारा
यौन शोषण और बहिष्कार
मुख्य रूप से उनका भाग्य बना हुआ है
सेक्स सर्विस का कारोबार ख़ूब फल-फूल रहा है
उनका उचित सवाल ख़ून में सना हुआ है

मैंने इलाहाबाद में मीरगंज के रेड लाइट एरिया से गुज़रते हुए सोचा कि
वाराणसी में शिवदासपुर है शायद!

मैं अपने अस्तित्व की खोज में भटक रही हूँ
कोलकाता में सोनागाछी की सड़कों पर
और मेरी सहेली मुंबई के कमाठीपुरा में!


©गोलेन्द्र पटेल
वेश्या के पर्यायवाची शब्द हैं – यौनकर्मी, रंडी, तवायफ़, धर्षिता, खंडशीला, पश्यंती, रूपाजीवा, कसबी, इस्मतफ़रोश, कंचनी, अप्सरा, कोठेवाली, गणिका, तवायफ़, तायफ़ा, तवायफ़, पातुर, नटी, झर्झरा, पणांगना, नगरवधू आदि।
कवि : गोलेन्द्र पटेल
संपर्क :
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com


Saturday, 14 January 2023

गोलेन्द्र पटेल की कुछ कविताएँ

पशु, पक्षी, पेड़, पौधे, नदी, जंगल, पर्वत, पहाड़, पठार

सागर, सुर, असुर, रीछ, नाग, नर, वानर, किन्नर, किरात

विद्याधर, यक्ष, गंधर्व आदि सभी को मेरा सादर नमस्कार!

-गोलेन्द्र पटेल

"भाषा सौंदर्यबोध की अभिव्यक्ति की सृजनात्मक शक्ति है।" -गोलेन्द्र पटेल



गोलेन्द्र पटेल की कुछ कविताएँ :-


1).


आकाश नापना


बाज़ो! तुम्हारी तरह

मुझे उड़ने की ज़रूरत नहीं है

मैं तो वामन हूँ

धरती से ही पूरा आकाश नाप सकता हूँ!


2).


परिस्थिति, पुल और पोत


प्रिये! प्रतिकूल परिस्थितियों...

जैसे यदि तुम्हारी यात्रा में

बाधा नदी बनेगी

तो मैं पोत नहीं,

पुल बनूँगा

यदि बाधा सागर बनेगा

तो मैं पुल नहीं,

पोत बनूँगा!


3).

क्या मैंने बुरा किया!


मेरे एक मित्र ने कई अच्छी रचनाएँ लिखीं

लेकिन वे उसे एक भी रोटी न दे सकीं

वह भूख से मर गया


मैंने एक अश्लील रचना लिखी

और कई लोगों को भूखे मरने से बचा लिया

क्या मैंने बुरा किया!


4).


झुरा


झुरा में सैंता गया

गोबर

बरसात भर

चूल्हा में जलता है


जैसे हिमालय

चिंता में गलता है!


5).

ख़िरद छिटना


खेत में खाद नहीं, 

ख़ूबसूरत ख़िरद छिट रही हूँ

फेंक रही हूँ खीज

उछाल रही हूँ ख़ुद को

और सोच रही हूँ

कि घास पर

गिरीं ओस की बूँदें

क्या मेरे आँसू हैं

या कोई नयी चीज़!


6).

आँच और आर्द्रता


धूप में चमकती चीज़ काया नहीं ,

काँच है ;

इस ठंड में

मुझे शब्द से ज़्यादा

ख़ूबसूरत कुछ और नहीं लगता

क्योंकि उसमें आर्द्रता नहीं ,

आँच है !


7).

उत्साह का उत्स


रविवार से सोमवार तक

समय को 

कार्य में रूपांतरित करना

मुश्किल है ;

लेकिन यह संभव है

क्योंकि उत्साह का उत्स

दिमाग नहीं , दिल है !


8).

सेतु


यदि दो शिक्षक के संबंध

नदी के दो छोर हों

तो शिष्य 

उनके बीच सेतु की 

भूमिका में हो सकते हैं

बशर्ते सेतु का उद्घाटन

सत्ता नहीं , शब्द करे

या फिर

जो दुःख हरे!


9).

गाली


शिक्षित हूँ मगर 

मैं दलित हूँ

मेरी बस्ती गाँव के दक्खिन में है


आज आप अपनी ज़बान की

सबसे गंदी गाली मुझे दे सकते हैं

यदि आपको कोई गाली आती है ,

तो मुझे ज़रूर दें !

स्वागत है !...


मैं सुनना चाहता हूँ

वही गालियाँ

जिनसे मेरी पुरखिनों के पेट फूलते थे!


10).

उपस्थित हैं!


एक अहिल्या थी

जिसे राम ने तारा

एक द्रौपदी थी

जिसे कृष्ण ने उबारा

एक आम्रपाली थी

जिसे बुद्ध ने दिया 

मुक्ति का मंत्र


फिर भी आज 

समाज में तीनों उपस्थित हैं!


11).



चिट्ठी


पोस्टमैन!

पवन दूत नहीं

पतंग पहुँचाएगी

मेरी चिट्ठी! 


12).

किसान कवि


मैं वही किसान कवि हूँ

जिसके धान के खेतों को

आसमान में अगोर रहे हैं विद्रोही

और धरती पर

त्रिलोचन!


13).


मित्रता और मुहब्बत


मैंने तुमसे मित्रता की

मगर तुमने मुझसे मुहब्बत कर ली

अब जब तुम पंचतत्व में विलीन हो चुकी हो

तो मैंने तुम्हारी स्मृति को 

प्रेम की संज्ञा दी!


14).

मूर्दा मुस्कान


जान!

यह तो मूर्दा मुस्कान है


तुम्हारे साथ

मेरी हँसी चली गयी! 


14).

यह


अजीब है समय का खेल

यह जो महुआ बीनती हुई

महिला की पीठ पर बच्चा है

यह कोई और नहीं , 

मैं हूँ

यानी गोलेन्द्र पटेल

और यह महिला

मेरी माँ है !



परिचई :-

नाम : गोलेन्द्र पटेल

उपनाम/उपाधि : 'गोलेंद्र ज्ञान' , 'युवा किसान कवि', 'हिंदी कविता का गोल्डेनबॉय', 'काशी में हिंदी का हीरा', 'आँसू के आशुकवि', 'आर्द्रता की आँच के कवि', 'अग्निधर्मा कवि', 'निराशा में निराकरण के कवि', 'दूसरे धूमिल', 'काव्यानुप्रासाधिराज', 'रूपकराज', 'ऋषि कवि',  'कोरोजयी कवि', 'आलोचना के कवि' एवं 'दिव्यांगसेवी'।
जन्म : 5 अगस्त, 1999 ई.
जन्मस्थान : खजूरगाँव, साहुपुरी, चंदौली, उत्तर प्रदेश।
शिक्षा : बी.ए. (हिंदी प्रतिष्ठा) व एम.ए. (अध्ययनरत), बी.एच.यू.।
भाषा : हिंदी व भोजपुरी।
विधा : कविता, नवगीत, कहानी, निबंध, नाटक, उपन्यास व आलोचना।
माता : उत्तम देवी
पिता : नन्दलाल

पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन :

कविताएँ और आलेख -  'प्राची', 'बहुमत', 'आजकल', 'व्यंग्य कथा', 'साखी', 'वागर्थ', 'काव्य प्रहर', 'प्रेरणा अंशु', 'नव निकष', 'सद्भावना', 'जनसंदेश टाइम्स', 'विजय दर्पण टाइम्स', 'रणभेरी', 'पदचिह्न', 'अग्निधर्मा', 'नेशनल एक्सप्रेस', 'अमर उजाला', 'पुरवाई', 'सुवासित' ,'गौरवशाली भारत' ,'सत्राची' ,'रेवान्त' ,'साहित्य बीकानेर' ,'उदिता' ,'विश्व गाथा' , 'कविता-कानन उ.प्र.' , 'रचनावली', 'जन-आकांक्षा', 'समकालीन त्रिवेणी', 'पाखी', 'सबलोग', 'रचना उत्सव', 'आईडियासिटी', 'नव किरण', 'मानस',  'विश्वरंग संवाद', 'पूर्वांगन' आदि प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित।

विशेष : कोरोनाकालीन कविताओं का संचयन "तिमिर में ज्योति जैसे" (सं. प्रो. अरुण होता) में मेरी दो कविताएँ हैं और "कविता में किसान" (सं. नीरज कुमार मिश्र एवं अमरजीत कौंके) में कविता।

ब्लॉग्स, वेबसाइट और ई-पत्रिकाओं में प्रकाशन :-

गूगल के 100+ पॉपुलर साइट्स पर - 'कविता कोश' , 'गद्य कोश', 'हिन्दी कविता', 'साहित्य कुञ्ज', 'साहित्यिकी', 'जनता की आवाज़', 'पोषम पा', 'अपनी माटी', 'द लल्लनटॉप', 'अमर उजाला', 'समकालीन जनमत', 'लोकसाक्ष्य', 'अद्यतन कालक्रम', 'द साहित्यग्राम', 'लोकमंच', 'साहित्य रचना ई-पत्रिका', 'राष्ट्र चेतना पत्रिका', 'डुगडुगी', 'साहित्य सार', 'हस्तक्षेप', 'जन ज्वार', 'जखीरा डॉट कॉम', 'संवेदन स्पर्श - अभिप्राय', 'मीडिया स्वराज', 'अक्षरङ्ग', 'जानकी पुल', 'द पुरवाई', 'उम्मीदें', 'बोलती जिंदगी', 'फ्यूजबल्ब्स', 'गढ़निनाद', 'कविता बहार', 'हमारा मोर्चा', 'इंद्रधनुष जर्नल' , 'साहित्य सिनेमा सेतु' , 'साहित्य सारथी' , 'लोकल ख़बर (गाँव-गाँव शहर-शहर ,झारखंड)', 'भड़ास', 'कृषि जागरण' ,'इंडिया ग्राउंड रिपोर्ट', 'सबलोग पत्रिका', 'वागर्थ', 'अमर उजाला', 'रणभेरी', 'हिंदुस्तान', 'दैनिक जागरण', 'परिवर्तन' इत्यादि एवं कुछ लोगों के व्यक्तिगत साहित्यिक ब्लॉग्स पर कविताएँ प्रकाशित हैं।

लम्बी कविता : तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव

प्रसारण : 'राजस्थानी रेडियो', 'द लल्लनटॉप' एवं अन्य यूट्यूब चैनल पर (पाठक : स्वयं संस्थापक)

अनुवाद : नेपाली में कविता अनूदित

काव्यपाठ : अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय काव्यगोष्ठियों में कविता पाठ।

सम्मान : अंतरराष्ट्रीय काशी घाटवॉक विश्वविद्यालय की ओर से "प्रथम सुब्रह्मण्यम भारती युवा कविता सम्मान - 2021" , "रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार-2022" और अनेकानेक साहित्यिक संस्थाओं से प्रेरणा प्रशस्तिपत्र प्राप्त हुए हैं।

मॉडरेटर : 'गोलेन्द्र ज्ञान' , 'ई-पत्र' एवं 'कोरोजीवी कविता' ब्लॉग के मॉडरेटर और 'दिव्यांग सेवा संस्थान गोलेन्द्र ज्ञान' के संस्थापक हैं।

संपर्क :
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com
■■■★★★■■■

--Golendra Patel
BHU , Varanasi , Uttar Pradesh , India

धन्यवाद!

■■★★■■

(दृष्टिबाधित विद्यार्थियों के लिए अनमोल ख़ज़ाना)

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Monday, 2 January 2023

काव्यगुरु : सुनीता | गोलेन्द्र पटेल

 



काव्यगुरु

दुनिया कुछ भी कहे
चुपचाप सुन लूँगी
मैं रेगिस्तान में राह चुन लूँगी
क्योंकि सफ़र में
विराट व्यक्तित्व के धनी
प्रिय पथप्रदर्शक व ऋषि कवि
गोलेन्द्र की कविता है मेरे संग
सागर
उठने दो मन में उमंग!

हे शब्दों के सुरेंद्र!
जन-ज़मीन-जंगल-जल ही नहीं
धरती-आकाश और संपूर्ण प्रकृति
साक्षी है कि
मेरे साहित्यिक गुरु हैं गोलेन्द्र!

वे उम्र में छोटे हैं लेकिन भाषा में बड़े
वे संवेदना की सरहद पर खड़े
कलम के सिपाही हैं
नव रव के राही हैं
वे अक्सर जिन गुरुओं की चर्चा करते हैं
उनमें प्रमुख श्रीप्रकाश शुक्ल और सदानंद शाही हैं
उनकी रचनाएँ
इस बात की गवाही हैं

बहरहाल, वे मेरे भाई हैं
काव्यानुप्रासाधिराज हैं, रूपकराज हैं
किसान कवि हैं...
समय, समाज और साहित्य के साज़ हैं
मेरे काव्यगुरु हैं
नये राग के रवि हैं

वे कहते हैं कि 'मैं तुम से सीखता हूँ
तुम मुझसे
हमें एक दूसरे से सीखना चाहिए
सीखना क्रिया
कला को परिष्कृत करती है'
और वे कहते हैं
कि 'सृजन में आदर सूचक शब्द
बाधक होते हैं
किसी भी सर्जक के नाम के साथ
जी जोड़ना व्यर्थ है'
और वे कहते हैं
कि 'शिष्य को गुरु का भक्त होना चाहिए
उनकी रचनाओं का नहीं।'

वे निराशा में निराकरण के रचनाकार हैं
उनका मुझ पर उपकार है
वे स्वप्न व संघर्ष के सर्जक हैं
उनके पास गज़ब की सृजनात्मकता शक्ति है
यह नव वर्ष पर सहज मेरी अभिव्यक्ति है

यह वर्ष प्रिय कवि के लिए
सुख, शांति, समृद्धि, आरोग्य
और रचनात्मकता का वाहक बने
यही ईश्वर से प्रार्थना है
हार्दिक शुभकामनाएँ!
               
-सुनीता
रचना : 01-01-2023




Saturday, 31 December 2022

नव वर्ष का नया राग | नया साल का नया स्वर | नव वर्ष का हर्ष संघर्ष है! | गोलेन्द्र पटेल

 

गोलेन्द्र पटेल की तीन कविताएँ :-


1).


नव वर्ष का नया राग


वे देश को दुहने के लिए

प्रतिबद्ध हैं

संबद्ध हैं

आबद्ध हैं

मगर मैं प्रतीक्षास्तब्ध हूँ

कि

गर्द है, धुआँ है, सर्द है और

आग है

नव वर्ष का नया राग है

जहाँ पेड़ की फुनगियों पर

उम्मीदें कायम हैं

टूट, ओ पीड़ा के पर्ण

पतझड़

वसंत से पहले आया है


गम के ग्रीटिंग कार्ड में लिखीं नम आँखें

कि नदी, जंगल, पहाड़ और सागर 

सुनो, इस दौर में ठौर नहीं है

कौर नहीं है

घर-घर में घुप अँधेरा घूर्ण है 

पूर्ण मन चूर्ण है

यह ख़त अपूर्ण है


सूरज लुढ़क गया है

उम्र की ढलान पर और 

पृथ्वी डूब रही है

आसमान के संचित आँसू में

लेकिन

युवा उलट कर हो गया वायु

या यह कहूँ 

कि उसकी आत्मा का अव्यय 

वाह

वह हवा है 

जो सरहद के पार जाती है

शुभकामना लेकर!


रचना : 20-12-2022


2).

नया साल का नया स्वर


मैं चाहता हूँ

जीवन के वन में कोयल कूजे

हर घर में 

समरसता, सर्वधर्म और समभाव की वाणी गूँजे

मैं चाहता हूँ

हर कवि की कविता में

सरिता लोरी गाए

सागर संगीतबद्ध हो जाए

और धरती की धुन में सनी

आसमान की लय उतर आए

मैं चाहता हूँ

पेड़ फूले-फले

और पहाड़

आदमी के कद से ऊँचा रहे

मैं चाहता हूँ

भाषा में सूप भर धूप

और रूप अमर

सुंदर अक्षर

मैं चाहता हूँ

सृजन के शोर में 

नया साल का नया स्वर

मैं चाहता हूँ

खेतों में सूरज उगे

चेतना की चिड़िया 

दाना चुगे!


रचना : 30-12-2022


3).

नव वर्ष का हर्ष संघर्ष है!

जनवरी! दिसंबर को पता है
बीतना एक नयी मुबारकबाद का मुहावरा है

उम्मीद की उड़ान भरी हुई
चेतना की चिड़िया
आसुओं की नदी को पार
करती हुई उसमें
अपना चेहरा देखती है

और देखती है सूरज
डूब रहा है
वह निर्निमेष निहारती है
पेड़ों के प्रतिबिंबों को
और महसूस करती है
मछलियों का पहाड़-सा दुःख
लेकिन लहरों के कुछ लम्हे
धारदार स्मृति की पहचान है

गत और आगत के बीच तट पर
हरा-भरा है घाव
सागर के इस छोर से उस छोर तक
जीवन की नाव
पीड़ा की पतवार से खेती हुई
मल्लाहिन
चक्कर लगा रही है
मछलियों की तलाश में
हताश होकर
अपने अस्तित्व का अर्थ
जानना चाह रही है
भँवर बीच
भीतर के जल से

जहाँ नीरव शून्यता में नव वर्ष का हर्ष
असल में अवनि पर स्वप्न का संघर्ष है!


रचना : 01-01-2023


कवि : गोलेन्द्र पटेल

संपर्क :
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com


Thursday, 22 December 2022

किन्नर पर केंद्रित आठ कविताएँ : गोलेन्द्र पटेल

 किन्नर पर केंद्रित आठ कविताएँ : गोलेन्द्र पटेल



1).


कविता में किन्नर


प्रिय दोस्त!

न स्त्री

न पुरुष

न ही अर्द्धनारीश्वर हो तुम


तुम कविता में किन्नर हो

यानी थर्ड जेंडर

___ ट्रांसजेंडर

लफ़ंगों की भाषा में हिजड़ा

तुम्हारा गात

गोया गम का पिंजड़ा

पर तुम मुझे पसंद हो!...


इस सृष्टि में

तुम्हारी ताली

कुदृष्टि के लिए

गाली है

तुम भी उसी कोख से उत्पन्न हुए हो

जिससे मैं

तुम देश की संतान हो

मेरे दोस्त!

                    रचना : 20-12-2022

2).


ट्रांसजेंडर संतान का दुःख!


क्या कोई रोक पाया है कभी

आँखों से पकी पीड़ा का टपकना

माथे पर श्रम की बूँद का अंकुरित होना

देह में दर्द का खिलना

फिर कैसे रोक पायेगा

कभी कोई

ट्रांसजेंडर संतान का दुःख!


सुख में

पत्थर पर उग जाती है प्रसन्नता

जैसे 

रेत में रोती हुई दूब ;

जहाँ मर्द और औरत के बीच

नदी

किन्नर का संचित

आँसू है

जो अपने आप में धाँसू है!

                         रचना : 21-12-2022

3).


किन्नर-कथा


अस्तित्व की तलाश में शिखंडी

अपनी आत्मा को तब तक तपाया

जब तक कि भीष्म 

शरशय्या पर सो नहीं गये


मगर याद रहे

साधना के समय स्त्री रूप में था वह

तप के बाद हुआ पुरुष


उसने अर्द्धनारीश्वर रूप की नहीं

शंकर की तपस्या की

तुम भी कर रहे हो, दोस्त!

लेकिन तुम किन्नर हो

काश कि तुम्हारी प्रार्थना भी 

सुनते शिव!


तुम्हारी व्यथा की कथा

शायद नंदी के कानों में कहने से

शीघ्र सुन लें वे!


तुम जब भी ट्रेनों में या चौराहों पर

या किसी के द्वार पर

तालियाँ बजाते हुए

दिखते हो

तुम्हारे होंठों पर होते हैं

सोहर

मंगल गीत

शुभकामना के स्वर


जबकि तुम भीतर से बहुत दुखी होते हो

और बाहर से बहुत प्रसन्न

तुम अपने चेहरे पर इतनी प्राकृतिक प्रसन्नता

कैसे उगा लेते हो?

क्या है इसका राज़?

आज

मेरी कलम निस्तब्ध पड़ी है

मन के द्वार पर 

एक ट्रांसजेंडर मित्र की स्मृति खड़ी है


जो इस करुणामयी कविता में 

किन्नर-कथा को इन्नर की तरह 

परोस चुकी है!

रचना : 21-12-2022 


4).


हिजड़ों की फ़ौज़


बचपन से

सुनता आ रहा हूँ मैं

कि हिजड़ों की फ़ौज़ से

जंग 

जीती नहीं जाती है


जंग जीती जाती है

हौसलों से!

रचना : 21-12-2022

 5). 


किन्नर


कंठ से नहीं, कोख से फूटे

शब्द ने पूछा 

कि

इस धरती पर

उसकी जगह कहाँ है?

जो फूल

क्लीव है


वसंत का मौसम है

मगर रंगों का आयतन कम हो गया है

गंध गायब हो गयी है

भाषा से


हवा में केवल

किन्नर, मौगा, हिजड़ा, छक्का, थर्ड जेंडर

___ ट्रांसजेंडर जैसे दर्दनाक

संबोधन हैं

ये कैसे उपवन हैं?


जहाँ सुनने वाला न पुरुष है

न स्त्री है

इन दोनों से भिन्न है!

रचना : 22-12-2022 


6).


किन्नर पर कविता


संसद की सड़क पर 

माँसपेशियों की मीठी महक ने कहा

कि वे न नारी हैं न नर!


उधर

एक कोई स्वर स्वयं को गाता आ रहा है

कोई समय सुनता जा रहा है उनको

कोई गमी उनकी गज़ल बन रही है

लेकिन उनकी लयबद्ध तालियाँ

मंगल के गीत हैं

उनके आँसू की आवाज़

सरसराहट में स्वप्न के संगीत हैं

वे सदियों से गाए जा रहे हैं

अपनी मानवीय स्मृति

इस धरती के लिए!


इधर

मैंने ट्रांसजेंडर साथियों से बातचीत करते हुए

महसूस किया है कि

लंबी हिचकियों के बीच

हृदय में हुलास मारता है दुःख

हड्डियाँ चरमरा जाती हैं 

और उनकी देह

उन्हें दर्द का गेह मालूम होती है


धूप, हवा और पानी प्रतिकूल हैं

पर अपनी पीड़ा

वे गूँथते जाएंगे अपनी धुन के धागे पर

अभिशप्त जीवन के लिए


जहाँ उनमें एक उम्मीद है

कि ऊसर में उनकी आत्मकथा उगेगी

जो चुप्पी के समाजशास्त्र का सप्रसंग व्याख्या करेगी


आह! आत्मा के अक्षर 

इतिहास के पन्नों पर अच्छे लग रहे हैं!


मेरे दोस्त!

यह सोहर में स्याह संवेदना व्यक्त करने का समय है

और तुम चुप हो


तुमसे दोस्ती है तुम हो इसलिए यह 

किन्नर पर कविता है 

जैसे कोई ठूँठ पेड़ सिर्फ़ इसलिए है

क्योंकि पंक्षियों की उड़ान भरने में

उसकी अहम भूमिका है! 

रचना : 22-12-2022

7).


तीसरा समाज


भले ही भारत-भूमि 

आदिकाल से तमाम जातियों की रही है

किन्तु ;

आज मैंने

दलित, आदिवासी, वृद्ध, विकलांग 

व किन्नर पर काम करते हुए

पाया कि

साहित्य में एक तीसरा समाज है!

रचना : 22-12-2022

8).


 किन्नर पर केंद्रित किताब


आज सुबह-सुबह कोयल की कूक नहीं

किसी हिजड़े के हृदय की हूक सुनी है मैंने

इन दिनों मैं पढ़ रहा हूँ

किन्नर पर केंद्रित किताब


अक्षरों के नीचे दबे दर्द को देख रहा हूँ मैं


सुना मैंने कई चैनलों पर ट्रांसजेंडरों के इंटरव्यू

शक़ हुआ उन पर

लिखे गये विमर्शों को लेकर

जहाँ ज़िन्दगी जिज्ञासा बन गयी


अँधेरे को चीरती चेतना

पेड़ का नहीं,

प्रसव पीड़ा का तना है

जो समंदर के शोक में सरिता की संवेदना है


वर्तमान के विमर्श यह नहीं देख रहे कि

उसमें समकालीन सच कितना है!


उनमें बस कागज़ पर उतने की होड़ लगी है

कोई आहत आत्मा आधी रात जगी है


अब जब कवि हवा में कुछ शब्द उछालते हैं

आलोचक उसे कविता कहते हैं

ऐसे में मतलब समझ ही गये 

कि मैं कहना क्या चाहता हूँ


उनके दुःख में दुखी होना चाहता हूँ मैं 

गीत की भाषा में रोना चाहता हूँ

ताकि वे सुन सकें

जिन तक चिखना-चिल्लाना-गुर्राना 

जैसी क्रियाएँ नहीं पहुँचती हैं


उनके अस्तित्व की आवाज़ें

रोक दी जाती हैं

जो तीसरे समाज के नागरिक हैं!

रचना : 23-12-2022

कवि परिचई :-

नाम : गोलेन्द्र पटेल


उपनाम/उपाधि : 'गोलेंद्र ज्ञान' , 'युवा किसान कवि', 'हिंदी कविता का गोल्डेनबॉय', 'काशी में हिंदी का हीरा', 'आँसू के आशुकवि', 'आर्द्रता की आँच के कवि', 'अग्निधर्मा कवि', 'निराशा में निराकरण के कवि', 'दूसरे धूमिल', 'काव्यानुप्रासाधिराज', 'रूपकराज', 'ऋषि कवि',  'कोरोजयी कवि', 'आलोचना के कवि' एवं 'दिव्यांगसेवी'।

जन्म : 5 अगस्त, 1999 ई.

जन्मस्थान : खजूरगाँव, साहुपुरी, चंदौली, उत्तर प्रदेश।

शिक्षा : बी.ए. (हिंदी प्रतिष्ठा) व एम.ए. (अध्ययनरत), बी.एच.यू.।

भाषा : हिंदी व भोजपुरी।

विधा : कविता, नवगीत, कहानी, निबंध, नाटक, उपन्यास व आलोचना।

माता : उत्तम देवी

पिता : नन्दलाल


पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन :


कविताएँ और आलेख -  'प्राची', 'बहुमत', 'आजकल', 'व्यंग्य कथा', 'साखी', 'वागर्थ', 'काव्य प्रहर', 'प्रेरणा अंशु', 'नव निकष', 'सद्भावना', 'जनसंदेश टाइम्स', 'विजय दर्पण टाइम्स', 'रणभेरी', 'पदचिह्न', 'अग्निधर्मा', 'नेशनल एक्सप्रेस', 'अमर उजाला', 'पुरवाई', 'सुवासित' ,'गौरवशाली भारत' ,'सत्राची' ,'रेवान्त' ,'साहित्य बीकानेर' ,'उदिता' ,'विश्व गाथा' , 'कविता-कानन उ.प्र.' , 'रचनावली', 'जन-आकांक्षा', 'समकालीन त्रिवेणी', 'पाखी', 'सबलोग', 'रचना उत्सव', 'आईडियासिटी', 'नव किरण', 'मानस',  'विश्वरंग संवाद', 'पूर्वांगन' आदि प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित।


विशेष : कोरोनाकालीन कविताओं का संचयन "तिमिर में ज्योति जैसे" (सं. प्रो. अरुण होता) में मेरी दो कविताएँ हैं और "कविता में किसान" (सं. नीरज कुमार मिश्र एवं अमरजीत कौंके) में कविता।


ब्लॉग्स, वेबसाइट और ई-पत्रिकाओं में प्रकाशन :-


गूगल के 100+ पॉपुलर साइट्स पर - 'कविता कोश' , 'गद्य कोश', 'हिन्दी कविता', 'साहित्य कुञ्ज', 'साहित्यिकी', 'जनता की आवाज़', 'पोषम पा', 'अपनी माटी', 'द लल्लनटॉप', 'अमर उजाला', 'समकालीन जनमत', 'लोकसाक्ष्य', 'अद्यतन कालक्रम', 'द साहित्यग्राम', 'लोकमंच', 'साहित्य रचना ई-पत्रिका', 'राष्ट्र चेतना पत्रिका', 'डुगडुगी', 'साहित्य सार', 'हस्तक्षेप', 'जन ज्वार', 'जखीरा डॉट कॉम', 'संवेदन स्पर्श - अभिप्राय', 'मीडिया स्वराज', 'अक्षरङ्ग', 'जानकी पुल', 'द पुरवाई', 'उम्मीदें', 'बोलती जिंदगी', 'फ्यूजबल्ब्स', 'गढ़निनाद', 'कविता बहार', 'हमारा मोर्चा', 'इंद्रधनुष जर्नल' , 'साहित्य सिनेमा सेतु' , 'साहित्य सारथी' , 'लोकल ख़बर (गाँव-गाँव शहर-शहर ,झारखंड)', 'भड़ास', 'कृषि जागरण' ,'इंडिया ग्राउंड रिपोर्ट', 'सबलोग पत्रिका', 'वागर्थ', 'अमर उजाला', 'रणभेरी', 'हिंदुस्तान', 'दैनिक जागरण', 'परिवर्तन' इत्यादि एवं कुछ लोगों के व्यक्तिगत साहित्यिक ब्लॉग्स पर कविताएँ प्रकाशित हैं।


लम्बी कविता : तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव


प्रसारण : 'राजस्थानी रेडियो', 'द लल्लनटॉप' एवं अन्य यूट्यूब चैनल पर (पाठक : स्वयं संस्थापक)


अनुवाद : नेपाली में कविता अनूदित


काव्यपाठ : अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय काव्यगोष्ठियों में कविता पाठ।


सम्मान : अंतरराष्ट्रीय काशी घाटवॉक विश्वविद्यालय की ओर से "प्रथम सुब्रह्मण्यम भारती युवा कविता सम्मान - 2021" , "रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार-2022" और अनेकानेक साहित्यिक संस्थाओं से प्रेरणा प्रशस्तिपत्र प्राप्त हुए हैं।


मॉडरेटर : 'गोलेन्द्र ज्ञान' , 'ई-पत्र' एवं 'कोरोजीवी कविता' ब्लॉग के मॉडरेटर और 'दिव्यांग सेवा संस्थान गोलेन्द्र ज्ञान' के संस्थापक हैं।


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किन्नर पर केंद्रित छह कविताएँ : गोलेन्द्र पटेल



1).


कविता में किन्नर


प्रिय दोस्त!

न स्त्री

न पुरुष

न ही अर्द्धनारीश्वर हो तुम


तुम कविता में किन्नर हो

यानी थर्ड जेंडर

___ ट्रांसजेंडर

लफ़ंगों की भाषा में हिजड़ा

तुम्हारा गात

गोया गम का पिंजड़ा

पर तुम मुझे पसंद हो!...


इस सृष्टि में

तुम्हारी ताली

कुदृष्टि के लिए

गाली है

तुम भी उसी कोख से उत्पन्न हुए हो

जिससे मैं

तुम देश की संतान हो

मेरे दोस्त!

                    रचना : 20-12-2022

2).


ट्रांसजेंडर संतान का दुःख!


क्या कोई रोक पाया है कभी

आँखों से पकी पीड़ा का टपकना

माथे पर श्रम की बूँद का अंकुरित होना

देह में दर्द का खिलना

फिर कैसे रोक पायेगा

कभी कोई

ट्रांसजेंडर संतान का दुःख!


सुख में

पत्थर पर उग जाती है प्रसन्नता

जैसे 

रेत में रोती हुई दूब ;

जहाँ मर्द और औरत के बीच

नदी

किन्नर का संचित

आँसू है

जो अपने आप में धाँसू है!

                         रचना : 21-12-2022

3).


किन्नर-कथा


अस्तित्व की तलाश में शिखंडी

अपनी आत्मा को तब तक तपाया

जब तक कि भीष्म 

शरशय्या पर सो नहीं गये


मगर याद रहे

साधना के समय स्त्री रूप में था वह

तप के बाद हुआ पुरुष


उसने अर्द्धनारीश्वर रूप की नहीं

शंकर की तपस्या की

तुम भी कर रहे हो, दोस्त!

लेकिन तुम किन्नर हो

काश कि तुम्हारी प्रार्थना भी 

सुनते शिव!


तुम्हारी व्यथा की कथा

शायद नंदी के कानों में कहने से

शीघ्र सुन लें वे!


तुम जब भी ट्रेनों में या चौराहों पर

या किसी के द्वार पर

तालियाँ बजाते हुए

दिखते हो

तुम्हारे होंठों पर होते हैं

सोहर

मंगल गीत

शुभकामना के स्वर


जबकि तुम भीतर से बहुत दुखी होते हो

और बाहर से बहुत प्रसन्न

तुम अपने चेहरे पर इतनी प्राकृतिक प्रसन्नता

कैसे उगा लेते हो?

क्या है इसका राज़?

आज

मेरी कलम निस्तब्ध पड़ी है

मन के द्वार पर 

एक ट्रांसजेंडर मित्र की स्मृति खड़ी है


जो इस करुणामयी कविता में 

किन्नर-कथा को इन्नर की तरह 

परोस चुकी है!

रचना : 21-12-2022 


4).


हिजड़ों की फ़ौज़


बचपन से

सुनता आ रहा हूँ मैं

कि हिजड़ों की फ़ौज़ से

जंग 

जीती नहीं जाती है


जंग जीती जाती है

हौसलों से!

रचना : 21-12-2022

 5). 


किन्नर


कंठ से नहीं, कोख से फूटे

शब्द ने पूछा 

कि

इस धरती पर

उसकी जगह कहाँ है?

जो फूल

क्लीव है


वसंत का मौसम है

मगर रंगों का आयतन कम हो गया है

गंध गायब हो गयी है

भाषा से


हवा में केवल

किन्नर, मौगा, हिजड़ा, छक्का, थर्ड जेंडर

___ ट्रांसजेंडर जैसे दर्दनाक

संबोधन हैं

ये कैसे उपवन हैं?


जहाँ सुनने वाला न पुरुष है

न स्त्री है

इन दोनों से भिन्न है!

रचना : 22-12-2022 


6).


किन्नर पर कविता


संसद की सड़क पर 

माँसपेशियों की मीठी महक ने कहा

कि वे न नारी हैं न नर!


उधर

एक कोई स्वर स्वयं को गाता आ रहा है

कोई समय सुनता जा रहा है उनको

कोई गमी उनकी गज़ल बन रही है

लेकिन उनकी लयबद्ध तालियाँ

मंगल के गीत हैं

उनके आँसू की आवाज़

सरसराहट में स्वप्न के संगीत हैं

वे सदियों से गाए जा रहे हैं

अपनी मानवीय स्मृति

इस धरती के लिए!


इधर

मैंने ट्रांसजेंडर साथियों से बातचीत करते हुए

महसूस किया है कि

लंबी हिचकियों के बीच

हृदय में हुलास मारता है दुःख

हड्डियाँ चरमरा जाती हैं 

और उनकी देह

उन्हें दर्द का गेह मालूम होती है


धूप, हवा और पानी प्रतिकूल हैं

पर अपनी पीड़ा

वे गूँथते जाएंगे अपनी धुन के धागे पर

अभिशप्त जीवन के लिए


जहाँ उनमें एक उम्मीद है

कि ऊसर में उनकी आत्मकथा उगेगी

जो चुप्पी के समाजशास्त्र का सप्रसंग व्याख्या करेगी


आह! आत्मा के अक्षर 

इतिहास के पन्नों पर अच्छे लग रहे हैं!


मेरे दोस्त!

यह सोहर में स्याह संवेदना व्यक्त करने का समय है

और तुम चुप हो


तुमसे दोस्ती है तुम हो इसलिए यह 

किन्नर पर कविता है 

जैसे कोई ठूँठ पेड़ सिर्फ़ इसलिए है

क्योंकि पंक्षियों की उड़ान भरने में

उसकी अहम भूमिका है! 

रचना : 22-12-2022

कवि : गोलेन्द्र पटेल 

संपर्क :

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

पिन कोड : 221009

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

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बेरोज़गारों का देश

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